
जामुनी रंग का आलू हेल्थ के लिए लाभदायक है (Photo-AI)
Purple Potato in India: सब्जियों का राजा होता है आलू, लेकिन जब बात जरूरी न्यूट्रिएंट्स की आती है तो आलू में राजा वाली फील नहीं आती। इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने जामुनी रंग के आलू तैयार किए हैं। इस खास किस्म में सामान्य पीले छिलके वाले आलू की तुलना में विटामिन C, आयरन और जिंक की मात्रा अधिक है। इसके जामुनी गूदे में प्राकृतिक पिगमेंट यानी एंथोसायनिन भी हैं, जो एंटीऑक्सीडेंट का काम करते हैं। इसे ‘कुफरी जामुनिया आलू’ नाम दिया गया है।
अब बड़ा सवाल यह है भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI) द्वारा विकसित ये अधिक पौष्टिक आलू क्या कुपोषण से लड़ाई में सरकार का हथियार बन सकता है? ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की हेल्थ इनिशिएटिव में सीनियर फेलो शोभा सूरी के अनुसार, यह आलू सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) की कमी को कुछ हद तक दूर कर सकता है, लेकिन कैलोरी की कमी से जुड़ी समस्या को नहीं। यहां मुख्य मुद्दा विटामिन C का नहीं, बल्कि आयरन और जिंक का है। यह आलू दैनिक जरूरतों का एक छोटा सा हिस्सा ही पूरा कर पाता है, और पौधों से मिलने वाला आयरन शरीर में ठीक से अवशोषित नहीं हो पाता। एंथोसायनिन एंटीऑक्सीडेंट तो हैं, मगर इसके लाभ के बारे में अभी बहुत स्पष्ट जानकारी नहीं है। इसलिए, ‘कुफरी जामुनिया आलू’ एक उपयोगी और किफायती विकल्प है, लेकिन यह अपने आप में कोई पूर्ण समाधान नहीं है।
रंग के साथ-साथ कुफरी जमुनिया में मौजूद पोषण तत्व इसे खास बनाते हैं। सरकार द्वारा इस संबंध में तुलनात्मक आंकड़े भी जारी किए गए हैं। इसके अनुसार, 100 ग्राम कुफरी जमुनिया में 42.75 mg विटामिन C होता है, जबकि सामान्य आलू में यह मात्रा 23.15 mg है। इसमें आयरन की मात्रा 100 ग्राम में 3.22 mg है, जबकि सामान्य आलू में यह केवल केवल 0.57 mg है। इसी तरह, इसमें जिंक की मात्रा 2.28 mg है, जबकि सामान्य आलू में यह 0.28 mg है। आलू की इस किस्म में एंथोसायनिन भी पाए जाते हैं, जिनकी मात्रा गूदे की तुलना में छिलके में अधिक होती है। इस आलू के सेवन का मतलब है, शरीर में कुछ पोषक तत्वों की अधिक मात्रा पहुंचना। हालांकि, केवल पोषक तत्वों की मात्रा से यह तय नहीं होता कि शरीर उन्हें कितना सोख पाता है, या क्या नियमित रूप से आलू खाने से पोषक तत्वों की कमी दूर हो सकती है। खाना पकाने के तरीके, परोसी जाने वाली मात्रा, दूसरे आहार में शामिल अन्य चीजें और पोषक तत्वों को सोखने की शरीर की क्षमता - इन सभी बातों का महत्व होता है। वैसे, कुफरी जामुनिया देश में बेहतर पोषण मूल्य वाले रंगीन आलू विकसित करने का पहला प्रयास नहीं है। ICAR-CPRI ने कुफरी नीलकंठ और कुफरी माणिक जैसी किस्में भी विकसित की हैं। सरकार के अनुसार, कुफरी जामुनिया को आधिकारिक रूप से 2024 में जारी किया गया था।
देश में हिडन-हंगर यानी छिपे हुए कुपोषण का खतरा भी पिछले कुछ सालों में बढ़ा है। उदाहरण के तौर पर भरपूर खाना लेना, मगर उसमें पौष्टिक तत्वों का न होना। ऐसे में शरीर की भूख मिट जाती है, लेकिन हमारी बॉडी के लिए जरूरी न्यूट्रिएंट्स से नहीं मिल पाते। दिन में तीन बार भोजन करने वाले व्यक्ति में भी आयरन, जिंक या विटामिन A की कमी हो सकती है और उसे इसका पता तक नहीं चलता। भारत में चावल, गेहूं और अन्य परिष्कृत अनाजों पर आधारित भोजन पर्याप्त कैलोरी देने के बावजूद पोषण संबंधी कमियों का कारण बन सकता है। इस वजह से हिडन-हंगर एक ऐसी समस्या बन जाती है, जिसका आसानी से पता नहीं चलता। इससे सबसे ज्यादा महिलायें और बच्चे प्रभावित होते हैं। रिसर्च बताते हैं कि कैल्शियम, विटामिन A, B12, और फोलेट की कमी का खतरा व्यापक है। कुछ अध्ययनों के अनुसार, 80% से अधिक भारतीयों में कुछ खास पोषक तत्वों की कमी होने का जोखिम हो सकता है। इसके अलावा, आयरन, जिंक और विटामिन B6 की कमी भी आबादी के कुछ खास वर्गों को प्रभावित कर सकती है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) से पता चलता है कि बच्चों का पोषण अभी भी एक बड़ी चिंता है। 