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पंचकूला स्कूल में हिंसक बच्चे का मामला: NCRB के मुताबिक, नाबालिग बन रहे ‘अपराधी’; जानिए संभावित कारण

पंचकूला स्कूल में तीसरी कक्षा के बच्चे (उम्र 8 वर्ष) द्वारा केजी की बच्ची (5 वर्ष) को बुरी तरह मारने-पीटने का मामला आया है। आइए, हम बच्चों में बढ़ती हिंसा के मामले के बारे में समझते हैं।
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Ravi Gupta

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Updated: 31 Oct 2026, 2:53 PM IST

Credit- Janani AI

हरियाणा के पंचकूला में एक स्कूल के भीतर तीसरी कक्षा के एक छात्र द्वारा केजी कक्षा की एक बच्ची पर लात-घूसे और पत्थर से हमला कर उसे बेहोश कर देना, फिर घसीटते हुए पीटना... बच्ची को 36 घंटे बाद इलाज के दौरान होश आया है। यह दर्दनाक घटना न केवल दिल दहला देने वाली है, बल्कि बच्चों में हिंसक व्यवहार की गहराई से सोचने पर विवश करती है।

इस लेख में हम इस घटना के पीछे संभावित कारणों, भारत में बच्चों की हिंसा से जुड़े आंकड़ों और इससे जुड़े सामाजिक-संरचनात्मक पहलुओं को समझने का प्रयास करेंगे।

बच्चे का प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स

इस घटना ने स्कूल प्रशासन, अभिभावकों और समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि इतने छोटे बच्चे में इतनी हिंसक प्रवृत्ति कैसे विकसित हो सकती है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि आठ वर्ष की आयु में बच्चे का प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स (जो जोखिम-आकलन और नैतिक निर्णय में सहायक होता है) पूरी तरह विकसित नहीं होता। बच्चे अधिकांशतः देखकर ही सीखते हैं - यदि घर या स्कूल में हिंसा, नशा या भावनात्मक दबाव का वातावरण है, तो वह बच्चे के व्यवहार में झलक सकता है। इस मामले में बच्चे के पिता का नशे की हालत में स्कूल आना इस बात का संकेत है कि घर का माहौल भी प्रभावित हो सकता है।

भारत में बच्चों द्वारा हिंसक अपराधों में वृद्धि चिंताजनक!

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में नाबालिगों द्वारा अपराधों की संख्या 2023 की तुलना में 11 प्रतिशत बढ़ी है। 2023 में 31,365 मामलों से बढ़कर 2024 में 34,878 मामले दर्ज हुए। इनमें से अधिकांश आरोपी 16 से 18 वर्ष की आयु के थे। साथ ही, बच्चों के खिलाफ अपराधों की कुल संख्या भी 2023 के 1,77,335 से बढ़कर 2024 में 1,87,702 हो गई, जो लगभग 5.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है।

इसका अर्थ यह है कि बच्चों में हिंसक व्यवहार केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्या नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक चुनौती है। NCRB के आंकड़ों में ‘बच्चों के खिलाफ अपराध’ में अपहरण, POCSO (Protection of Children from Sexual Offences Act) के तहत यौन अपराध, हत्या और अन्य हिंसात्मक घटनाएं शामिल हैं। 2024 में POCSO के तहत 69,191 मामले दर्ज हुए, और अपहरण/अभियोजन के 75,108 मामले भी सामने आए।

बच्चों द्वारा हिंसा पर यूनिसेफ की राय

इसके अतिरिक्त, यूनिसेफ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में बच्चों के खिलाफ हिंसा, शोषण और दुर्व्यवहार की वास्तविक संख्या बहुत अधिक हो सकती है, क्योंकि कई मामले दर्ज ही नहीं होते। उदाहरण के लिए, चाइल्डलाइन के आंकड़ों के अनुसार, शारीरिक शोषण की शिकायतों में से केवल 6 प्रतिशत ही यौन शोषण से संबंधित होती हैं। यह स्पष्ट करता है कि यौन हिंसा की रिपोर्टिंग बहुत कम है।

यूनिसेफ यह भी बताता है कि भारत में बच्चों के खिलाफ हिंसा की रिपोर्टिंग और रोकथाम के लिए कानून तो मौजूद हैं, लेकिन क्रियान्वयन में मानव संसाधन और पुनर्वास सेवाओं की कमी एक बड़ी बाधा है।

बच्चों में हिंसा बढ़ाने वाले संभावित कारण

इन आंकड़ों और विशेषज्ञों की बातों से स्पष्ट होता है कि बच्चों में हिंसक व्यवहार के कई कारण हो सकते हैं - घर का वातावरण, स्कूल में निगरानी की कमी, मीडिया (टीवी, मोबाइल) और वीडियो गेम्स में हिंसा, नींद या मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, और सामाजिक असहिष्णुता। लेकिन सबसे गहरा कारण अक्सर यही होता है कि बच्चे जो देखते हैं, वही सीखते हैं।

बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दें!

माता-पिता और स्कूलों को चाहिए कि वे बच्चों के व्यवहार में अचानक आए बदलाव पर ध्यान दें, मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक समर्थन को प्राथमिकता दें, और अभिभावकों को भी जागरूक करें कि घर में हिंसात्मक वातावरण बच्चों पर किस प्रकार प्रभाव डालता है।

स्कूलों में मनोवैज्ञानिक काउंसलर नियुक्त किए जाएं, अभिभावकों और शिक्षकों के लिए कार्यशालाएं आयोजित हों, और बच्चों को भावनात्मक बुद्धिमत्ता (EQ) सिखाने पर जोर दिया जाए। साथ ही, सरकार और समाज को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों के खिलाफ हिंसा की रिपोर्टिंग आसान हो, और पीड़ितों को उचित संरक्षण व पुनर्वास मिले।

यह घटना केवल एक दर्दनाक खबर नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है - हमें बच्चों के मनोविकास, भावनात्मक सुरक्षा और सामाजिक वातावरण पर ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।