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jaisalmer: चुनाव से पहले गांवों में रिश्ते साध रहे दावेदार, समीकरणों की बिछ रही बिसात

जैसलमेर में पंचायत चुनाव की तारीख घोषित होते ही गांवों में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। पहले चरण में होने वाले चुनावों को लेकर संभावित दावेदार गांवों और ढाणियों में संपर्क बढ़ा रहे हैं। रिश्तेदारों से मुलाकात, चौपाल की बैठकों और सामाजिक कार्यक्रमों में मौजूदगी के जरिए समर्थन जुटाने की कवायद शुरू हो गई है।
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जैसलमेर. पंचायत चुनाव की तारीख घोषित हुई है, लेकिन गांवों में चुनावी गतिविधियां उससे पहले ही शुरू हो गई हैं। जैसलमेर में पहले चरण में जिला परिषद, पंचायत समिति, सरपंच और वार्डपंच के चुनाव होने हैं। ऐसे में संभावित दावेदारों ने गांव और ढाणियों में अपनी मौजूदगी बढ़ा दी है। चुनावी पोस्टर या औपचारिक प्रचार से पहले रिश्तों की राजनीति और समर्थन जुटाने की कवायद तेज हो गई है। सुबह किसी रिश्तेदार के घर पहुंचना हो या शाम को चौपाल पर बैठना, सामाजिक कार्यक्रम में मौजूदगी हो या पुराने परिचित से मुलाकात—अब हर गतिविधि को चुनावी नजर से देखा जा रहा है। लंबे समय से गांव की राजनीति से दूर दिखने वाले चेहरे भी फिर सक्रिय नजर आने लगे हैं। निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के साथ राजनीतिक दलों से जुड़े स्थानीय नेता भी संभावित उम्मीदवारों के संपर्क में हैं।

एक पंचायत में कई चेहरे, मुकाबला अभी से दिलचस्प

कई पंचायतों में सरपंच पद के लिए आधा दर्जन से अधिक संभावित दावेदार बताए जा रहे हैं। इससे चुनावी गणित एकतरफा होने के बजाय बहुकोणीय बनता दिखाई दे रहा है। दावेदार अपने परिवार और समर्थकों तक सीमित नहीं हैं। उन परिवारों से भी संपर्क बढ़ाया जा रहा है, जिनका गांव के सामाजिक समीकरण में प्रभाव है। कहीं एक ही समाज से कई दावेदार सामने हैं तो कहीं रिश्तेदारी के दो खेमे अलग-अलग चेहरों के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि कौन चुनाव लड़ना चाहता है, बल्कि किसके साथ कितने परिवार और कितने प्रभावशाली लोग खड़े होते हैं, यही है।

रूठों को मनाने से पुराने संपर्कों की वापसी तक

गांव की राजनीति में व्यक्तिगत संबंधों की भूमिका चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन गई है। संभावित प्रत्याशी पुराने मतभेद दूर करने, नाराज रिश्तेदारों को मनाने और प्रभावशाली परिवारों से संपर्क बढ़ाने में जुटे हैं। बुजुर्गों से मुलाकात के साथ युवाओं को साथ जोड़ने की कोशिश भी चल रही है।सोशल मीडिया पर सक्रियता बढ़ी है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में आमने-सामने की मुलाकात अब भी सबसे प्रभावी माध्यम बनी हुई है। यही वजह है कि दावेदारों की आवाजाही सुबह से देर शाम तक दिखाई दे रही है।

आरक्षण ने बदली चुनावी पटकथा, नए चेहरे तलाश रहे रास्ता

आरक्षण की तस्वीर सामने आने के बाद कई पुराने दावेदारों की तैयारी थम गई, जबकि कुछ पंचायतों में नए चेहरे अचानक चर्चा में आ गए। जिन पंचायतों में महिला सीट आई है, वहां परिवारों ने रणनीति बदलनी शुरू कर दी है। कई जगह राजनीतिक रूप से सक्रिय परिवार अपनी महिलाओं को आगे करने की तैयारी में हैं। अब गांवों में चर्चा उम्मीदवार की घोषणा से पहले ही शुरू हो गई है—कौन चेहरा होगा, उसके पीछे कौन परिवार होगा और किस सामाजिक समूह का समर्थन किस ओर जाएगा।

पंचायत चुनाव का स्थानीय गणित

- रिश्ते बनाम संगठन: पंचायत चुनाव में व्यक्तिगत संपर्क कई बार पार्टी पहचान से ज्यादा प्रभावी होते हैं।

- चौपाल से घर तक नेटवर्क: संभावित प्रत्याशी प्रभावशाली परिवारों और पुराने संपर्कों को फिर सक्रिय कर रहे हैं।

- एक सीट, कई दावेदार: ज्यादा दावेदार होने से अंतिम समय तक समीकरण बदलने की संभावना रहेगी।

- महिलाओं की भूमिका बढ़ी: आरक्षण ने कई परिवारों को अपनी चुनावी रणनीति नए सिरे से बनाने पर मजबूर किया।

- युवाओं पर नजर: सोशल मीडिया और व्यक्तिगत संपर्क के जरिए युवा मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाई जा रही है।

फैक्ट फाइल

- 266 ग्राम पंचायतें जैसलमेर जिले में

- 10 पंचायत समितियां

- 150 पंचायत समिति वार्ड

- 21 जिला परिषद वार्ड

यह है धरातल की तस्वीर

- अभी नाम तय नहीं, लेकिन नेटवर्क सक्रिय: दावेदार संभावित समर्थन का आकलन कर रहे हैं।

- सामाजिक कार्यक्रम बने संपर्क का माध्यम: छोटी से छोटी मौजूदगी भी चुनावी संदेश बन रही है।

-परिवारों की भूमिका अहम: कई जगह उम्मीदवार से पहले उसके परिवार का प्रभाव तौला जा रहा है।

-अंतिम तस्वीर बाकी : नामांकन तक कई दावेदार पीछे हट सकते हैं और नए चेहरे सामने आ सकते हैं।

एक्सपर्ट व्यू :पहले रिश्ते, फिर चुनावी गणित

पंचायत चुनावों में व्यक्ति की स्थानीय स्वीकार्यता बहुत मायने रखती है। परिवार, रिश्तेदारी, सामाजिक संबंध और गांव में लंबे समय से बनी व्यक्तिगत पकड़ उम्मीदवार की ताकत बनती है। आरक्षण के बाद कई जगह पुराने समीकरण बदले हैं। इसलिए अभी जो दावेदार मजबूत दिखाई दे रहे हैं, अंतिम मुकाबले तक उनके साथ खड़ा सामाजिक समर्थन बदल सकता है।

- शैलेष जोशी, राजनीतिक विश्लेषक