
रक्षाबंधन की प्रमुख कहानियां, पढ़ें- रक्षाबंधन की शुरुआत का रोचक इतिहास
रक्षा बंधन की कहानी सतयुग की है और वह पति पत्नी देवराज इंद्र इंद्राणी थे। कथा के अनुसार एक बार इस समय देवताओं और दानवों में युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में देवता हार रहे थे, देवराज इंद्र को इस मुश्किल घड़ी से निकलने का रास्ता नहीं सूझ रहा था। आखिरकार 12 वर्ष तक चले युद्ध में देवता असुरों से युद्ध हार गए और देवताओं के राजा इंद्र की पराजय के बाद स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। साथ ही इंद्र और अन्य देवता अमरावती पलायन कर गए। दैत्यराज बली ने तीनों लोकों को वश में कर लिया और देवराज इंद्र के सभा में आने पर रोक लगा दी। साथ ही देवताओं और मनुष्यों के यज्ञ कर्म करने पर रोक लगा दी। सभी लोगों को उसकी पूजा का आदेश दिया।
इस आदेश के कारण यज्ञ, उत्सव, वेद पठन पाठन सब बंद हो गए। धर्म के नाश से देवताओं का बल घटने लगा। यह देख देवराज इंद्र देवगुरु बृहस्पति के पास पहुंचे और उनके चरणों में निवेदन किया कि हे गुरुवर! ऐसी स्थितियों में मुझे प्राण त्यागने होंगे। न ही भाग सकता हूं और न ही युद्ध भूमि में असुरों का सामना कर सकता हूं, कुछ उपाय बताइये।
इस पर गुरु बृहस्पति ने उन्हें रक्षा विधान करने की सलाह दी। श्रावण पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल येनबद्धो बलिःराजा, दानवेंद्रो महाबलः, तेन त्वामिभिवध्नामि रक्षे मा चल मा चलः।। मंत्र के साथ रक्षा विधान संपन्न किया गया और इंद्राणी ने सावन पूर्णिमा के अवसर पर विप्रों से स्वस्तिवाचन कराकर रक्षा सूत्र का तंतु लिया और अभिमंत्रित तंतु इंद्र की दायीं कलाई में बांधा।
साथ ही संग्राम में इंद्र के सुरक्षित रहने और विजयी होने के लिए प्रार्थना की, और फिर से इंद्र को युद्ध भूमि में भेजा। इसके बाद हुए देवासुर संग्राम में रक्षाबंधन विधान के प्रभाव से दानव भाग खड़े हुए और देवताओं की विजय हुई। वे सकुशल लौटे और यहीं से रक्षा बंधन की प्रथा शुरू हुई। ब्राह्मण आज भी राखी (rakhi) के दिन अपने यजमानों के यहां जाकर रक्षासूत्र बांधते हैं। इस तरह सबसे पहले इंद्राणी ने अपनी पति की कलाई पर राखी यानी रक्षा सूत्र बांधा था।
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भाई बहन के त्योहार रक्षाबंधन के इस रूप को आधिकारिक रूप देने का श्रेय भगवान श्रीकृष्ण को दिया जाता है। इसके बाद ही रक्षाबंधन भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक बन गया था।
कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तो उनकी अंगुली चोटिल हो गई। उससे रक्त बहने लगा, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनकी अंगुली पर बांध दिया। बाद में द्रौपदी चीरहरण के समय श्रीकृष्ण ने भाई होने का कर्तव्य निभाते हुए द्रौपदी के मान-सम्मान की रक्षा की। इसके बाद ही यह भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतीक बन गया।
रक्षाबंधन की एक अन्य कहानी के अनुसार वामन अवतार के समय भगवान विष्णु (वामन भगवान) बलि की दानवीरता से बहुत प्रसन्न हुए और पाताल लोक का राज दे दिया। इसके साथ उन्होंने बलि से वरदान मांगने के लिए कहा। इस पर बलि ने उन्हें अपने साथ पाताल लोक में रहने के लिए प्रार्थना की। इसके बाद माता लक्ष्मी पाताल लोक गई और बलि को रक्षा सूत्र बांधा और भाई बना लिया। इसके बदले विष्णु जी को वरदान से मुक्त कराया, बाद ही भगवान विष्णु फिर अपने धाम वैकुंठ लौट आए।
सिकंदर की पत्नी रोक्साना राजा पोरस की वीरता से परिचित थी और उसे युद्ध में अपने पति सिकंदर के मारे जाने का भय भी था। इसलिए उसने राजा पोरस को अपना भाई मानते हुए उनकी कलाई पर राखी बांधी थी। इसके साथ ही उसने राजा पोरस से अपने पति को नहीं मारने का वचन ले लिया था। इस वचन को राजा पोरस ने निभाया भी था।
Updated on:
17 Aug 2024 09:57 pm
Published on:
17 Aug 2024 09:56 pm
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