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सिकंदरा उपचुनाव : अपने ही बनाये चक्रव्यूह में फंस गये अखिलेश यादव, सपा की हार के ये रहे प्रमुख कारण !

सीएम योगी आदित्यनाथ के आगे सारी रणनीति फेल, जानें- किन कारणों से सिकंदरा उपचुनाव 2017 हार गई समाजवादी पार्टी

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विनोद निगम
कानपुर. निकाय चुनाव में हार के बाद समाजवादी पार्टी अपने गढ़ की खोई जमीन दोबारा पाने के लिए सिंकदरा सीट हर हाल में जीतना चाहती थी। इसी के चलते राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सीएम योगी को सियासत में चित करने के लिए खास रणनीति बनाई, लेकिन उनके मंसूबों में पानी फिर गया। भाजपा ने यह सीट जीतकर अखिलेश को उन्हीं के जाल में फंसा दिया। मुलायम के गढ़ में कमल खिल जाने से जहां भाजपाई खासे गदगद हैं, वहीं सपाई हार के पीछे बसपा कैंडिडेट का न होना मान रहे हैं। उपचुनाव में बसपा सुप्रीमो मायावती ने यहां अपना प्रत्याशी नहीं उतारा और अंदरखाने सपा की मदद की। पर यह दांव उल्टा पड़ गया। बड़ी संख्या में हाथी का बेस वोट अजीत पाल के पक्ष में चला गया और साइकिल का हवा निकल गई।

हाथी का नहीं मिला साथ, इसके चलते मिली हार
निकाय चुनाव में करारी हार के बाद यूपी में खोई जमीन पाने के लिए सपा, बसपा और कांग्रेस जद्दोजहद कर रहे हैं। भाजपा विधायक मथुरा पाल के निधन के बाद सिंकदरा विधानसभा सीट रिक्त हो गई। जिसके लिए 21 दिसंबर को मतदान हुआ, लेकिन उससे पहले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम के साथ बैठक कर इस सीट को हर हालत में जीतने के लिए रणनीति बनाई। पहले मुलायम सिंह के करीबी पवन गुप्ता को टिकट दिया गया, लेकिन नामांकन के दिन पूर्व सांसद राकेश सचान का नाम फाइनल कर चुनाव के मैदान में उतार दिया गया। अखिलेश यादव ने यहां सभायें तो नहीं कीं, पर लखनऊ से बैठकर पूरे चुनाव पर नजर बनाये रहे। चुनाव से पहले सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सारे मोहरे फिक्स कर दिए। बसपा ने कैंडिडेट नहीं उतारा तो कांग्रेस ने ब्राम्हण को टिकट देकर सीमा सचान की राह आसान कर दी। पर सीएम योगी आदित्यनाथ के आगे इनकी रणनीति धरी की धरी रह गई। यहां भारी संख्या में बसपा वोटर्स भाजपा के साथ चला गया, वहीं ब्राम्हण प्रभाकर की जगह अजीत के पक्ष में मतदान कर दिया।

मुलायम का गढ़ रहा है सिकंदरा
आजादी के बाद डेरापुर नाम से ये सीट अस्तित्व में आई। इस पर लगातार कई वर्षों तक समाजवादियों का कब्जा रहा। 70 के दशक में कांग्रेस के चौधरी नरेंद्र सिंह इस सीट से पहली बार जीत हासिल करने में सफल हुए। इसके बाद जनता दल से मुलायम सिंह अलग हुए। उनकी समाजवादी पार्टी ने यहां बसपा के सहयोग से कई बार जीत हासिल की। लेकिन सपा और बसपा के बीच रार हो गई और दोनों दल अलग हो गए और इसका परिणाम यह रहा कि 2007 के चुनाव में बसपा ने सपा से ये सीट छीन ली। बसपा से मिथिलेश कटियार ने जीत हासिल की। इसके बाद 2012 के भी बसपा के इंद्रपाल विधायक चुने गए। लेकिन 2017 विधानसभा चुनाव में पीएम मोदी की लहर के चलते सिकंदरा में भगवा फहराया।

रार के चलते साइकिल पंचर
सपा को पिछले दो दशकों से यहां की सियासत का पर्याय माना जाता है, लेकिन अब एक ही दल के समर्थकों में कुछ ऐसी खेमेबंदी हो गई है कि क्षेत्रीय व जातीय समीकरण भी गड़बड़ हो गए। आलम यह है कि नत्थू सिंह के शिष्य मुलायम सिंह यादव के कुनबे के दीगर सदस्यों के समर्थक एक-दूसरे के खिलाफ जाल बिछाते रहे। मुलायम के निकट सहयोगी पवन गुप्ता का टिकट काट दिया। उनके स्थान पर सीमा सचान को टिकट दे दिया जिन्हें प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम का करीबी माना जाता है।

जैनपुर निवासी अलताफ कहते हैं कि इस हार का मुख्य कारण मुलायम परिवार का झगड़ा है। कहते हैं कि यहां का चुनाव शुरुआत में ठीक रहा, लेकिन मतदान के आते-आते गड़बड़ा गया। वह कहते है कि मुलायम को पिछड़ी जातियों के साथ मल्हाल और मुसलमानों का वोट मिलता था, मगर 2017 के दो चुनाव में ऐसा नहीं हुआ। पहले मथुरा पाल जीते और अब उनके बेटे अजीत पाल विधायक चुने गए।

कभी कुर्मी बाहूल्य थी यह सीट
सिकन्दरा विधानसभा क्षेत्र यमुना और सेंगूर नदी के किनारे स्थित है। पहले यह क्षेत्र कुर्मी बहुल माना जाता था लेकिन नए परिसीमन में भांल, जैसलपुर, दमनपुर, बेहमई, खोजारामपुर, बैना, पिल्होरा, जैनपुर, आकासू, कपासी, मंडेमऊ, ठेनामऊ जैसे राजपूत गांव के शामिल होने से इस क्षेत्र का जातिगत समीकरण बदल गया। क्षेत्र में राजपूत, कुर्मी, निषाद, कुशवाहा, पाल जाति की आबादी 30 से 45 हजार के बीच है। कुशवाहा और ब्राह्मण जाति भी 15-20 हजार की संख्या में हैं। इस क्षेत्र में निषाद व कश्यप की संख्या 36 हजार से अधिक है। मतदान के वक्त राजपूत, मल्लाह, और दलित समाज का वोटर्स भाजपा के साथ खड़ा हो गया और जिसका नतीजा रहा कि यहां साइकिल पंचर हो गई।