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लगातार सिरदर्द, थकान और नींद की समस्या रहे तो हो सकती है ये बीमारी

अगर यह बीमारी अधिक समय तक है तो दूसरी बीमारियों के होने की आशंका बढ़ जाती है। इसे क्रोनिक फटीग एंड इम्यून डिसफंक्शन सिंड्रोम भी कहते हैं।

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जयपुर

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Vikas Gupta

Aug 03, 2019

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अगर यह बीमारी अधिक समय तक है तो दूसरी बीमारियों के होने की आशंका बढ़ जाती है। इसे क्रोनिक फटीग एंड इम्यून डिसफंक्शन सिंड्रोम भी कहते हैं।

क्रोनिक फटीग सिंड्रोम (सीएफएस) ऐसी बीमारी है जिसमें मरीज अत्यधिक थकावट महसूस करता है और यह थकावट बिना किसी श्रम के कारण होती है। आराम करने पर भी यह थकावट नहीं जाती है। इससे दिनचर्या प्रभावित होती है। थकावट के कारण शारीरिक और मानसिक परेशानी होने लगती है। कई मरीजों में इसके लक्षण कई वर्षों तक दिखते हैं। अगर यह बीमारी अधिक समय तक है तो दूसरी बीमारियों के होने की आशंका बढ़ जाती है। इसे क्रोनिक फटीग एंड इम्यून डिसफंक्शन सिंड्रोम भी कहते हैं।

डॉक्टर्स की मानें तो क्रोनिक फटीग सिंड्रोम जानलेवा बीमारी नहीं है, लेकिन इसका नुकसान कई प्रकार से होता है। जैसे कई बार मरीज खड़ा होने तक की स्थिति में नहीं रह जाता है। वह सोता भी है तो उसका दिमाग चलता रहता है। मानसिक और शारीरिक रूप से धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। वह कोई काम नहीं कर पाता है। ऐसे में व्यक्ति की स्ट्रेंथ कम होने के कारण रोग का असर उसके सामाजिक और पारिवारिक सम्बंधों पर पड़ता है।

कारण -
सीएफएस का कोई निश्चित कारण नहीं होता है। कई बार वायरस-बैक्टीरिया के संक्रमण से हो सकता है। कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता, मनोवैज्ञानिक समस्याएं जैसे तनाव और भावनात्मक कारण भी हो सकता है। महिलाओं के शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव भी कई बार इसके कारण बनते हैं।

लक्षण -
हर समय थकावट महसूस होना और गले में खराश रहना।
यह थकावट अलग प्रकार की ही होती है।
एकाग्रता की कमी और भूलने की समस्या होना।
मांसपेशियों में दर्द और अचानक सिर में तेज दर्द होना।

कम शारीरिक मेहनत पर भी तुरंत थक जाना।
रात में नींद न आना या आने पर बीच-बीच में टूट जाना।

इन बातों का रखें विशेष ध्यान-
खूब पानी पीएं ताकि शरीर में इसकी कमी से थकावट न हो।
सोने की दिनचर्या ठीक रखें, बिस्तर पर तभी जाएं जब नींद आ रही हो।
दिन में बिल्कुल न सोएं और ज्यादा फैटी फूड का सेवन न करें।
सोने के पहले शराब, कैफीन और तम्बाकू आदि का इस्तेमाल न करें।
रोजाना हल्का व्यायाम करें, शाम को खाने के बाद थोड़ा टहलें।
खाने में फलियां, मेवे, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और ग्रीन टी लें।
जंक फूड, फास्ट फूड और ज्यादा मीठी चीज न खाएं।

जांचें : इस बीमारी के लिए एक निश्चित जांच नहीं है। इसलिए एक साथ कई जांचें करवाई जाती हैं। लक्षणों के आधार पर डॉक्टर टैस्ट करवाते हैं।

कब डॉक्टर को दिखाएं : लगातार या अत्यधिक थकान है। एक महीने से ज्यादा समय से सोने में समस्या हो रही है। गर्दन की ग्रंथियों में सूजन या 2 सप्ताह से अधिक समय से सिरदर्द है।

इलाज का तरीका-
एलोपैथी : इससे पीडि़त मरीजों का इलाज मुख्यत: लक्षणों के आधार पर किया जाता है। कई बार लक्षणों में उतार-चढ़ाव भी देखने को मिलता है। ऐसे में कुछ समय इंतजार के बाद ही इलाज शुरू किया जाता है। इसमें तनाव को कम करने के लिए एंटीडिप्रेजेंट दवाइयां दी जाती हैं। वहीं थकावट को दूर करने के लिए थोड़ी मात्रा में स्टेरॉयड भी दिया जाता है। जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सकों की भी मदद ली जाती है।

आयुर्वेद : यह बीमारी वात के कारण होती है। क्रॉनिक फटीग सिंड्रोम को आयुर्वेद में कल्म्ब कहते हैं। इसके इलाज में दवा और आहार दोनों की महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह बीमारी लाइफ स्टाइल से जुड़ी होती है। आहार के रूप में मरीजों को मौसमी फल, हरी-पत्तेदारी सब्जियां और मेवे आदि की सलाह दी जाती है ताकि मरीज को कम थकान हो। वहीं इलाज में अश्वगंधा, सतावर और आंवला आदि से बनी दवा दी जाती है।

होम्योपैथी : इसके मरीज जब आते हैं तो पहले उनका पूरा विवरण लिया जाता है। लक्षणों के आधार पर इलाज किया जाता है। मरीजों को लाइपोटियम, फॉस्फोरस, सल्फर आदि ग्रुप की दवाइयां दी जाती हैं। जैसे थकान के लिए काइफास, मसल्स पेन के लिए जलसेनियम, कुछ अलग तरह के लक्षण जैसे रोने की जगह हंसने और हंसने की जगह रोने पर इलेशिया आदि दवा दी जाती है। इस बीमारी का इलाज लंबे समय तक चलता है।

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इन योगों से होता है फायदा -
बालासन, सेतुबंध सर्वांगासन, शिरासन, विपरीत करणी आसन करने से राहत मिलती है। रोजाना करीब आधा घंटा ध्यान लगाना भी इसमें फायदेमंद होता है। अनुलोम विलोम और प्राणायाम से भी इस बीमारी में आराम मिलता है।