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कोटा के बाड़ौली मंदिर से 26 साल पहले चोरी हुई नटराज प्रतिमा लंदन से लौटी, लेकिन अब तक नहीं पहुंची ‘घर’

कोटा के बाड़ौली मंदिर से 1998 में चोरी हुई 10वीं शताब्दी की नटराज प्रतिमा लंदन से भारत लौट चुकी है, लेकिन अब भी अपने मूल मंदिर में स्थापित होने का इंतजार कर रही है।
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कोटा

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Harshita Saini

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हेमंत शर्मा

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Oct 06, 2026

stolen Nataraja idol

रावतभाटा क्षेत्र स्थित बाड़ौली शिव मंदिर और नटराज की प्रतिमा (Photo-Patrika)

हेमंत शर्मा

कोटा. कोटा-रावतभाटा रोड स्थित बाड़ौली मंदिर समूह से करीब ढाई दशक पहले चोरी हुई नटराज की प्रतिमा अब तक अपने घर लौटने का इंतजार कर रही है। 1998 में चोरी हुई प्रतिमा लंदन पहुंच गई थी। वर्षों के प्रयास के बाद 2020 में इसे भारत लाया गया। करीब तीन साल पहले दिल्ली से राजस्थान लाई गई प्रतिमा अब भी चित्तौड़गढ़ संग्रहालय में संरक्षित है। बाड़ौली का घाटेश्वर शिव मंदिर भी अपने नटराज के लौटने की राह देख रहा है। इतिहासकारों और पुरातत्व प्रेमियों का कहना है कि सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कर प्रतिमा को बाड़ौली में यथास्थान स्थापित किया जाना चाहिए। उनका सवाल है कि सुरक्षा के नाम पर भक्तों को भगवान से कब तक दूर रखा जाएगा। 10वीं शताब्दी की यह प्रतिमा घाटेश्वर मंदिर से चोरी हुई थी।

म्यूजियम बनाने की मांग

प्रतिमा को राजस्थान लाए जाने के बाद जनप्रतिनिधियों ने बाड़ौली परिसर में संग्रहालय बनाने की मांग भी केन्द्रीय मंत्री के समक्ष रखी थी, ताकि प्रतिमा को वहीं सुरक्षित रखा जा सके।

ऐसे घूम रहे नटराज

बाड़ौली के प्राचीन घाटेश्वर शिव मंदिर से फरवरी 1998 में नटराज की प्रतिमा चोरी हुई। इसके करीब आठ महीने बाद जंगल में एक प्रतिमा मिली। विभाग ने उसे असली मानकर गोदाम में रखवा दिया। जुलाई 2003 में ऑपरेशन ब्लैक हॉल के दौरान मूर्ति चोरों ने खुलासा किया कि असली प्रतिमा चुराकर उसकी जगह नकली रखी गई थी। असली प्रतिमा 85 लाख रुपए में लंदन में बेची गई थी। मामले में कुख्यात मूर्ति तस्कर घीया गैंग का नाम भी सामने आया। प्रतिमा लंदन के निजी संग्रहालय में रखी थी। केन्द्र सरकार के प्रयासों से 2020 में प्रतिमा भारत लाई गई। 2023 में इसे दिल्ली से राजस्थान लाया गया। तब से यह चित्तौड़गढ़ संग्रहालय में संरक्षित हैं। पुरावक्ताओं और पुरातत्व प्रेमियों की ओर से इसे बाड़ौली लाने की मांग की जा रही है।

शिल्पकला का बेजोड़ नमूना

कोटा से करीब 50 किलोमीटर दूर बाड़ौली शिव मंदिर समूह अपनी शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर समूह का काल 8वीं से 11वीं शताब्दी तक माना जाता है। 9वीं-10वीं शताब्दी में यह शैव पूजा का प्रमुख केन्द्र था। यहां नौ मंदिर हैं, जिनमें वामन, महिषासुर मर्दिनी, गणेश और घाटेश्वर शिव मंदिर प्रमुख हैं। घाटेश्वर शिवालय में शिव के नटराज स्वरूप को उत्कृष्ट शिल्प के साथ प्रदर्शित किया गया है। अलंकृत मंडप, तोरण द्वार और मूर्तियों की भंगिमाएं इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं। मंदिर के इतिहास की जानकारी यहां मिले अभिलेखों से भी मिलती है।

सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध कर बाड़ौली में हो स्थापित

"सुरक्षा के पुख्ता प्रबंध कर प्रतिमा को बाड़ौली में स्थापित किया जाना चाहिए। इसे कोटा संग्रहालय में भी लाया जा सकता है। वहां हाड़ौती के विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिमाएं और अवशेष पहले से संरक्षित हैं। प्रतिमा यहां आती है तो पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगी।"
— डॉ. सुषमा आहूजा, सेवानिवृत्त प्राचार्य, जेडीबी कॉलेज