
नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद (Photo-IANS)
Chandrashekhar Azad Azad Samaj Party: नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 के लिए बड़ा दावा किया है। पार्टी सभी 403 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी में है। वाराणसी समेत कई जगहों पर चंद्रशेखर ने साफ कहा कि बहुजन समाज की सरकार बनाने के लिए हर सीट पर अपने प्रत्याशी उतारेंगे। इस ऐलान के पीछे की सियासी रणनीति और जमीनी हकीकत दोनों पर नजर डालना जरूरी है।
यह दावा सिर्फ जोश का प्रदर्शन नहीं है। एक तरफ यह पार्टी की महत्वाकांक्षा दिखाता है कि वह बड़े दलों के साथ गठबंधन की मोहताज नहीं। दूसरी तरफ, यह मोलभाव की ताकत बढ़ाने का तरीका भी हो सकता है। अगर आगे कोई गठबंधन बनता है तो मजबूत संगठन और व्यापक दावे के आधार पर बेहतर सीट शेयरिंग की मांग की जा सकती है। फिलहाल पार्टी गठबंधन के दरवाजे खुले रखने के साथ अकेले लड़ने की तैयारी दोनों मोर्चों पर सक्रिय दिख रही है।
पार्टी ने अब तक करीब 87 सीटों पर प्रभारी और संभावित उम्मीदवार घोषित किए हैं। सूचियों में अनुसूचित जाति, गैर-यादव ओबीसी और मुस्लिम चेहरों को प्राथमिकता दी गई है। कई सूचियों में एससी उम्मीदवार सबसे ज्यादा हैं। यह सोशल इंजीनियरिंग बीएसपी के पारंपरिक दलित वोटबैंक और सपा के पीडीए समीकरण दोनों पर दबाव बनाने वाली है। चंद्रशेखर खुद को दलित समाज का आक्रामक और युवा विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं।
मायावती की बहुजन समाज पार्टी पिछले कुछ चुनावों में कमजोर प्रदर्शन कर रही है। संगठन और सक्रियता दोनों स्तर पर कमी दिख रही है। आजाद समाज पार्टी इसी राजनीतिक शून्य को भरने की कोशिश कर रही है। 2024 लोकसभा चुनाव में नगीना सीट की जीत ने चंद्रशेखर का कद बढ़ाया। कार्यकर्ताओं में नया जोश आया है। क्या वे दलित राजनीति के नए चेहरे बन पाएंगे, यह 2027 में साफ होगा।
2022 विधानसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर सीमित रहा था। लेकिन 2024 में नगीना जीत और कुछ अन्य सीटों पर अच्छी संख्या ने समीकरण बदला। सांसद बनने के बाद चंद्रशेखर की पहुंच और संसाधन दोनों बढ़े हैं। पार्टी बूथ स्तर तक संगठन मजबूत करने का दावा कर रही है। सत्ता परिवर्तन यात्रा और नियमित कार्यकर्ता सम्मेलन इसी दिशा में कदम हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश पार्टी का अपेक्षाकृत मजबूत क्षेत्र माना जाता है। पूर्वांचल और अन्य इलाकों में पैर पसारना अभी चुनौती है। प्रभारी नियुक्ति और बूथ संगठन के प्रयास जारी हैं, लेकिन 403 सीटों पर समान मजबूती हासिल करना आसान नहीं। संसाधन और अनुभवी कैडर की कमी बड़ी बाधा बन सकती है।
अगर पार्टी वाकई बड़ी संख्या में सीटों पर लड़ती है तो त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबला बनेगा। इससे सपा के पीडीए और बीएसपी के वोट बंट सकते हैं। भाजपा के लिए यह अप्रत्यक्ष रूप से फायदेमंद भी साबित हो सकता है। ‘किंगमेकर’ बनने की संभावना तभी मजबूत होगी जब पार्टी कुछ सीटें जीतकर बैलेंस ऑफ पावर बना पाए।
Updated on:
29 Oct 2026, 9:53 PM IST
Published on:
29 Oct 2026, 9:44 PM IST
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