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मप्र के इस शहर में शिक्षा का सूखा…प्रतिभाओं हर साल पलायन, जानिए क्यों

खंडवा में माखनलाल चतुर्वेदी महाविद्यालय बंद हो गया। शहर में कॉलेज हैं, सीटें हैं... लेकिन मेधावी विद्यार्थियों के लिए विकल्प सीमित है। इंजीनियरिंग नहीं, तकनीकी शिक्षा डिप्लोमा तक सीमित, रोजगारपरक और प्रतियोगी पाठ्यक्रमों की कमी के चलते हर साल प्रतिभाओं का पलायन हो रहा है। इसे रोकने के लिए शिक्षा में अग्रणी होने जनप्रतिनिधि और शिक्षा विदों को आगे आना होगा ।
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खंडवा

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Rajesh Patel

•

Oct 06, 2026

higher education

KHANDWA GDC

खंडवा में माखनलाल चतुर्वेदी महाविद्यालय बंद हो गया। शहर में कॉलेज हैं, सीटें हैं... लेकिन मेधावी विद्यार्थियों के लिए विकल्प सीमित है। इंजीनियरिंग नहीं, तकनीकी शिक्षा डिप्लोमा तक सीमित, रोजगारपरक और प्रतियोगी पाठ्यक्रमों की कमी के चलते हर साल प्रतिभाओं का पलायन हो रहा है। इसे रोकने के लिए शिक्षा में अग्रणी होने जनप्रतिनिधि और शिक्षा विदों को आगे आना होगा ।

रोजगारपरक पढ़ाई के लिए दूसरे शहरों का रुख

कॉलेज हैं, लेकिन करियर के विकल्प नहीं। सीटें हैं, लेकिन पसंद के पाठ्यक्रम नहीं। नतीजा यह कि 12 वीं पास होते ही शहर की प्रतिभा बाहर निकलने लगती है। इंजीनियरिंग के लिए इंदौर-भोपाल, प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोटा और रोजगारपरक पढ़ाई के लिए दूसरे शहरों का रुख। यानी खंडवा शिक्षा की कमी से नहीं, विकल्पों की कमी से जूझ रहा है।

कक्षाएं और भवन हैं,फिर भी नहीं रुक रही प्रतिभा

2928 यूजी-पीजी सीटें खाली होना इसी संकट की तस्वीर है। कॉलेजों में सीटें खाली हैं। कक्षाएं और भवन हैं। फिर भी प्रतिभा खंडवा में नहीं रुक रही। 12वीं के बाद विद्यार्थी बेहतर विकल्प की तलाश में शहर छोड़ रहे हैं। वजह सिर्फ कॉलेजों की संख्या नहीं, पढ़ाई के बाद का भविष्य है। इंजीनियरिंग के लिए बाहर जाना पड़ता है। तकनीकी शिक्षा डिप्लोमा तक सीमित है।

रोजगारपरक पाठ्यक्रमों के विकल्प कम

रोजगारपरक पाठ्यक्रमों के विकल्प कम हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी मजबूत संस्थागत माहौल नहीं है। यही वजह है कि विज्ञान और वाणिज्य के मेधावी विद्यार्थी इंदौर, भोपाल, कोटा और पुणे जैसे शहरों का रुख कर रहे हैं। यही नहीं माखनलाल चतुर्वेदी महाविद्यालय बंद हो गया।

डिग्री नहीं, भविष्य चाहिए

विद्यार्थी अब सिर्फ बीए, बीकॉम या बीएससी की डिग्री नहीं चाहता। वह ऐसी पढ़ाई चाहता है, जिससे आगे नौकरी, प्रतियोगी परीक्षा या स्वरोजगार का रास्ता खुले। खंडवा में इसी कड़ी की सबसे बड़ी कमी दिखाई देती है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए स्थानीय विकल्प नहीं है। तकनीकी शिक्षा डिप्लोमा तक सीमित है। कृषि कॉलेज है, लेकिन कृषि आधारित प्रोसेसिंग, तकनीक और उद्योग से जुड़े पाठ्यक्रमों का विस्तार अपेक्षा के अनुरूप नहीं हुआ। डिजिटल कौशल और नए रोजगार क्षेत्रों से जुड़े पाठ्यक्रम भी सीमित हैं।

