
सांकेतिक इमेजः Gemini
किसान खेत में अच्छी पैदावार के लिए खाद, कीटनाशक और सिंचाई पर लगातार खर्च करता है। शुरुआत में इन उपायों से उत्पादन बढ़ता हुआ भी दिख सकता है, लेकिन लंबे समय तक मिट्टी की सेहत की अनदेखी भारी पड़ सकती है। मिट्टी में जैविक कार्बन और जरूरी पोषक तत्वों की कमी, कटाव और पानी के गलत प्रबंधन जैसी समस्याएं खेती की जमीन की उत्पादकता घटा सकती हैं। इसका असर केवल किसान की कमाई पर नहीं, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ता है।
मिट्टी केवल धूल या रेत का ढेर नहीं है। इसमें खनिज, जैविक पदार्थ, पानी, हवा और असंख्य सूक्ष्मजीव मौजूद होते हैं। ये सभी मिलकर फसलों को पोषण देने और जमीन की उर्वरता बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं।
जब खेत में लगातार एक ही फसल उगाई जाती है, फसल चक्र नहीं अपनाया जाता और मिट्टी की जरूरत समझे बिना खाद व रसायनों का इस्तेमाल होता है, तो पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है। इसके अलावा पेड़ों की कटाई, अत्यधिक चराई, मिट्टी का कटाव और जरूरत से ज्यादा सिंचाई भी जमीन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।
रासायनिक उर्वरक फसलों को नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम जैसे पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। सही मात्रा और जरूरत के अनुसार इनका इस्तेमाल फसल उत्पादन में मदद कर सकता है। समस्या तब होती है, जब मिट्टी की जांच कराए बिना लगातार एक ही तरह के उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता है।
इससे पोषक तत्वों का असंतुलन पैदा हो सकता है। मिट्टी में जैविक पदार्थों की कमी होने पर उसकी संरचना और पानी रोकने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, मिट्टी की खराब होती सेहत के लिए केवल रासायनिक खाद को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। इसके पीछे खेती के तरीके, पानी का प्रबंधन, मिट्टी का कटाव और जलवायु संबंधी कारण भी हो सकते हैं।
खाद्य एवं कृषि संगठन यानी FAO की स्टेट ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर 2025 रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में करीब 1.7 अरब लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं, जहां मानवीय गतिविधियों के कारण जमीन के खराब होने से फसल की पैदावार प्रभावित हुई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि इन क्षेत्रों में फसल उत्पादन में कम से कम 10 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, जंगलों की कटाई, जरूरत से ज्यादा पशु चराई और अस्थिर खेती के तरीके जमीन की उत्पादकता को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसका असर किसानों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ रहा है।
भारत में खेती का बड़ा हिस्सा मिट्टी की गुणवत्ता और मानसून पर निर्भर करता है। ऐसे में मिट्टी का कटाव, जैविक कार्बन की कमी, पोषक तत्वों का असंतुलन और पानी का गलत इस्तेमाल लंबे समय में कृषि उत्पादन के लिए चुनौती बन सकते हैं।
मिट्टी की ऊपरी परत में जैविक कार्बन और पोषक तत्वों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब बारिश या हवा के कारण यह उपजाऊ परत बह जाती है या उड़ जाती है, तो खेत की उत्पादकता प्रभावित हो सकती है। इसकी भरपाई में लंबा समय लग सकता है।
1. मिट्टी की जांच कराएं: खेत में कौन से पोषक तत्व कम हैं और किसकी कितनी जरूरत है, यह जानने के लिए समय-समय पर मृदा परीक्षण कराएं। रिपोर्ट के आधार पर ही खाद और उर्वरक का इस्तेमाल करें।
2. जैविक खाद का उपयोग करें: गोबर की सड़ी खाद, कंपोस्ट और वर्मी कंपोस्ट मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। इन्हें मिट्टी और फसल की जरूरत के अनुसार इस्तेमाल करें।
3. फसल चक्र अपनाएं: हर सीजन में एक ही फसल उगाने के बजाय अलग-अलग फसलों को बारी-बारी से उगाएं। दलहनी फसलें फसल चक्र का उपयोगी हिस्सा हो सकती हैं।
4. खेत को खाली और खुला न छोड़ें: कवर क्रॉप और फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन मिट्टी को बारिश और हवा से होने वाले कटाव से बचाने में मदद कर सकता है।
5. पानी का सही प्रबंधन करें: जरूरत से ज्यादा सिंचाई से जलभराव और कुछ परिस्थितियों में मिट्टी में लवण जमा होने की समस्या हो सकती है। फसल और जमीन की जरूरत के अनुसार सिंचाई करें।
6. रासायनिक उर्वरकों का संतुलित इस्तेमाल करें: उर्वरकों को पूरी तरह छोड़ना ही समाधान नहीं है। मिट्टी की जांच, फसल की जरूरत और कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार इनका सही मात्रा में उपयोग करना जरूरी है।
खेती की जमीन किसान की सबसे बड़ी पूंजी है। अधिक उत्पादन के लिए तत्काल उपाय अपनाते समय उसकी दीर्घकालिक सेहत को नजरअंदाज करना नुकसानदेह हो सकता है। मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए जैविक पदार्थों का इस्तेमाल, फसल चक्र, संतुलित उर्वरक और बेहतर सिंचाई प्रबंधन जरूरी हैं।
मिट्टी बनने की प्रक्रिया बेहद धीमी होती है, जबकि गलत प्रबंधन से उसकी गुणवत्ता तेजी से खराब हो सकती है। इसलिए खेत से बेहतर उत्पादन लेने के साथ उसकी सेहत बचाना भी जरूरी है।
Updated on:
2 Nov 2026, 3:28 PM IST
Published on:
2 Nov 2026, 3:28 PM IST
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