
जैसलमेर की प्राचीन जल धरोहरों की ऐतिहासिकता पर शोध पत्र प्रकाशित
जैसलमेर/लाठी. मरुस्थलीय जैसलमेर में जल संरक्षण की प्राचीन परंपरा और ऐतिहासिक जल स्रोतों की समृद्ध विरासत पर हुए शोध ने इनके संरक्षण की जरूरत को रेखांकित किया है। जिले के दामोदरा गांव स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में इतिहास विषय के शिक्षक दिलीप कुमार सैनी और इतिहासकार एवं पर्यावरणविद् पार्थ जगाणी का शोध पत्र प्रकाशित हुआ है। शोध में 9वीं से 13वीं शताब्दी के दौरान जैसलमेर क्षेत्र में निर्मित जल संरचनाओं की ऐतिहासिकता का अध्ययन किया गया है। इसमें करीब 42 तालाबों, खड़ीनों, कुओं और जलकुंडों से जुड़े गोवर्धन शिलालेखों पर अंकित स्थापना वर्ष तथा प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध विवरणों का मिलान कर उनके निर्माण काल और ऐतिहासिक महत्व को सामने रखा गया है।
शोध पत्र के अनुसार जिले में अब तक प्राप्त शिलालेखों के आधार पर कंडियाला गांव का माडेच खड़ीन सबसे प्राचीन ज्ञात जल स्रोत है। यहां से लौकिक संवत 3 यानी ईस्वी 926 का लेख प्राप्त हुआ है। शोध में लौद्रवा और पोकरण क्षेत्र में परमार शासकों के समय निर्मित तालाबों के साथ भाटी वंश के शुरुआती शासकों के समय की जल संरचनाओं का भी उल्लेख किया गया है। ये प्रमाण क्षेत्र में सदियों पहले विकसित जल प्रबंधन की परंपरा को समझने में महत्वपूर्ण हैं।
शोध में पोकरण क्षेत्र के एका गांव का तालाब, थाट गांव के जाजूसर और हमीसर तालाब, धूडसर गांव का तालाब तथा पोकरण शहर का त्रिवाय कुंड हजार वर्ष से अधिक प्राचीन बताए गए हैं। ये जल स्रोत मरुस्थलीय परिस्थितियों में वर्षा जल संग्रहण और उसके पारंपरिक प्रबंधन की तकनीकों को दर्शाते हैं। शोध पत्र में लुद्रवा में भाटी राजवंश की स्थापना करने वाले देवराज भाटी से संबंधित जल संरचनाओं का भी उल्लेख है। इनमें रामगढ़ का विजड़ासर, सेउवा का देवराजसर, जोगा और पारेवर के बीच स्थित तणुसर तथा गोगादे के नजदीक लच्छीसर तालाब शामिल हैं।
शोध में रामगढ़ क्षेत्र के खडाल इलाके के गांवों में मौजूद अनेक प्राचीन जल संरचनाओं की स्थिति पर भी ध्यान आकर्षित किया गया है। इनमें से कई जल स्रोत खनन गतिविधियों और उनके आगोर के नष्ट होने से संकट का सामना कर रहे हैं। आगोर वह क्षेत्र होता है, जहां से वर्षा का पानी बहकर तालाब या जल संरचना तक पहुंचता है। आगोर प्रभावित होने से जल संग्रहण की पारंपरिक व्यवस्था भी कमजोर पड़ सकती है। शोधकर्ताओं ने इन संरचनाओं को केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि जैसलमेर की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है। इनके व्यवस्थित सर्वेक्षण, संरक्षण और आगोर के पुनरुद्धार की जरूरत रेखांकित की गई है, ताकि जल संरक्षण की इस प्राचीन परंपरा को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सके।
Updated on:
10 Oct 2026 08:18 pm
Published on:
10 Oct 2026 08:18 pm
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