कई लोग रोशनी कम होने पर सफेद मोतिया के पकने का इंतजार करते है। इस बीच उन्हें पता नहीं लगता कि काला मोतिया आ चुका है। आजकल अंधापन काले मोतिया में रोका जा सकता है। जबकि बच्चों में भी काला मोतिया होता है। बड़ी आंखें है तो ये न सोचिए की सुंदर है, इसमें काला मोतिया होने के अवसर ज्यादा रहते है। ज्यादा स्टुराइड व नींद की दवा लेने से भी काला मोतिया का खतरा रहता है। इसके मुख्य लक्ष्ण है कि आंख में पानी आने का संतुलन बिगड़ जाता है। पहले इसका ट्रीटमेंट नहीं होता था, केवल संदेह रहता। लेकिन अब संदेह के आधार पर नहीं, पूर्णत जांच के आधार पर रोगी का इलाज होता है। बाजार में इसके लिए 60 तरह की दवाइयां आ चुकी हैं। हमारा देश इस बीमारी में दूसरे नंबर पर है, जहां यह बीमारी बढ़ रही है। लोगों को अपने केवल नजर व चश्मे के नंबर का ध्यान नहीं रखना चाहिए। संपूर्ण नेत्र जांच करवाकर आंखों को स्वस्थ रखा जा सकता है। हटकर बात करे तो बच्चों को लेटकर व बत्ती गुल कर टीवी नहीं देखनी चाहिए। कम से कम टीवी से छह मीटर की दूरी रखनी चाहिए। - डॉ. देविन्द्र सूद, नई दिल्ली