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गोरखपुर। कभी हीरे की अंगूठी वाले काॅलेज में सामूहिक नकल का प्रकरण हो या एक काॅलेज में प्राचार्य का छात्रा के रूप में परीक्षा देकर टाॅपर बनने का मामला हर ऐसे मामले में विवि की कार्यप्रणाली पर ही अंगुली उठती रही है। नकल विहीन परीक्षा कराने के दावों के बीच दो-दो काॅलेजों में नकल के नाम पर वसूली के आॅडियो वायरल होने के बाद विवि ने फौरी तौर पर जांच कमेटी गठित कर अपना दामन तो बचा लिया है लेकिन केंद्राध्यक्ष नियुक्ति के मामले में अनअर्ह लोगों के नाम सामने आने पर एकबार फिर विवि की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय द्वारा जारी हुए केंद्राध्यक्षों की लिस्ट में ऐसे नाम भी हैं जो केंद्राध्यक्ष बनने के लिए अर्ह नहीं हैं। नकल कराने संबंधी आॅडियो वायरल होने और फाजिलनगर के श्री भगवान महावीर पीजी काॅलेज के ही दो शिक्षकों के नाम इस आॅडियो में आने के बाद अब यहीं के कई शिक्षकों के केंद्राध्यक्ष बनने पर भी सवाल उठ रहे। नियमानुसार कम से कम दो साल के अनुमोदित शिक्षक ही कहीं केंद्राध्यक्ष बन सकता है। लेकिन इस काॅलेज के एक शिक्षक डाॅ.गिरजेश मिश्र का अनुमोदन इसी सत्र में होने के बाद एक काॅलेज का केंद्राध्यक्ष बना दिया गया। यही नहीं इस काॅलेज में विज्ञान सब्जेट की पढ़ाई दो साल पहले बंद हो चुकी है। काॅलेज के टीचर्स रजिस्टर में दो शिक्षकों डाॅ.रामजन्म गुप्त व डाॅ. राजेश सिंह के नाम नहीं है लेकिन ऐसे दो शिक्षकों के नाम विवि तक भेजा गया है ताकि केंद्राध्यक्ष बनाया जा सके। आरोप है कि नकल माफियाओं ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर केंद्राध्यक्षों की सूची फाइनल कराई। मनमाने ढंग से केंद्राध्यक्ष बनवाए गए।
हालांकि, विवि द्वारा गठित की गई केंद्राध्यक्ष बनाए जाने की कमेटी के सदस्य और इसी काॅलेज के प्राचार्य डाॅ.ओंकार नाथ मिश्र इस आरोप को सिरे से खारिज करते हैं। उनका कहना है कि काॅलेज से बाकायदा लिखित उन्होंने अपने शिक्षकों के संबंध में भेजा है। वह बताते हैं कि डाॅ.गिरजेश मिश्र हिंदी विभाग में उनके काॅलेज में विगत नौ साल से कार्यरत रहे हैं। उनका अनुमोदन इस सत्र में हुआ है। वह कहते हैं कि पूरे यूपी में इस तरह बिना अनुमोदन के शिक्षक पढ़ाते हैं। अनुभव तो पढ़ाने का दस साल हुआ न। प्राचार्य डाॅ.मिश्र दूसरे आरोप पर कहते हैं कि उनके काॅलेज में नकल नहीं होता है इसलिए विज्ञान संकाय में छात्र एडमिशन नहीं ले रहे हैं। दो साल से पढ़ाई नहीं हो रही। लेकिन बीएससी तृतीय साल में कुछ छात्र हैं और उनके दोनों शिक्षक पढ़ाते हैं।
लेकिन प्राचार्य अपने दावों से यह बात साफ नहीं कर सके कि जब उनके काॅलेज में विज्ञान सब्जेक्ट के शिक्षक पढ़ा रहे तो शिक्षक हाजिरी रजिस्टर में इन शिक्षकों के नाम क्यों नहीं हैं।
विवि के एक जिम्मेदार अधिकारी बताते हैं कि विवि ने केंद्राध्यक्ष बनाने के लिए एक तय फार्मेट में आवेदन मांगा गया था। इसके तहत अनुभव के साथ साथ समस्त डिटेल संबंधित काॅलेज के प्राचार्य को देना था। विवि को जो कागजात मिले उसी के आधार पर केंद्राध्यक्ष बनाया गया।
जबकि विवि संबद्ध काॅलेज शिक्षक संगठन के अध्यक्ष डाॅ.एसएन शर्मा और महामंत्री डाॅ.केडी तिवारी का कहना है कि विवि ने ही केंद्राध्यक्ष बनाए जाने संबंधी नियम बनाए हैं। आखिर कौन सी वजह है जो नियमों को दरकिनार कर केंद्राध्यक्ष बनाए गए। पदाधिकारीद्वय का आरोप है कि विवि केवल जांच के नाम पर पूरा परीक्षा करा लेना चाहता है। अभी भी दर्जन भर से अधिक केंद्रों पर केंद्राध्यक्ष तक नहीं हैं लेकिन सूची तक उपलब्ध नहीं कराई जा रही।
Published on:
30 Mar 2018, 7:07 AM IST
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