
खाली हाथ नहीं लौटता कोई
नवाबो का शहर लखनऊ अपनी तहजीब और खूबसूरती के लिए जाना जाता है । यहां पर हर एक गली की अपनी एक कहानी है। शहर में इतनी गलियां हैं , जिसका अंदाजा ही नहीं लगाया जा सकता। आज हम आप को लखनऊ की उस मंडी के बारे में बताने जा रहे है, जहां पर महिला नहीं पुरुषों की बोली लगाई जाती है। सबका अपना- अपना पैसा तय होता है और वह व्यक्ति उस आदमी के साथ चला जाता है।
शहर के इन चौराहों पर मिलते है पुरुष
कैसरबाग चौराहा, अमीनाबाद चौराहा, इंदिरा नगर, जानकीपुरम, दुबग्गा , गोमती नगर, राजाजीपुरम, पुराना लखनऊ , चौक, नखास चौराहा लखनऊ के इन सभी चौराहों पर सुबह से ही भीड़ सी लग जाती है। सुबह 7 बजे से 8 :30 तक झुण्ड में भीड़ होती है, जैसे ही 9 बजने वाला होता है भीड़ छटने लगती हैं सब अपने - अपने काम पर निकल जाते है।
पुरुषों मंडी क्यों कहा जाता है
आइए पहले बताते हैं कि पुरुषों की मंडी का क्या मतलब है. क्योंकि दिमाग में बहुत से सवाल होंगे। जिसका समाधान बहुत जरूरी है। 50 सालों से लखनऊ में रहने वाले सैयद अली मिर्जा ने बताया कि यह बाजार नवाबों के समय से लगता चला आ रहा है। इसको बाजार कहिये या मंडी दोनों का मतलब एक ही है। जिसको काम की जरूरत होती थी और काम नहीं मिल रहा, तो वो इंसान किसी भी उम्र का हो, इस बाजार में काम की तलाश के लिए सुबह 6 बजे से 8 बजे तक बैठा रहता है।
उसको और उसके परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो जाता है। उन्होंने कहा कि वाजिद अली शाह के समय से यह बाजार लगाने का प्रावधान था। समय बदल गया जिनको आज के समय में मजदूर ,कर्मचारी कहा जाता है। आज के समय में भी यह मंडी लगती है और जिनको कहीं काम नहीं मिलता वो इन बाजारों के माध्यम से नौकरी की तलाश करते है।
Published on:
5 Mar 2023, 7:51 AM IST
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