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khasgi trust: 1969 में वाराणसी से शुरू हुआ था ‘संपत्तियों में खेल’, हरिद्वार, रामेश्वर की भी प्रॉपर्टी बेच दी

सीए के पत्र में सरकार ने सहमति नहीं दी, लेकिन यही मूक सहमति बनी ट्रस्ट डीड का आधार

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इंदौर

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Manish Geete

Oct 10, 2020

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The Khasgi (Devi Ahilyabai Holkar Charities) Trust, Indore

इंदौर। खासगी ट्रस्ट में संपत्तियों की बिक्री और लीज पर देने के मामलों का खुलासा होने के बाद अब प्रशासन ने 246 संपत्तियों से जुड़ी जमीनों का हिसाब-किताब भी ट्रस्ट से मांगा है। बेची गई संपत्तियों की जांच में सामने आया, यह संपत्तियां धर्मस्थलों के रखरखाव के लिए थी। इसकी जानकारी ट्रस्ट की संपत्ति की सूची के साथ मिलान नहीं हो रही है।

जैसे वाराणसी स्थित नागवा बगीचे की 2.56 एकड़ जमीन खासगी संपत्ति थी, इसकी आय का उपयोग वहां के धर्मस्थलों के लिए होता था। इससे बेचने की अनुमति के लिए लिखे पत्र से खासगी संपत्तियों को बेचने और सरकार के नुमाइंदों की मूक सहमति का खुलासा हुआ है। इस मामले में इंदौर में 2012 के पहले पदस्थ संभागायुक्तों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। 1969 के पत्र का अनुसरण आंख बंदकर क्यों किया?

दरअसल 1948 से पहले देश में 28 स्थानों पर होलकर रानियों ने 246 स्थानों का निर्माण किया। इनमें कई मंदिर हैं। जिस तरह से बेचने और लीज पर देने के प्रकरण सामने आए हैं, इनमें मंदिरों से जुड़ी जमीनें और अतिरिक्त संपत्तियां हैं। प्रारंभिक जांच में एक तथ्य सामने आया, ट्रस्ट की ओर से बनाए मंदिरों के साथ रखरखाव के लिए जमीनें या बगीचे रखे गए थे। इसका पहला प्रमाण 1969 में ट्रस्ट के सचिव एमएम जगदाले की ओर से लिखे पत्र से मिल रहा है। ट्रस्ट ने वाराणसी स्थित नागवा बगीचे को बेचने के लिए सरकार से अनुमति मांगी थी। 2.56 एकड़ जमीन बेचने के लिए तत्कालीन मुख्य सचिव एमपी श्रीवास्तव ने यह कहते हुए मना कर दिया, सरकार ट्रस्ट से जुड़ी संपत्तियों और जमीनों को बेचने के मामले में पिक्चर में नहीं आना चाहती है, इसलिए ट्रस्ट की संपत्ति को बेचने के लिए किसी तरह की अनुमति का सवाल ही नहीं उठता है। आगे इसी पत्र ने ट्रस्टियों का हौंसला बढ़ाया और जमीनों के सौदे के रास्ते निकाले जाने लगे। हालांकि कोर्ट ने इस पत्राचार को वैधानिक नहीं माना। ट्रस्टियों ने एक सप्लीमेंट्री डीड बनाकर संपत्तियों को बेचने और लीज पर देने का सिलसिला शुरू कर दिया। सरकार इस बात की भी जांच करेगी।


हरिद्वार, खरगौन, वाराणसी और रामेश्वर में संपत्तियां बेचीं, कई लीज पर दीं

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संपत्तियों पर आधिपत्य को लेकर हाईकोर्ट के फैसले पर क्रियान्वयन के लिए मुख्य सचिव ने मध्यप्रदेश के बाहर की संपत्तियों को लेकर वहां की सरकारों से सहयोग लेने की रणनीति बनाई है। इधर स्थानीय संपत्तियों को आधिपत्य में लेने की तैयारियां तेज कर दी गई हैं। संपत्तियों पर आधिपत्य लेने का सिलसिला शुक्रवार से जारी है। इसके पहले महेश्वर की सभी 102 संपत्तियां आधिपत्य में ले ली गईं।

खासगी ट्रस्ट की 6 संपत्तियां बेचने का खुलासा हुआ है। संभागायुक्त डा. पवन कुमार शर्मा ने शुक्रवार को मामले की समीक्षा कर 12 जिलों के कलेक्टर को दूसरे राज्यों की संपत्तियों की जानकारी एकत्रित करने को कहा है। 2012 में कुशावर्त घाट की संपत्ति को बेचने के खुलासे के बाद जांच में रामेश्वरम और नीमच के समीप पुष्कर मंदिर से जुड़ी संपत्तियों को बेचने से रोका गया। अब तक रामेश्वरम, खरगौन, हरिद्वार, वाराणसी और पुष्कर मंदिर की संपत्तियां खुर्द-बुर्द की गई हैं। 2008 में तत्कालीन प्रमुख सचिव की जांच के बाद से खरीद-बिक्री का मामला रुक गया, लेकिन ट्रस्टियों की ओर से कुछ प्रमुख संपत्तियों को 30-30 साल की लीज पर देने की बात सामने आई है।

ऐसे बेचा कुशावर्त घाट

इंदौर के खासगी ट्रस्ट की ओर से हरिद्वार के कुशावर्त घाट और इससे लगे होल्कर बाड़े को बेचने का भी मामला उजागर हुआ था। हरिद्वार में 9 अप्रैल 2019 को एफआईआर भी दर्ज की गई थी। इस एफआईआर के अनुसार 2007 में मुख्य ट्रस्टी सतीश चंद्र मल्होत्रा ने घाट और बाड़े की 13370 वर्गफीट जमीन को कूट रचित दस्तावेजों के आधार पर राघवेंद्र सिखौला नामक व्यक्ति के नाम कर दी। जबकि मल्होत्रा को पावर आफ अटार्सी बनाने का भी अधिकार नहीं था। राघवेंद्र सिखौला और भी चालाक था, उसने दो साल पहले ही इस जमीन को अपनी पत्नी निकिता और भाई अनिरुद्ध के नाम कर दी। इसकी रजिस्ट्री भी हो गई और घाट और होलकर बाड़े का कब्जा भी ले लिया गया था। इस मामले में कुछ लोगों ने आपत्ति की थी, जिसके बाद उत्तराखंड सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश भी की गई थी।