
साध्वी हर्षपूर्णाश्री
युवाओं से बने सीधा संपर्क
साध्वी हर्षपूर्णाश्री ने कहा कि युवा वर्ग को धर्म के निकट लाने के लिए केवल धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करना पर्याप्त नहीं है। युवाओं के बीच जाकर उनसे संवाद करना होगा। साधु-संतों का संपर्क जितना बढ़ेगा, उतनी ही उनमें धर्म के प्रति जिज्ञासा पैदा होगी। धर्म के लिए प्रेरणा देनी पड़ती है। युवाओं को धर्म के नियमों और उनके पीछे छिपे जीवन-मूल्यों को सरल भाषा में समझाना जरूरी है। आज संस्कारों पर समय के प्रभाव को भी देखा जा रहा है। ऐसे में बच्चों को बचपन से ही अच्छे संस्कार देने की जरूरत है। घर का वातावरण, माता-पिता का व्यवहार और धार्मिक गतिविधियों से जुड़ाव बच्चे के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालता है।
मोबाइल से दूरी नहीं, सही उपयोग की समझ जरूरी
मोबाइल आज जीवन का हिस्सा बन चुका है। इसे पूरी तरह नकारना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि मोबाइल का उपयोग किस तरह किया जाए। कम उम्र में मोबाइल देने के बजाय उम्र और जरूरत के अनुसार उसका उपयोग कराया जाए। मोबाइल ज्ञान और सीखने का माध्यम भी बन सकता है, बशर्ते उसका सदुपयोग किया जाए। धर्म और जिनवाणी के संदेशों को भी आज के डिजिटल माध्यमों से युवाओं तक पहुंचाया जा सकता है। युवा जिस माध्यम से जुड़ रहे हैं, उसी माध्यम का सकारात्मक उपयोग धर्म और संस्कारों के प्रसार के लिए किया जाना चाहिए। सामायिक मन को एकाग्र करने और स्वयं को भीतर से देखने का अवसर देती है। इसके साथ ही महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। जिनवाणी केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को बदलने के लिए है। व्यक्ति में जिज्ञासा और एकाग्रता हो तो जिनवाणी के श्रवण से जीवन में बदलाव निश्चित रूप से आ सकता है।
खान-पान में बदलाव का असर
बदलती जीवनशैली और खान-पान को लेकर भी साध्वी ने चिंता जताई। उन्होंने कहा कि फल और सब्जियों की शुद्धता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली और खान-पान में आए बदलाव का असर स्वास्थ्य पर दिखाई दे रहा है। कम उम्र में ही कई तरह की बीमारियां सामने आने लगी हैं। इसलिए भोजन में संयम, शुद्धता और प्राकृतिक जीवनशैली पर ध्यान देना जरूरी है।
43 साल पहले ली दीक्षा, हजारों किलोमीटर का विहार
मूल रूप से सिवाना की रहने वाली साध्वी हर्षपूर्णाश्री ने करीब 43 साल पहले दीक्षा ली। इसके बाद उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों में विहार किया। अब तक हजारों किलोमीटर की यात्रा कर चुकी हैं। कर्नाटक में बेंगलूरु सहित कई शहरों में चातुर्मास कर चुकी साध्वी वर्तमान में गदग में चातुर्मास कर रही हैं।
योग दृष्टि और उत्तराध्ययन सूत्र पर हो रहा विवेचन
चातुर्मास के दौरान धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन और उनके जीवनोपयोगी संदेशों पर प्रवचन चल रहे हैं। साध्वी ने बताया कि योग दृष्टि में आठ प्रकार की दृष्टियों का उल्लेख है और वर्तमान में इसी विषय पर विवेचन चल रहा है। आगे इसके विभिन्न पक्षों को विस्तार से समझाया जाएगा। चातुर्मास के दौरान उत्तराध्ययन सूत्र का भी अध्ययन और श्रवण कराया जा रहा है। दीपावली के आसपास नौ दिवसीय श्रीपाल का रास चरित्र भी आयोजित किया जाएगा।
पाठशालाओं से जुड़े बच्चे, माता-पिता की भी भूमिका
साधु-संतों का आगमन, पाठशालाओं के माध्यम से बच्चों को धर्म और संस्कारों से जोडऩे के प्रयास महत्वपूर्ण हैं। लेकिन बच्चों को धार्मिक गतिविधियों से जोडऩे में माता-पिता की भूमिका भी उतनी ही जरूरी है। केवल बच्चों को पाठशाला भेज देना पर्याप्त नहीं है। माता-पिता स्वयं धर्म और संस्कारों को जीवन में अपनाएंगे तो बच्चों पर उसका प्रभाव अधिक पड़ेगा। चातुर्मास के दौरान ध्यान, जिनवाणी श्रवण और धार्मिक गतिविधियों से लोगों को जोडऩे का प्रयास किया जा रहा है। कई श्रद्धालु रात्रि भोजन का त्याग भी करने लगे हैं। यह बदलाव केवल धार्मिक संकल्प नहीं, बल्कि संयमित जीवनशैली की ओर बढ़ता कदम है।
जिनवाणी श्रवण से जीवन में आएगा बदलाव
साध्वी हर्षपूर्णाश्री ने कहा कि जिनवाणी का श्रवण मनुष्य को अपने जीवन पर विचार करने की प्रेरणा देता है। केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं, उसे जीवन में उतारना जरूरी है। जिज्ञासा, एकाग्रता और निरंतर अभ्यास के साथ जिनवाणी के संदेशों को अपनाया जाए तो जीवन में सकारात्मक बदलाव निश्चित रूप से आ सकता है।
Updated on:
27 Sept 2026 07:49 pm
Published on:
27 Sept 2026 07:02 pm
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