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों में 'स्टंटिंग' (उम्र के हिसाब से कम लंबाई) की दर NFHS-5 के 35.5% से घटकर 29.3% हो गई है। 'वेस्टिंग' (लंबाई के हिसाब से कम वजन) की दर 19% है, जबकि 5 वर्ष से कम उम्र के 31.8% बच्चों का वजन सामान्य से कम है। वर्ष 2023 से 2024 को कवर करने वाले इस सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि 6 से 23 महीने के केवल 15.3% बच्चों को ही पर्याप्त आहार मिल पाया। लिहाजा, बात केवल कैलोरी की उपलब्धता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि क्या परिवारों को पास विभिन्न प्रकार के पौष्टिक खाद्य पदार्थ मिल रहे हैं?
आयरन, जिंक, कैल्शियम या आयोडीन जैसे खनिजों (मिनरल्स) की कमी रक्त स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) और हड्डियों की मजबूती को प्रभावित कर सकती है। विटामिन A, D और B12 जैसे विटामिनों की कमी से आंखों की रोशनी, हड्डियों के मजबूती, ऊर्जा के स्तर और न्यूरोलॉजिकल विकास पर असर पड़ सकता है। कभी-कभी आहार में कैलोरी तो पर्याप्त होती है, लेकिन पोषक तत्वों की भारी कमी हो सकती है—खासकर तब, जब आहार में रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बहुत अधिक हो। विटामिन B12 की कमी उन लोगों में हो सकती है जिनके आहार में पशु-जनित खाद्य पदार्थ बहुत कम होते हैं, यह थकान और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का कारण बन सकती है। पौषक तत्वों की कमी को दूर करने में बायोफोर्टिफाइड फसलें (पोषक तत्वों से भरपूर फसलें) मददगार हो सकती हैं, क्योंकि ये उन खाद्य पदार्थों में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ा देती हैं जिन्हें लोग पहले से ही खा रहे हैं।
कुफरी जमुनिया का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि किसान इसे कितनी आसानी और भरोसे के साथ उगाते हैं और ग्राहक इसे कितना खरीदते हैं। कुफरी जमुनिया की प्रति हेक्टेयर 32-35 टन की पैदावार होती है। 90 दिनों के समय में किए गए स्टेशन ट्रायल्स में इसने लगभग 49 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार दर्ज की। इन ट्रायल्स में लगभग 90 प्रतिशत उपज को बाजार में बिक्री योग्य श्रेणी में रखा गया। इस किस्म को उत्तर भारतीय मैदानी क्षेत्रों में उगाने की सलाह दी गई है। बताया जाता है कि इसकी भंडारण क्षमता भी अच्छी है। यहां से देखने पर सबकुछ अच्छा लगता है, लेकिन ट्रायल परफॉर्मेंस से यह पक्का नहीं होता कि सभी खेतों में एक जैसे नतीजे मिलेंगे। व्यावसायिक स्तर पर इसे अपनाना बीजों की उपलब्धता, स्थानीय जलवायु और खेती की परिस्थितियों, उत्पादन लागत, बाजार मूल्य तथा इस बात पर निर्भर करेगा कि किसानों को स्थापित किस्मों की जगह इसे उगाने में कितना आर्थिक लाभ दिखाई देता है। इसके अलावा, आलू का विशिष्ट रंग भले ही लोगों का ध्यान आकर्षित करे, लेकिन क्या पराठे आदि में इसका स्वाद सामान्य आलू जैसा ही होगा, यह महत्वपूर्ण है। अगर स्वाद बेहतर या पहले जैसा ही लगेगा, तभी लोग इसे खरीदेंगे। मोरल ऑफ द स्टोरी ये है कि इसकी उपलब्धता और किफायती कीमत उतनी ही महत्वपूर्ण होंगी, जितनी इसमें मौजूद पोषक तत्वों की मात्रा। यदि यह किस्म एक सीमित बाजार तक सिमटकर रह जाती है या इसकी कीमत इतनी अधिक होती है कि कम आय वाले परिवार इसे खरीद नहीं पाते, तो इसका बड़े पैमाने पर लाभ नहीं मिलेगा।
