
जैसलमेर में ओरण संरक्षण यात्रा के बीच चर्चा में आई बिश्नोई समाज की प्रकृति संरक्षण परंपरा। 363 बिश्नोइयों का ऐतिहासिक बलिदान आज भी पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा बना हुआ है।
लाठी. थार के रेगिस्तान में ओरण यात्रा ने एक बार फिर प्रकृति संरक्षण की उस सदियों पुरानी परंपरा को चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जिसकी सबसे बड़ी मिसाल बिश्नोई समाज का इतिहास है। खेजड़ी के पेड़ों से लेकर वन्यजीवों तक की रक्षा को आस्था और जीवनशैली का हिस्सा बनाने वाले इस समाज का प्रकृति के प्रति समर्पण आज भी पर्यावरण संरक्षण की प्रेरक मिसाल है। जैसलमेर में ओरण संरक्षण को लेकर निकल रही यात्रा इसी विरासत को आगे बढ़ाने के साथ मरुस्थल की प्राकृतिक संपदा और सामुदायिक संरक्षण परंपराओं को बचाने का संदेश दे रही है। बिश्नोई समाज में प्रकृति संरक्षण कोई नया अभियान नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही जीवन पद्धति है। गुरु जांभोजी के उपदेशों से विकसित इस परंपरा में जीवों पर दया और हरे वृक्षों की रक्षा को विशेष स्थान दिया गया है। समाज के 29 नियमों में पर्यावरण और जीव संरक्षण से जुड़े सिद्धांत शामिल हैं। यही कारण है कि पश्चिमी राजस्थान के गांवों में आज भी खेजड़ी, हिरण और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखी जाती है।
प्रकृति के प्रति इस समर्पण का सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 1730 में जोधपुर के खेजड़ली गांव में सामने आया। तत्कालीन मारवाड़ रियासत में खेजड़ी के पेड़ों की कटाई रोकने के लिए अमृता देवी बिश्नोई अपनी बेटियों के साथ पेड़ों से लिपट गईं। पेड़ों को बचाने के संघर्ष में अमृता देवी सहित 363 बिश्नोइयों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यह बलिदान आज भी विश्व स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के इतिहास की असाधारण घटना के रूप में याद किया जाता है। इस शहादत ने प्रकृति को बचाने के लिए सामूहिक संकल्प और व्यक्तिगत त्याग का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
एयरफोर्स से सेवानिवृत्त परसाराम विश्नोई बताते हैं कि खेजड़ी मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण आधार है। इसकी जड़ें मिट्टी को बांधने और खेतों की उर्वरता बनाए रखने में सहायक हैं। पत्तियां पशुओं के चारे के काम आती हैं, जबकि फलियां ग्रामीण परिवारों के भोजन का हिस्सा हैं। पेड़ की छाया पक्षियों और छोटे वन्यजीवों को आश्रय देती है। कम वर्षा और कठिन जलवायु वाले थार में खेजड़ी का महत्व केवल एक वृक्ष तक सीमित नहीं, बल्कि खेती, पशुपालन और जैव विविधता से भी जुड़ा है। यही वजह है कि बिश्नोई समाज में इसकी रक्षा धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक दायित्व भी बनी हुई है।
जैसलमेर ओरण टीम के सुमेर सिंह भाटी के अनुसार ओरण यात्रा का उद्देश्य पारंपरिक प्रकृति संरक्षण की भावना को जनभागीदारी से मजबूत करना है। ओरण केवल धार्मिक आस्था के स्थल नहीं हैं, बल्कि मरुस्थल की जैव विविधता, वन्यजीवों, पशुधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार हैं। इन क्षेत्रों में सदियों से पेड़-पौधों, चरागाहों और प्राकृतिक जलस्रोतों को सामुदायिक नियमों और परंपराओं के माध्यम से संरक्षित किया जाता रहा है। ओरण और गोचर भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराने, अतिक्रमण रोकने तथा खेजड़ी और पारंपरिक जलस्रोतों को सुरक्षित रखने की मांग इस अभियान के प्रमुख मुद्दे हैं। इन मांगों को लेकर चल रही पहल अब सामाजिक भागीदारी के साथ प्रशासनिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा भी बन रही है।
Updated on:
5 Nov 2026, 8:59 PM IST
Published on:
5 Nov 2026, 8:59 PM IST
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