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इंदौर। होलकर वंश की अरबों रुपए की खासगी संपत्तियां पूरे देश में फैली है। इनमें मंदिर, घाट, धर्मशाला, कुएं और अन्य जन उपयोगी साधन शामिल है। महारानी अहिल्याबाई ने खासगी जागीर से मिले खजाने का खूब उपयोग किया और देशभर में धर्म और लोक आश्रम स्थल बनाए। इंदौर के पास हातोद, हरसौला और बरलाई तालुका समेत 11 गांव खासगी की जागीर थे। इनसे मिलने वाला 2 लाख 99 हजार 10 रुपए का लगान खासगी खजाने में जमा होता था। यह खजाना होलकर के दौलती खजाने से अलग था। इसे 286 साल पहले होलकर वंश की रानियों के हाथ-खर्च चलाने के लिए बनाया था। खासगी संपत्तियों के निर्माण का उल्लेख 'होलकरशाहीची इतिहासाची साधने' में मिलता है।
पेशवा छत्रपति साहू ने पत्र जारी किया और खजाने को अलग नाम दिया, जो खासगी खजाना कहलाया। पत्र में यह भी उल्लेख है, इस खजाने का संचालन होलकर राजवंश की कुटुंब प्रमुख महिला करेगी। वही इसकी मालकिन होगी। 1766 में गौतमी बाई ने 16 करोड़ का खजाना अहिल्याबाई को सौंपा था। उन्होंने दौलती खजाने के लिए तो तुलसीपत्र रख दिया था, लेकिन इस खजाने का इस्तेमाल लोक उपयोगी साधन और धर्म स्थल निर्माण के लिए किया। उन्होंने देश में कई मंदिर, नदियों पर घाट और धर्मशालाएं बनवाईं। बाद में कृष्णाबाई होलकर ने भी मंदिर बनवाए। इंदौर का गोपाल मंदिर इसी खजाने से बना है।
होलकर के दो खजाने
होलकर शासन में दो खजाने होते थे। एक दौलती और दूसरा खासगी खजाना। दौलती खजाना सार्वजनिक खर्च के लिए होता था। यह खजाना रानी की मिल्कियतहोता था। बाद में खासगी खजाना और खास बन गया, इसमें युद्ध जीतने पर मिली लूट-खसौट की राशि और जागीर जमा होने लगी।
ऐसे खुला बेचने का राज
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उललेख किया कि खासगी ट्रस्ट की संपत्तियों को बेचने का सिलसिला 2005 से ही शुरू हो चुका था। ट्रस्टियों ने कान्ह नदी किनारे साउथ तोड़ा जूनी इंदौर स्थित गणपति मंदिर की 1800 वर्गफीट की संपत्ति अंजुल रहमान को 720 रुपए सालाना किराए पर 30 साल के लिए लीज पर दे दी। इसके बाद 2008 में कुशावर्त घाट बेचने का निर्णय लिया गया। रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग से लगी 14 एकड़ जमीन भी बेच दी खासगी ट्रस्ट की जमीनों को बेचने का सिलसिला ट्रस्ट डीड में बदलाव के बाद शुरू हो गया था। आश्चर्य की बात यह है, सेंट्रल और राज्य सरकार के प्रतिनिधि भी इन खासगी संपत्तियों को रखरखाव के नाम पर बेचने के लिए सहमति देते गए। नीमच के समीप पुष्कर की संपत्तियों को भी बेचने की भनक लगी तो जांच करवाई गई, जिसमें पता चला तीनों संपत्तियां बेच दी गईं। इसीतरह बनारस में 15 संपत्तियां हैं, जिनके सौदे रखरखाव करने वालों से होने की जानकारी मिली है।
प्रदेश सरकार ने बनाए दो ट्रस्ट
यशवंतराव होलकर तृतीय के 1962 में निधन के बाद पुत्री उषाराजे होलकर खासगी संपत्ति की वारिस बनीं। 1962 में प्रदेश सरकार ने दो ट्रस्ट बनाए।
पहला ट्रस्टः महारानी उषादेवी ट्रस्ट
इसमें यशवंतराव होलकर तृतीय की समस्त संपत्ति शामिल हैं बाद में इसका नाम देवी अहिल्याबाई होलकर एजुकेशन ट्रस्ट कर दिया गया।
दूसरा ट्रस्टः खासगी (देवी अहिल्याबाई होलकर चेरिटीज)
इस ट्रस्ट में खासगी संपत्ति शामिल है। 1972 में खासगी ट्रस्ट की ट्रस्ट डीड में बदलाव किया गया। यहीं से इन संपत्तियो को बेचने का सिलसिला शुरू हुआ।
ऐसे अस्तित्व में आया खासगी खजाना
होलकर वंश के इतिहास के जानकार सुनील गणेश मतकर का कहना है कि एक बार मल्हारराव होलकर की पत्नी गौतमाबाई ने पेशवा को शिकायत की, महाराज हमेशा य़ुद्द के लिए बाहर रहते हैं। हमें परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होता है। इसके लिए अलग इंतजाम किया जाना चाहिए। पेशवा के सामने दुविधा थी कि इनाम दिया तो मल्हारराव के साथ ही शिंदे, गायकवाड़ा, पंवार और अन्य नाराज हो जाएंगे। ऐसे में तय किया, 2 लाख 99 हजार 10 रुपए सालाना लगान वाले गांव खासगी जागीर के तौर पर दिए जाएं। इसमें महेश्वर, चौली, हरसौला, सांवेर के समीप बरलाई तलुन, हातोद, महिदपुर, जगोटी, करंजमा मध्यभारत प्रांत के गांव दिए। इनका लगान 2.63 लाख रुपए होता था। कुछ गांव दक्षिण में चांदबड़, अंबाड़ा, कोरेगांव थे, इनसे 36010 रुपए सालाना लगान मिलता।
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Published on:
8 Oct 2020, 4:30 PM IST
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