11वीं से शुरू हो जाता है पलायन

कई परिवार बच्चों को 11वीं-12वीं से ही बाहर भेजने लगते हैं। कारण साफ है। बड़े शहरों में कॉलेज के साथ जेईई, नीट, बैंकिंग, सीए, सीएस और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के विकल्प मिलते हैं। खंडवा में विद्यार्थी को इसके लिए अलग शहर तलाशना पड़ता है। इसका असर सिर्फ विद्यार्थी पर नहीं पड़ता। परिवार पर अतिरिक्त खर्च आता है। शहर की प्रतिभा बाहर जाती है। स्थानीय अर्थव्यवस्था से शिक्षा का बड़ा हिस्सा बाहर चला जाता है।

कृषि से उद्योग तक बन सकता है अपना मॉडल

-खंडवा की अपनी ताकत है। कृषि और उद्योग है। साहित्य और संस्कृति की पहचान है। इन्हीं जरूरतों के आधार पर नए पाठ्यक्रम विकसित किए जा सकते हैं। कृषि-प्रसंस्करण, फूड टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, डिजिटल कौशल, ड्रोन तकनीक, लॉजिस्टिक्स और स्थानीय उद्योगों से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं। कॉलेजों में सिर्फ सीटें बढ़ाने से समस्या हल नहीं होगी। पाठ्यक्रम बदलने होंगे। शिक्षक और अकादमिक वातावरण मजबूत करना होगा। उद्योग से जुड़ाव बढ़ाना होगा। विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए स्थानीय स्तर पर बेहतर सुविधाएं देनी होंगी।

जनप्रतिनिधियों को उठानी होगी आवाज

शिक्षा व्यवस्था को केवल कॉलेजों की संख्या के आंकड़े से नहीं देखा जा सकता। क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों को विधानसभा और संसद में उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के विस्तार का मुद्दा मजबूती से उठाना होगा। इंजीनियरिंग कॉलेज, रोजगारपरक पाठ्यक्रम और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के संस्थागत केंद्र के लिए ठोस पहल जरूरी है। स्थानीय प्रतिभा को बाहर जाने से रोकना सिर्फ शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। यह शहर के भविष्य का सवाल है।

ऐसे समझें प्रतिभाओं का पलायन

चालू शैक्षणिक सत्र में 12 वीं में 7506 विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए। शासकीय कॉलेजों में यूजी की 6100 सीटों में अब तक 3960 प्रवेश हुए हैं। 2143 सीटें खाली हैं। पीजी की 1690 सीटों में 905 प्रवेश हुए और 785 सीटें रिक्त हैं। यूजी-पीजी मिलाकर 2928 सीटें खाली हैं। सवाल यह नहीं कि कॉलेजों में सीटें क्यों खाली हैं। बड़ा सवाल यह है कि स्थानीय प्रतिभा को यहां रोकने लायक विकल्प क्यों नहीं हैं।

यह सवाल...जो पूछ रहे विद्यार्थी

इंजीनियरिंग शिक्षा शुरू कराने की पहल कब होगी ?

तकनीकी शिक्षा को डिप्लोमा से डिग्री और विशेषज्ञता तक कब विस्तार मिलेगा ?

कृषि और उद्योग के अनुरूप रोजगारपरक पाठ्यक्रम कब शुरू होंगे ?

जेईई, नीट, यूपीएससी, पीएससी, बैंकिंग जैसी परीक्षाओं के लिए स्थानीय स्तर पर संस्थागत सुविधा क्यों नहीं ?

खाली सीटों की चिंता से पहले यह क्यों नहीं पूछा जा रहा कि विद्यार्थी यहां प्रवेश क्यों नहीं लेना चाहते ?

खंडवा की प्रतिभा को बाहर जाने से रोकने के लिए दीर्घकालीन शैक्षणिक रोडमैप कब बनेगा ?

फैक्ट फाइल :

12 वीं के बाद तस्वीर

कुल विद्यार्थी- 8478

उत्तीर्ण-7506

कुल सीटें- प्रवेश -रिक्त

यूजी सीटें- 6100-3960-2143

पीजी सीटें -1690-905-785

कुल यूजी-पीजी सीटें- 7790-4865-2928