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jaisalmer: लंबे इंतजार से बढ़ेगी चुनावी मशक्कत, समर्थकों को साधने के साथ खर्च संभालने की चुनौती

पंचायतराज चुनाव की तारीखें आगे खिसकने से सरपंच पद के दावेदारों की चुनावी मशक्कत बढ़ गई है। पहले चरण में मतदान की उम्मीद लगाए बैठे प्रत्याशियों को अब 16 नवंबर तक इंतजार करना होगा, जबकि जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के चुनाव 14 नवंबर को होंगे। जिले की 266 ग्राम पंचायतों में दावेदारों के सामने लंबे समय तक जनसंपर्क बनाए रखने और चुनावी खर्च का हिसाब संभालने की चुनौती बढ़ रही है।
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एआई

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जैसलमेर. सीमावर्ती जिले में पंचायतराज चुनाव की तारीखें आगे खिसकने से राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को तैयारियों के लिए अतिरिक्त समय जरूर मिला है, लेकिन सरपंच पद के दावेदारों के लिए यह समय अब चुनौती बनता नजर आ रहा है। पहले चरण में मतदान की उम्मीद लगाए बैठे प्रत्याशियों को अब चौथे चरण तक इंतजार करना पड़ रहा है। जिले में जिला परिषद और पंचायत समिति सदस्यों के लिए 14 नवंबर को मतदान होगा, जबकि मतगणना 20 नवंबर को करवाई जाएगी। ग्राम पंचायतों में सरपंच पद के लिए 16 नवंबर को मतदान निर्धारित है। जिले की 266 ग्राम पंचायतों में चुनावी गतिविधियां तेज होने के साथ दावेदारों के सामने जनसंपर्क बनाए रखने और खर्च का हिसाब संभालने की चुनौती भी बढ़ रही है।

तारीख आगे खिसकी, चुनावी खर्च का मीटर चालू

चुनाव कार्यक्रम में बदलाव से प्रत्याशियों को प्रचार की तैयारियों के लिए अतिरिक्त समय मिला है, लेकिन लंबे समय तक चुनावी सक्रियता बनाए रखना आसान नहीं है। संभावित उम्मीदवार गांवों में मतदाताओं से संपर्क, रिश्तेदारियों में मेल-मुलाकात, सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी और समर्थकों के साथ बैठकों में जुटे हैं। मतदान की तारीख नजदीक आने तक इन गतिविधियों को जारी रखने की जरूरत रहेगी। ऐसे में आवाजाही, बैठकों और अन्य चुनावी तैयारियों पर खर्च बढ़ने की आशंका है। प्रत्याशियों के सामने अब जीत की रणनीति के साथ संसाधनों का संतुलन बनाए रखने की चुनौती भी है।

पहले चरण की तैयारी, अब चौथे तक इंतजार

पहले चरण में चुनाव होने की उम्मीद के साथ रणनीति बना रहे सरपंच पद के दावेदारों को अब अपनी तैयारियों में बदलाव करना पड़ रहा है। लंबे अंतराल तक चुनावी माहौल बनाए रखना, समर्थकों की सक्रियता कायम रखना और प्रतिद्वंद्वियों की गतिविधियों पर नजर रखना उनके लिए अहम हो गया है। गांवों में चुनावी चर्चाएं तेज हैं, लेकिन मतदान की बारी देर से आने के कारण प्रत्याशियों को अपनी रणनीति लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखनी होगी। अतिरिक्त समय उनके लिए मतदाताओं तक पहुंच बढ़ाने का अवसर है, लेकिन इसके साथ मेहनत और संसाधनों की जरूरत भी बढ़ेगी।

रिश्तेदारी और सामाजिक समीकरण साधने की कवायद

पंचायत चुनाव में प्रचार के साथ रिश्तेदारी, जातीय-सामाजिक समीकरण और व्यक्तिगत संपर्क भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संभावित प्रत्याशी इन समीकरणों को अपने पक्ष में करने के लिए पहले से सक्रिय हैं। चुनाव की तारीख आगे बढ़ने से उन्हें अधिक समय तक मतदाताओं से संपर्क बनाए रखना पड़ सकता है। समर्थकों को एकजुट रखना, सामाजिक बैठकों में भागीदारी करना और मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखना भी उनकी रणनीति का हिस्सा है। ऐसे में चुनावी खर्च का आकलन करना आसान नहीं है। प्रत्याशियों के सामने चुनौती अतिरिक्त समय को अवसर में बदलने के साथ अपने संसाधनों का संतुलन बनाए रखने की है।