यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें हृदय के कक्ष फैल जाते हैं और सिकुडऩे की क्षमता खो देते हैं। यह अक्सर बाएं वेंट्रिकल (निचले कक्ष) में शुरू होता है। जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, यह दाएं वेंट्रिकल और एट्रिया (शीर्ष कक्ष) तक फैल सकती है। इसकी वजह से हृदय की मांसपेशियों के ब्लड को पंप करने की क्षमता में कमी आने लगती है। इन स्थितियों में हार्ट फेलियर भी हो सकता है। इसका कोई इलाज नहीं है, लेकिन दवा के माध्यम से इसे नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। इससे पीड़ित व्यक्ति को विशेषज्ञों की नियमित मॉनिटरिंग की आवश्यकता होती है।