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राजस्थान के इस जिले में है कुदरत का खजाना, जानकर रह जाएंगे हैरान

Rajasthan News: जिले के मिश्रौली और उसके आसपास के क्षेत्र में साढ़े छह करोड़ साल पुरानी बैसाल्टिक रॉक्स यानि बैसाल्ट की चट्टानें जियो साइट के रूप में विकसित होगी। यह कुदरती खजाना प्रदेश में केवल यहीं पर है। प्रकृति की इस अनूठी संरचना को हाल ही में इंटेक की 150 भू विरासत सूची में शामिल किया गया है।
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झालावाड़

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Omprakash Dhaka

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Updated: 17 Mar 2024, 2:28 PM IST

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Jhalawar News: जिले के मिश्रौली और उसके आसपास के क्षेत्र में साढ़े छह करोड़ साल पुरानी बैसाल्टिक रॉक्स यानि बैसाल्ट की चट्टानें जियो साइट के रूप में विकसित होगी। यह कुदरती खजाना प्रदेश में केवल यहीं पर है। प्रकृति की इस अनूठी संरचना को हाल ही में इंटेक की 150 भू विरासत सूची में शामिल किया गया है। जियो साइट विकसित होने के बाद यहां भू वैज्ञानिकों के साथ पर्यटक भी आएंगे। यहां शोधार्थियों के लिए भी प्रचुर मात्रा में सामग्री मिलेगी। मिश्रौली गांव के चारों तरफ बेसाल्ट की चट्टानें फैली हुई है यहां पर बैसाल्ट का खनन भी किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्र में लोगों को भू विरासत तो देखने को मिलेगी। उन्हें कृषि और ग्रामीण पर्यटन के दर्शन भी हो सकेंगे। यहां से कुछ ही दूरी पर कौलवी, विनायका, हत्यागौड में बौद्धकालीन गुफाएं हैं। वहां भी पर्यटकों की पहुंच आसान हो जाएगी। मिश्रौली के अलावा मध्यप्रदेश में भी कुछ स्थानों पर बेसाल्ट की चट्टानें पाई गई हैं, जिन्हें भी पर्यटन से जोडऩे का प्रयास जारी है।

ज्वालामुखी के लावा से बनी

विशेषज्ञों के अनुसार बेसाल्ट की चट्टानें ज्वालामुखीय चट्टानें हैं। इनका निर्माण ज्वालामुखियों से निकलने वाले लावा के कारण हुआ है। ज्वालामुखी के फटने के बाद जब उनका लावा तेजी से धरती की सतह पर फैला। धरती के संपर्क में आने के बाद वह जब तेजी से ठंडा हुआ तो इस प्रक्रिया के परिणाम स्वरूप जमे हुए लावा में दरारें पड़ गई। इस कारण ये चट्टानें इन आकर्षक आकृतियों में दिखाई देती हैं। कहीं यह स्तंभाकार नजर आती है तो कहीं शतकोणीय संरचनाएं दिखती हैं।

एक मात्र माइन्स

मिश्रोली में प्रदेश की तंभाकार बेसाल्टिक चट्टानों वाली एकमात्र माइंस है। इसके आसपास लघु पहाडिय़ों और पठार के क्षेत्र में स्तंभाकार बेसाल्टिक पत्थर की खदानें हैं। ये स्तम्भ सघन ज्वाइंट में बारीक दानेदार, गहरे काले रंग और ग्रे रंग के पत्थर से लावा के शीतलन और फ्रेक्चरिंग प्रक्रिया से बने हुए हैं। इन आग्नेय पत्थर की खदानों की ऊपरी परत गहरी और पिछली काली मिट्टी की बनी है।

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मिश्रोली में मिलने वाले पत्थरों की खासियत यह है कि यहां पर खड़े और आड़े दोनों ही प्रकार के पत्थर मिलते हैं। इनका लम्बाई 15 फीट तक है, जो देश में चुनिंदा स्थानों पर ही देखने को मिलता है। इतनी लम्बी चट्टानें और पत्थर देश में अंधेरी [मुम्बई], आदिलाबाद, कोल्हापुर, पर्वतमाला क्षेत्र और मध्यप्रदेश के देवास के बंगार में ही मिलते हैं। विश्व में ये अमेरिका, इजराइल, हांगकांग, आस्ट्रेलिया, जापान में देखने को मिले हैं। पत्थरों को खनिज विभाग भवन निर्माण स्टोन की श्रेणी में मानता है। इनका निर्माण साढ़े छह करोड़ साल पहले माना जा रहा है।
- मधुसूदन आचार्य, सह संयोजक इंटेक

मिश्रोली क्षेत्र में बेसाल्ट की चट्टानें है। इस क्षेत्र में मेसनरी स्टोन भी बहुतायत में है। यहां कुछ खदानें भी आवंटित की गई है।
- देवीलाल बंशीवाल, सहायक खनिज अभियंता