
जैसलमेर. रामदेवरा तीर्थ भी धार्मिक पर्यटन के लिहाज से बना रहा विशिष्ट पहचान।
जैसलमेर. राजस्थान के पर्यटन मानचित्र पर जैसलमेर की पहचान सोनार दुर्ग, सम के धोरों और ऐतिहासिक हवेलियों से है, लेकिन इसी चमक के पीछे पर्यटन का एक दूसरा भूगोल भी मौजूद है। जैसलमेर से पोकरण तक फैले इस क्षेत्र में इतिहास, भू-विरासत, जल-संस्कृति, सीमा, लोकजीवन और प्रकृति एक साथ मौजूद हैं। यहां किसी नए पर्यटन स्थल की खोज नहीं, बल्कि मौजूदा संसाधनों को एक अनुभव आधारित सर्किट में जोड़ने की संभावना है। इससे पर्यटन का दायरा प्रमुख स्थलों से आगे छोटे गंतव्यों और स्थानीय कारोबार तक पहुंच सकता है।
सोनार दुर्ग जैसलमेर की पहचान है, लेकिन गड़ीसर की जलविरासत, हवेलियां, स्थानीय स्थापत्य और मरुस्थलीय जीवन शहर की दूसरी तस्वीर सामने रखते हैं। गड़ीसर को केवल दर्शनीय स्थल के बजाय रेगिस्तान में विकसित जल-संस्कृति की कहानी से जोड़ा जा सकता है। इससे पर्यटक को समझने का अवसर मिलेगा कि सीमित जल संसाधनों के बीच जैसलमेर की बसावट कैसे विकसित हुई।
मेघा, थैयात, रूपसी और भादासर क्षेत्रों में सामने आई जीवाश्म और पदचिह्न की संभावनाओं ने जैसलमेर की भू-विरासत को अलग पहचान दी है। यहां भू-पर्यटन की संभावना है, लेकिन नियंत्रित प्रवेश, वैज्ञानिक व्याख्या, संरक्षण और प्रशिक्षित गाइड जरूरी होंगे। उद्देश्य केवल जीवाश्म दिखाना नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी भूगर्भीय कहानी पर्यटक तक पहुंचाने की दरकार है।
पोकरण का किला, ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय स्थापत्य और मरुस्थलीय जीवन जैसलमेर के मौजूदा पर्यटन अनुभव में विविधता जोड़ सकते हैं। इसके साथ रामदेवरा का धार्मिक पर्यटन जुड़ता है। जैसलमेर-पोकरण-रामदेवरा को अलग-अलग ठिकानों के बजाय जुड़े अनुभवों के रूप में विकसित करने पर एक यात्रा में इतिहास, आस्था, मरुस्थल और लोकजीवन को जोड़ा जा सकता है।
तनोट और सीमावर्ती क्षेत्र सीमा, सैनिक इतिहास और सीमांत जीवन से जुड़े अनुभवों की संभावना रखते हैं। बाबलियान जैसे क्षेत्रों में पर्यटन की चर्चा है, लेकिन यहां सुरक्षा और प्रशासनिक स्वीकृति सर्वोच्च प्राथमिकता की भी जरूरत रहेगी। दूसरी ओर खेतोलाई सहित विभिन्न क्षेत्रों में प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी प्रकृति पर्यटन का अवसर देती है। पक्षी अवलोकन, प्रकृति भ्रमण और स्थानीय गाइड आधारित यात्राएं पर्यटन की इस दूसरी परत को विस्तार दे सकती हैं।
जैसलमेर — जल-संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत
भू-विरासत क्षेत्र — जीवाश्म और प्राचीन पदचिह्न
पोकरण — किला, इतिहास और लोकसंस्कृति
रामदेवरा — धार्मिक एवं आस्था पर्यटन
सीमावर्ती क्षेत्र — सीमा और सैनिक इतिहास
खेतोलाई — प्रवासी पक्षी और प्रकृति पर्यटन
ग्रामीण क्षेत्र — लोककला, खान-पान और हस्तशिल्प
जैसलमेर की अगली संभावना नए पर्यटन स्थल खोजने से ज्यादा मौजूदा संसाधनों को एकीकृत अनुभव में बदलने में है। विरासत, धार्मिक पर्यटन, भू-विरासत, प्रकृति और सीमांत अनुभव को अलग-अलग थीम में जोड़ा जा सकता है। इसके लिए परिवहन, संकेतक, डिजिटल जानकारी, प्रशिक्षित गाइड और संरक्षण व्यवस्था को साथ लेकर चलना जरूरी होगा।
- अनिल पंडित, वरिष्ठ पर्यटन विशेषज्ञ
Updated on:
26 Sept 2026 09:15 pm
Published on:
26 Sept 2026 09:15 pm
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