
World Bicycle Day: Coronavirus काल में मजदूरों ने दुनिया को दिखाया अद्भुत सामर्थ्य, चौंका देगी इनकी कहानियां
World Bicycle Day 2020 विश्व साइकिल दिवस (3 जून) पर साईकिल के गुणों का बखान किया जा रहा है। यह जरूरी भी है, क्योंकि साइकिल उन भौतिक साधनों में से एक है जो अविष्कार होने के बाद से आज तक इंसान के लिए सकारात्मक रूप से (Benefits Of Cycling) काम आ रही है। लेकिन साल 2020 में हमने साइकिल का जो महत्व देखा है उसे भुलाया नहीं जा सकता। कोरोना संकटकाल में भारतीयों ने साइकिल चलाने की क्षमता का ऐसा प्रदर्शन किया है जिसने विश्व को हैरत में डाल दिया है।
जी हां, आप खुद देखिए कोरोना वायरस के कारण जो लॉकडाउन लगा उसके बाद मजदूरों के पलायन में कितनी दिक्कत उन्हें उठानी पड़ी। लेकिन मजदूरों का काबिल—ए —तारीफ धैर्य इतनी मुसीबत में भी नहीं टूटा। मजदूरों ने घर जाने के लिए अलग—अलग तरीके अपनाए लेकिन साइकिल उनके लिए सबसे फायदेमंद रही। साइकिल चलाने में उन्हें कठोर परिश्रम करना पड़ा लेकिन रास्तें में ना चेक पोस्ट की दिक्कत थी ना किसी तरह के चालान की, मजदूर मस्ती में साइकिल चलाते रहे और इसी तरह उन्होंने दो पहियों पर हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर ली।
विदेशों तक पहुंची ज्योति की कहानी...
इन मामलों में सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी बिहार में दरभंगा जिले के कमतौल थाना क्षेत्र के सिरहुल्ली गांव की 15 वर्षीय ज्योति कुमारी ने। ज्योति अपने बीमार पिता को हरियाणा के गुरुग्राम जिले से घर तक साइकिल पर बैठा कर लेकर आई थीं। इस दौरान उसने 1 हजार किलोमीटर से ज्याद दूरी साइकिल पर पिता के साथ तय की। ज्योति के इस हैरतअंगेज कारनामे ने दुनिया की नजर अपनी और खींची।
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप ने भी उसकी सराहना की थी। कई सामाजिक संगठन और राजनेताओं ने इसके बाद ज्योति की मदद के लिए पेशकश की। इस दौरान केंद्रीय खेल मंत्री किरण रिजिजू ने भी भारतीय खेल प्राधिकरण और साइक्लिंग फेडरेशन ऑफ इंडिया के अधिकारियों से ज्योति का ट्रायल लेने के लिए बात की थी। फेडरेशन की ओर से क्वारंटाइन अवधि पूरी होने के बाद उसका ट्रायल लेने की को कहा गया था। हो सकता ज्योति में कोई छिपी हुई प्रतिभा हो जो अब बाहर निकल जाए।
इधर हजारीबाग जिले के इचाक दर्जी मुहल्ला और खुदरा गांव निवासी पांच लोग 1470 किलोमीटर साइकिल चला कर हैदराबाद से इचाक पहुंचे थे। तीन भाई मोहम्मद मुर्तजा अंसारी, इमरान अंसारी, रफीक अंसारी पिता हारुन अंसारी, मोहम्मद मुजाहिद और राहुल कुमार वहां ड्राइवरी का काम करते थे। इन सभी को यहां पहुंचने में लगभग 11 दिन लगे। यह सभी 21 अप्रैल को घर के लिए रवाना हुए थे।
अनेकों उदाहरण हैं...
इसी तरह झारखंड के गोड्डा जिले के पांच मजदूर आंध्रप्रदेश से 12 मई को जमशेदपुर पहुंचे थे। वहां ठेला चलाने वाले मजदूरों ने 17 दिन तक साइकिल पर सफर तय किया था। जमशेदपुर में प्रशासन ने इन्हें भोजन उपलब्ध कराकर आगे भेजा था। इस जत्थे में शामिल मो. मुस्तकीम ने बताया कि मोबाइल बेचकर उन्होंने यह साइकिल खरीदी थी।
एक मार्मिक कहानी यह भी...
एक मार्मिक उदाहरण राजस्थान के भरतपुर से भी बीते दिनों सामने आया था। एक साइकिल शोरूम से एक प्रवासी मजदूर ने साइकिल उठाई थी। इसके लिए उसने पत्र लिखकर शोरूम के मालिक से माफी मांगी थी। उसने लिखा था कि मैं आपका गुनहगार हूं लेकिन चोर नहीं हूं, घर जाना है औ कोई रास्ता नहीं है, मेरे पास पैसे भी नहीं है।
खैर इस विभीषिका की जो तस्वीर यहां बयां की जा रही है वह सही नहीं है, एक लोकताांत्रिक राष्ट्र में संकट के जनता को केवल अपने घर जाने के लिए इतनी परेशानी उठानी पड़े यह बहुत बड़ी विडंबना है। उपरोक्त काहनियां केवल अंश मात्र है उन मजदूरों के संघर्ष का जिन्होंने घर पहुंचने के लिए लाखों मुसीबतों का सामना किया है। लेकिन इस दौरान एक बार फिर भारतीयों का सामर्थ्य एक बार फिर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
Published on:
03 Jun 2020 07:10 pm

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