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हिंसा से लेकर सिंगल मदर्स तक, सामंथा रूथ प्रभु ने महिलाओं के प्रति दोहरे रवैये को लेकर समाज की सोच पर साधा निशाना

Samantha Social Media Post: सामंथा रूथ प्रभु ने समाज के दोहरे रवैये पर सवाल उठाए। उन्होंने सिंगल मदर्स और हिंसा से पीड़ित महिलाओं को लेकर होने वाले जजमेंट पर बात की।
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Samantha Ruth Prabhu

सामंथा ने समाज के दोहरे रवैये पर उठाए सवाल (सोर्स: instagram-SamanthaRuthPrabhu/IMDb)

Samantha Women Statement: एक्ट्रेस सामंथा रूथ प्रभु ने समाज में महिलाओं को लेकर मौजूद दोहरे रवैये पर सवाल उठाया है। एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सामंथा ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि कई मामलों में समाज उन महिलाओं को ही कटघरे में खड़ा कर देता है, जिन्हें सपोर्ट की जरूरत होती है, जबकि उनके साथ होने वाली परिस्थितियों या व्यवहार के लिए जिम्मेदार लोगों से सवाल नहीं किए जाते।

सामंथा ने अपने मैसेज में सेक्स वर्कर्स, सिंगल मदर्स और हिंसा की पीड़ित महिलाओं से जुड़े सामाजिक रवैये का जिक्र किया। उन्होंने सवाल उठाया कि वर्कर्स को जज किया जाता है, लेकिन उनके क्लाइंट्स को उसी तरह सवालों के घेरे में क्यों नहीं लाया जाता?

‘सिंगल मदर्स को जज करते हैं, अनुपस्थित पिता से सवाल क्यों नहीं?’

सामंथा ने सिंगल मदर्स को लेकर समाज की सोच पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सिंगल मदर्स को अक्सर सामाजिक आलोचना और जजमेंट का सामना करना पड़ता है, लेकिन बच्चों की जिंदगी से अनुपस्थित रहने वाले पिताओं को उतनी ही गंभीरता से सवालों के घेरे में नहीं लाया जाता। उनके इस संदेश का सवाल यही है कि जिम्मेदारी और शर्म का बोझ अक्सर महिलाओं पर ही क्यों डाल दिया जाता है?

हिंसा के मामलों में पीड़ित से ही सवाल क्यों?

सामंथा ने सेक्सुअल हिंसा की पीड़ित महिलाओं को लेकर समाज के रवैये पर भी बात की। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि ऐसे मामलों में कई बार पीड़ित से ही सवाल किए जाते हैं, जबकि नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति की जवाबदेही पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता।

उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हैं, उन्हें कई बार जज किया जाता है या चुप कराने की कोशिश होती है। वहीं, सच छिपाने की कोशिश करने वाले लोग जवाबदेही से बच सकते हैं।

महिलाओं से जुड़ी सोच पर सामंथा का सवाल

सामंथा का यह मैसेज महिलाओं से जुड़ी उन सामाजिक अपेक्षाओं पर सवाल उठाता है, जिनमें परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार लोगों के बजाय महिलाओं को ही दोषी ठहराया जाता है। उनका कहना है कि बदलाव तभी संभव है, जब समाज उन लोगों को दोष देना बंद करे जिन्हें समर्थन की जरूरत है और गलत काम करने वालों को उनके कृत्यों के लिए जवाबदेह ठहराए। सामंथा के इस पोस्ट ने एक बार फिर महिलाओं को लेकर समाज की सोच और जवाबदेही के दोहरे मापदंड पर चर्चा छेड़ दी है।

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