
मोबाइल वेटरनरी यूनिट
नागौर. पशुपालकों को घर के नजदीक पशु चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई मोबाइल वेटरनरी यूनिट योजना पशुपालकों को कम और संवेदक को ज्यादा ‘राहत’ दे रही है। योजना की जमीनी हकीकत सरकारी आंकड़ों ने ही उजागर कर दी है। सितम्बर 2026 के पहले 25 दिनों के सीआरएम पोर्टल से प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण में सामने आया है कि प्रदेश के 23 जिलों में संचालित 101 मोबाइल वेटरनरी यूनिट प्रतिदिन औसतन दो या इससे कम पशुपालकों को ही लाभान्वित कर पा रही हैं। यानी करोड़ों रुपए खर्च कर संचालित की जा रही योजना का लाभ बड़ी संख्या में पशुपालकों तक पहुंच ही नहीं रहा है।
पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ. सुरेश चन्द मीना ने इसको गंभीरता से लेते हुए गत एक अक्टूबर को सभी अतिरिक्त निदेशकों, संयुक्त व उप निदेशकों को जारी आदेश में इन आंकड़ों पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिक से अधिक पशुपालक योजना का लाभ नहीं ले पा रहे हैं और मोबाइल यूनिट भी सीमित क्षेत्र में ही सेवाएं दे रही हैं। विभाग ने सभी जिलों में संचालित मोबाइल वेटरनरी यूनिट का गंभीरता से विश्लेषण करने तथा अधिक से अधिक गांवों में प्रचार-प्रसार कर पशुपालकों को लाभान्वित कराने के निर्देश दिए हैं।
25 दिन के आंकड़ों ने खोल दी व्यवस्था की पोल
विभाग ने सितम्बर के 25 दिनों में सीआरएम पोर्टल पर जनरेट और क्लोज किए गए टिकटों का विश्लेषण किया। रिपोर्ट में टिकट जनरेशन और टिकट क्लोज होने की संख्या में वृद्धि तो दर्ज की गई, लेकिन कई जिलों में यूनिटों का औसत प्रदर्शन बेहद कम पाया गया। अजमेर, बांसवाड़ा, बाड़मेर, भीलवाड़ा, बीकानेर, चित्तौडगढ़़, चूरू, डीडवाना-कुचामन, डूंगरपुर, हनुमानगढ़, जयपुर, जैसलमेर, जालोर, जोधपुर, करौली, नागौर, पाली, प्रतापगढ़, राजसमंद, सिरोही, श्रीगंगानगर, टोंक और उदयपुर में कुल 101 मोबाइल वेटरनरी यूनिट प्रतिदिन औसतन दो या इससे कम पशुपालकों तक पहुंच सकी हैं।
गांवों तक पहुंचने के बजाय सीमित दायरे में सिमटीं यूनिट
योजना का उद्देश्य दूर-दराज के गांवों में रहने वाले पशुपालकों को मौके पर ही पशु चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना है। इसके बावजूद विभागीय विश्लेषण में सामने आया कि मोबाइल यूनिट सीमित क्षेत्र में ही अपनी सेवाएं दे रही हैं। इसका सीधा असर योजना के लाभार्थियों की संख्या पर पड़ रहा है। रिपोर्ट में यह भी माना कि अधिक से अधिक गांवों में योजना की जानकारी नहीं पहुंच पा रही है। परिणामस्वरूप जिन पशुपालकों को मोबाइल यूनिट की सुविधा मिलनी चाहिए, वे या तो योजना से अनजान हैं या यूनिट तक पहुंच नहीं बन पा रही है।
22 जुलाई के आदेश का भी नहीं दिखा असर
दिलचस्प यह है कि विभाग ने इस समस्या को पहले ही भांप लिया था। गत 22 जुलाई 2026 को जारी आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि जिन मोबाइल वेटरनरी यूनिट का औसत टिकट जनरेशन और क्लोज टिकट जनरेशन निर्धारित लक्ष्य से कम है, वे अपने आवंटित क्षेत्र में व्यापक प्रचार-प्रसार करें। मौके पर उपलब्ध पशुपालकों के पशुओं का पंजीकरण कर उपचार करने के निर्देश भी दिए गए थे। इसके बावजूद सितम्बर के आंकड़े बताते हैं कि कई यूनिट अभी भी सीमित क्षेत्र में ही सेवाएं दे रही हैं। इससे सवाल उठता है कि जुलाई में दिए गए निर्देशों की कितनी प्रभावी निगरानी हुई और यूनिटों ने गांवों तक पहुंच बनाने के लिए वास्तव में कितने प्रयास किए।
सिर्फ टिकट बढऩा काफी नहीं, गांवों तक पहुंच जरूरी
विभागीय आदेश में टिकट जनरेशन और टिकट क्लोज होने की संख्या में वृद्धि का उल्लेख है, लेकिन साथ ही यह भी सामने आया है कि बड़ी संख्या में पशुपालक अभी योजना से बाहर हैं। ऐसे में केवल सीआरएम पोर्टल पर टिकटों की संख्या बढऩा योजना की सफलता का पैमाना नहीं हो सकता। असली चुनौती यह है कि मोबाइल यूनिट कितने गांवों तक पहुंची और कितने नए पशुपालकों को सेवा से जोड़ा गया।
अब जिलों को करना होगा यूनिटवार विश्लेषण
निदेशक मीना ने जिलों में संचालित सभी मोबाइल वेटरनरी यूनिट का गंभीरता से विश्लेषण करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही अधिक से अधिक गांवों में प्रचार-प्रसार करवाकर पशुपालकों को योजना का लाभ दिलाने की जिम्मेदारी अधिकारियों को सौंपी गई है। सरकार की इस योजना का मूल उद्देश्य यही है कि पशुपालक को पशु को लेकर दूर अस्पताल तक न जाना पड़े, बल्कि चिकित्सा सुविधा उसके गांव और घर के नजदीक पहुंचे। लेकिन विभाग के अपने आंकड़े बता रहे हैं कि प्रदेश के 23 जिलों में 101 मोबाइल यूनिट रोजाना औसतन दो पशुपालकों तक भी प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे में अब निगरानी के साथ-साथ यूनिटों की वास्तविक फील्ड मूवमेंट और गांववार कवरेज की पड़ताल जरूरी हो गई है।
Updated on:
05 Oct 2026 11:12 am
Published on:
05 Oct 2026 11:12 am
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