
राजस्थान में दशहरा की दिल छू लेने वाली कहानियां (पत्रिका फोटो)
जयपुर: दशहरे पर जब रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले आग की लपटों में समा जाते हैं, तब मैदान में बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन इन विशाल पुतलों को आकार देने वाले हाथ एक और कहानी कहते हैं-साझी संस्कृति और हिंदू-मुस्लिम एकता की।
राजस्थान के अलग-अलग शहरों में मुस्लिम कारीगर पीढ़ियों से दशहरे की इस परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं। बांस, कागज, कपड़े और रंगों से तैयार होने वाले ये पुतले केवल कारीगरी का नमूना नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और सांस्कृतिक साझेदारी के प्रतीक भी हैं। बीकानेर और अजमेर में पांचवीं पीढ़ी, श्रीगंगानगर में चौथी पीढ़ी, जबकि अनूपगढ़ और भीलवाड़ा में तीन पीढ़ियों से यह हुनर आगे बढ़ रहा है।
उदयपुर में एक मुस्लिम परिवार चार दशक से पुतले बना रहा है। पाली में निजाकत अली अपने दादा और पिता की विरासत संभाल रहे हैं, वहीं अलवर में इस बार आगरा के जाफर अली की टीम को यह जिम्मेदारी मिली है।
बीकानेर में रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले बनाने का जिम्मा उत्तर प्रदेश के बागपत निवासी मुरसलीम खान उर्फ सलीम के परिवार के पास है। परिवार की पांचवीं पीढ़ी इस हुनर को आगे बढ़ा रही है। सलीम की टीम को तीनों पुतलों के साथ लंका बनाने में करीब 35 से 40 दिन लगते हैं। निर्माण सामग्री दिल्ली से मंगाई जाती है।
समय के साथ पुतलों की ऊंचाई और मोटाई बढ़ी है। पहले आतिशबाजी हाथ से की जाती थी, लेकिन अब इलेक्ट्रॉनिक तकनीक का इस्तेमाल होता है। सलीम बताते हैं कि निर्माण शुरू करने से पहले शुभ मुहूर्त देखा जाता है और कारीगरों का मुंह मीठा कराया जाता है। करीब 14 साल पहले तूफान से पुतले क्षतिग्रस्त हो गए थे, लेकिन टीम ने लगातार 36 घंटे मेहनत कर उन्हें दोबारा तैयार कर दिया था।
भीलवाड़ा में अब्दुल समद शोरगर का परिवार तीन पीढ़ियों से दशहरे के लिए पुतले तैयार कर रहा है। बांस, कागज और अन्य सामग्री से रावण के पुतले बनाने की पारंपरिक कला समय के साथ आधुनिक तकनीक से जुड़ गई है। पहले पुतलों का ढांचा तैयार करने और उन्हें खड़ा करने में काफी मेहनत लगती थी, लेकिन अब क्रेन और हाइड्रोलिक संसाधनों की मदद से यह काम अपेक्षाकृत आसान और सुरक्षित हो गया है।
विशाल पुतलों को संतुलित रखते हुए खड़ा करना आज भी कारीगरों के लिए बड़ी चुनौती है। निर्माण के दौरान हर हिस्से की मजबूती का ध्यान रखना पड़ता है, ताकि दहन के समय कोई अनहोनी न हो। परिवार इस काम को केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा मानता है। काम शुरू करने से पहले परिवार के सदस्य दुआ और प्रार्थना करते हैं, ताकि निर्माण बिना किसी बाधा के पूरा हो। दशहरे पर तैयार पुतले जब मैदान में खड़े होते हैं, तो उनके पीछे कई दिनों की मेहनत और पुश्तैनी हुनर दिखाई देता है।
पाली में आगरा के निजाकत अली अपने दादा नवाब अली और पिता हाजी अशरफ अली की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके परिवार में रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले बनाने का काम तीन पीढ़ियों से जारी है। निजाकत करीब 40 से 45 कारीगरों के साथ इस बार 40 पुतले तैयार कर रहे हैं। वे पिछले 15 वर्षों से पाली आ रहे हैं।
उनके पिता के समय गुजरात के अहमदाबाद में 50 फीट तक ऊंचे पुतले बनाए जाते थे, लेकिन अब 30 से 70 फीट तक के पुतले तैयार किए जा रहे हैं। एक पुतला बनाने में करीब पांच से छह दिन लगते हैं। काम शुरू करने से पहले वे दिवंगत बुजुर्गों को याद कर उनके नाम पर फातिहा पढ़ते हैं। यह उनके लिए रोजगार के साथ परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने का जरिया भी है।
श्रीगंगानगर में रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले तैयार करने के लिए उत्तर प्रदेश के आगरा मूल के शाहरुख खान का परिवार वर्षों से इस काम में जुटा है। फिलहाल पंजाब के मोगा में रहने वाले शाहरुख परिवार की चौथी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी टीम में पांच से सात कारीगर शामिल रहते हैं।