| पोषण तत्व | कुफरी जामुनिया आलू (प्रति 100 ग्राम) | सामान्य आलू (प्रति 100 ग्राम) |
|---|---|---|
| विटामिन C | 42.75 mg | 23.15 mg |
| आयरन | 3.22 mg | 0.57 mg |
| जिंक | 2.28 mg | 0.28 mg |
| एंथोसायनिन | मौजूद | सामान्यतः कम या नगण्य |
| गूदे का रंग | जामुनी | सफेद या हल्का पीला |
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| आलू का नाम | कुफरी जामुनिया |
| विकसित करने वाली संस्था | भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (CPRI) |
| आधिकारिक रूप से जारी | 2024 |
| प्रमुख विशेषता | सामान्य आलू की तुलना में अधिक विटामिन C, आयरन और जिंक |
| प्राकृतिक पिगमेंट | एंथोसायनिन, जो एंटीऑक्सीडेंट के रूप में कार्य करते हैं |
| सामान्य पैदावार | 32–35 टन प्रति हेक्टेयर |
| स्टेशन ट्रायल में पैदावार | लगभग 49 टन प्रति हेक्टेयर |
| बाजार में बिक्री योग्य उपज | ट्रायल में लगभग 90 प्रतिशत |
| खेती के लिए उपयुक्त क्षेत्र | उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र |
| भंडारण क्षमता | अच्छी बताई गई है |
| प्रमुख पहलू | संभावित लाभ | सीमाएं और चुनौतियां |
|---|---|---|
| आयरन की कमी | आहार में आयरन की मात्रा बढ़ाने में मदद | पौधों से मिलने वाला आयरन शरीर में सीमित मात्रा में अवशोषित हो सकता है |
| जिंक की कमी | जिंक की उपलब्धता बढ़ाने में सहायक | दैनिक जरूरतों का केवल एक हिस्सा पूरा कर सकता है |
| विटामिन C | शरीर को विटामिन C उपलब्ध कराने में मदद | पकाने के तरीके से इसकी मात्रा प्रभावित हो सकती है |
| एंटीऑक्सीडेंट | एंथोसायनिन के माध्यम से एंटीऑक्सीडेंट मिलते हैं | इनके विशिष्ट स्वास्थ्य लाभों पर और शोध की जरूरत है |
| छिपा हुआ कुपोषण | पहले से खाए जाने वाले खाद्य पदार्थ के जरिए पोषण सुधारने का अवसर | अकेले आलू से सभी पोषक तत्वों की कमी दूर नहीं हो सकती |
| बच्चों का पोषण | संतुलित आहार का हिस्सा बन सकता है | बच्चों को विविध और पर्याप्त पोषण देना भी जरूरी है |
| किसानों की आय | अच्छी पैदावार होने पर आर्थिक अवसर मिल सकता है | बीज, लागत, बाजार मूल्य और स्थानीय परिस्थितियां अहम होंगी |
| आम लोगों तक पहुंच | किफायती कीमत पर उपलब्ध होने से लाभ बढ़ सकता है | अधिक कीमत या सीमित उपलब्धता से इसका उपयोग कम हो सकता है |
कुफरी जमुनिया को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर गंभीर प्रयासों की जरूरत होगी। कृषि एजेंसियों को बीजों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने में सहायता देनी होगी, किसानों को खेती की उपयुक्त पद्धतियों की जानकारी देनी होगी और अलग-अलग परिस्थितियों में इस फसल के प्रदर्शन का आकलन करना होगा। जानकारों का कहना है कि इसके लिए सरकार को बीज उत्पादन, किसानों को प्रोत्साहन और खरीद व्यवस्था को पीएम पोषण/मध्याह्न भोजन योजना, आंगनवाड़ियों तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसे माध्यमों से जोड़ना चाहिए। इसके अलावा। सप्लाई चेन, कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग कैपेसिटी में भी इन्वेस्टमेंट की ज़रूरत है।
Updated on:
27 Oct 2026, 4:50 PM IST
Published on:
27 Oct 2026, 4:50 PM IST
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