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भरोसे का बाजार… खंडवा के सराफा बाजार में 150 साल से कायम है रिश्तों की चमक, पांचवीं पीढ़ी तक बरकरार विश्वास

-बुजुर्गों के साथ अब जेन-जी भी संभाल रहे पुरखों की परंपरा की विरासत -150 साल से कई ग्राहकों की एक ही दुकान, बन गया आत्मीय रिश्ता
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खंडवा

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Manish Arora

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Oct 19, 2026

Sarafa Market

खंडवा. सराफा बाजार डेेढ़ सौ साल से अपनी विश्वनीयता बनाए हुए है।

शहर का सराफा बाजार पिछले डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा अपने ग्राहकों की विश्वनियता को कायम रखे हुए है। यहां दुकानदार और ग्राहक के रिश्ते की बजाए आत्मियता का रिश्ता ज्यादा नजर आता है। चार से पांच पीढिय़ों तक ये रिश्ता बना हुआ है। परंपरा की यह विरासत अब जेन जी ने संभाल ली है। कोई एलएलबी, कोई सिविल इंजीनियरिंग करने के बाद भी पुरखों के व्यापार को संभाल रहा है।

10 दुकान से शुरू हुआ सफर 140 दुकान तक पहुंचा

वर्ष 1889 में सराफा बाजार शीतला माता मंदिर की गली में हुआ करता था। तब करीब यहां पांच से सात दुकानें थी। तत्कालीन समय में प्लेग का कहर और बाद में सराफा में लगी आग से यहां के व्यवसासिय वर्तमान सराफा बाजार में पहुंचे। दस दुकानों से शुरू हुआ सराफा बाजार आज करीब 140 दुकान का हो गया है। सराफा बाजार का व्यवसाय अब पांचवीं पीढ़ी के हाथों में पहुंच गया है। इस सफर में शुरुआती दौर से जुड़े ग्राहक आज भी अपनी पुरानी दुकानों पर विश्वास कायम रखते हुए पहुंचते है। ग्राहकों की भी चौथी-पांचवीं पीढ़ी परंपरागत दुकानों से जुड़ी हुई है।

एलएलबी करने के बाद संभाल रहे दुकान

सराफा की विरासत अब जेन जी के हाथों में है। आशीष ज्वेलर्स के अक्षत सोनी एलएलबी करने के बाद अपने परंपरागत व्यवसाय को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। अक्षत ने बताया कि उनके परदादा श्यामलाल सोनी ने यह व्यवसाय शुरू किया था। परदादा के निधन के बाद उनके दादा कैलाशचंद सोनी ने 1971 में अपनी अलग दुकान डाली। दादा के निधन के बाद पिता आशीष सोनी दुकान संभाल रहे है। उन्होंने एलएलबी जरूर की, लेकिन पिता का हाथ बंटाने वह भी अपने परंपरागत व्यवसाय से जुड़ गए।

भाई सर्जन, खुद सिविल इंजीनियर, अब सराफा व्यापारी

सेठ जगन्नाथ ज्वेलर्स की कमान अब पांचवीं पीढ़ी के हाथ में है। सिविल इंजीनियरिंग करने के बाद मयंक सराफ अपने पिता संतोष सराफ के साथ दुकान संभाल रहे हैं। मयंक ने बताया कि वर्ष 1889 में उनके परदादा सेठ जगन्नाथ ने दुकान शुरू की थी। उनके दादा राधारमण सराफ के बाद पिता संतोष सराफ ने दुकान संभाली। उनके बड़े भाई डॉ. यदुनंदन सराफ एमएस सर्जन है, उन्होंने भी सिविल इंजीनियरिंग की, लेकिन पारंपरिक व्यवसाय को ही प्राथमिकता दी है।

पांचवीं पीढ़ी तक पहुंचा रिश्ता

सराफा पर लोगों का विश्वास आज भी इसलिए कायम है कि सौ साल से ज्यादा समय से ग्राहकों के लिए व्यापारी एटीएम का किरदार निभा रहे है। आधी रात को भी रुपए की जरूरत होने पर ग्राहक को रुपए उपलब्ध कराए जाते है। ज्वेलर्स डेवलपमेंट वेलफेयर एसोसिएशन मप्र के महासचिव संतोष सराफ ने बताया कि इसी भरोसे के साथ कई ग्राहकों की पांचवीं पीढ़ी तक एक ही दुकान की पेड़ी चढ़ रही है। उनके दादा के समय ग्राहकों की पांचवीं पीढ़ी के बच्चे भी उनके बेटे के पास ही खरीदी के लिए आ रहे है। महानगरों में बस चुके ग्राहक भी ज्वेलरी खरीदी के लिए खंडवा सराफा बाजार पर ही अपना विश्वास जताते हैं।