तीनों पुतलों को तैयार करने में करीब 10 से 12 दिन लगते हैं। निर्माण पर लगभग ढाई से तीन लाख रुपये खर्च होते हैं। आतिशबाजी का खर्च अलग रहता है, जिसे आयोजक अपनी जरूरत और बजट के अनुसार तय करते हैं।
पुतलों को आकार देने के साथ उन्हें सुरक्षित खड़ा करना भी बड़ी चुनौती होती है। तेज हवा और प्रतिकूल मौसम के बीच विशाल पुतलों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। बदलती तकनीक और निर्माण सामग्री के साथ कारीगरों को अपने हुनर में लगातार बदलाव करना पड़ता है। पीढ़ियों से चला आ रहा यह काम दशहरे की परंपरा को जीवित रखने में अहम भूमिका निभा रहा है।
अनूपगढ़ में रावण के पुतले को जलाने से पहले उसकी पूजा करने की परंपरा विशेष आकर्षण रखती है। यहां उत्तर प्रदेश के कारीगर दुष्यंत उर्फ मोनू चौहान का परिवार तीन पीढ़ियों से पुतले बनाने का काम कर रहा है। धानमंडी फेज-2 में रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले तैयार करने के लिए मुख्य कारीगर लखबीर सिंह के नेतृत्व में चार सदस्यों की टीम करीब 15 दिन मेहनत करती है।
मजबूत ढांचा बनाने के लिए असम से बांस मंगाए जाते हैं, जबकि अखबार, रद्दी, रंगीन कागज, लोहे के कड़े और पुरानी साड़ियां दिल्ली से लाई जाती हैं। इस बार रावण 70 से 75 फीट, कुंभकरण 70 फीट और मेघनाद 65 फीट ऊंचा तैयार किया जाना है।
कारीगरों के सामने इतने विशाल पुतलों को संतुलित रखते हुए सुरक्षित खड़ा करने की चुनौती रहती है। उनका मानना है कि रावण प्रकांड विद्वान था, इसलिए दहन से पहले उसकी पूजा-अर्चना कर प्रसाद चढ़ाया जाता है।
अलवर में पुरुषार्थी समाज की ओर से आयोजित दशहरा समारोह में इस बार रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले बनाने की जिम्मेदारी आगरा के ठेकेदार जाफर अली को सौंपी गई है। करीब 20 वर्षों तक डीग के कारीगर यहां पुतले बनाने आते थे।
जाफर की टीम देश के अलग-अलग हिस्सों में दशहरे के लिए पुतले तैयार करती है और श्रीलंका में भी काम कर चुकी है। पुतले बनाने के लिए ढांचे से लेकर चेहरे और सजावट तक कई चरणों में काम होता है। विशाल पुतलों को सुरक्षित खड़ा करने के लिए भी काफी मेहनत करनी पड़ती है। अलवर के दशहरा समारोह में मुस्लिम कारीगरों की भागीदारी इस बात की मिसाल है कि धार्मिक उत्सवों से जुड़ी परंपराएं आपसी सौहार्द को बढ़ावा देती हैं।
उदयपुर में मथुरा के शाकिर अली का परिवार करीब 40 साल से दशहरे के लिए रावण, मेघनाद, कुंभकरण और सोने की लंका तैयार कर रहा है। परिवार की तीसरी पीढ़ी भी इस काम में जुटी है। दशहरे की तैयारियों के लिए परिवार डेढ़ महीने तक उदयपुर में रहता है। शक्तिनगर स्थित कम्युनिटी हॉल में पुतलों का निर्माण किया जाता है।
विशाल पुतलों को आकार देने के लिए बांस, कागज और अन्य सामग्री से ढांचा तैयार किया जाता है। परिवार के लिए यह काम सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि वर्षों से निभाई जा रही जिम्मेदारी है। हर साल दशहरे पर जब पुतले मैदान में पहुंचते हैं, तो उनके साथ परिवार की चार दशक पुरानी मेहनत और परंपरा भी सामने आती है।
अजमेर में कारीगर शब्बीर का परिवार पांचवीं पीढ़ी से रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतले बना रहा है। शब्बीर के अनुसार, अजमेर में उनके दादा-परदादा ने इस काम की शुरुआत की थी। परिवार के कारीगर कई राज्यों में पुतले तैयार करते रहे हैं।
ढांचे को मजबूती देने के साथ पुतलों के आकार और सजावट पर विशेष ध्यान दिया जाता है। शब्बीर बताते हैं कि काम शुरू करने से पहले कारीगर भगवान का नाम लेकर प्रार्थना करते हैं कि काम अच्छी तरह पूरा हो। विशाल पुतलों को संतुलित रखने और सुरक्षित तरीके से स्थापित करने के लिए कारीगरों को विशेष सावधानी बरतनी पड़ती है।
Updated on:
20 Oct 2026 10:31 am
Published on:
20 Oct 2026 10:31 am
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