30 जून 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Lucknow Heritage Silver Leaf: हुसैनाबाद में दम तोड़ रही लखनऊ की नवाबी चांदी वर्क बनाने की सदियों पुरानी विरासत

Lucknow Husainabad Silver Leaf: लखनऊ के हुसैनाबाद में कभी गूंजने वाली चांदी का वर्क बनाने की हथौड़ों की आवाज अब खामोश पड़ रही है। सदियों पुरानी यह नवाबी विरासत आज महज दो कारखानों तक सिमट गई है।
5 min read
Google source verification

लखनऊ

image

Ritesh Singh

Jun 29, 2026

लखनऊ की शान रहा चांदी का वर्क उद्योग संकट में, हुसैनाबाद में बचे सिर्फ दो कारखाने (फोटो सोर्स : Ritesh Singh )

लखनऊ की शान रहा चांदी का वर्क उद्योग संकट में, हुसैनाबाद में बचे सिर्फ दो कारखाने (फोटो सोर्स : Ritesh Singh )

Lucknow Historic Silver Leaf Craft Fades Away as Only Two Workshops Survive: लखनऊ की तहजीब, नफासत और नवाबी परंपराओं की चर्चा जब भी होती है, तब यहां के कबाब, इत्र, चिकनकारी और पान के साथ एक और चीज का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है,चांदी का वर्क। मिठाइयों, पान और शाही व्यंजनों को अपनी चमक से आकर्षक बनाने वाला यह वर्क केवल एक सजावट नहीं, बल्कि लखनऊ की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। लेकिन आज यह कला और इससे जुड़े कारीगर गुमनामी और बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं।

एक समय था जब पुराने लखनऊ के हुसैनाबाद और चौक की गलियों में सुबह से शाम तक हथौड़ों की लगातार पड़ती थाप सुनाई देती थी। इन आवाजों में सैकड़ों परिवारों की रोजी-रोटी और एक जीवंत परंपरा की धड़कन बसती थी। लेकिन समय के साथ यह धड़कन धीमी पड़ती चली गई। जहां कभी इस इलाके में कई दर्जन कारखाने हुआ करते थे, वहीं अब गिनती के केवल दो कारखाने ही बचे हैं, जो इस विरासत को किसी तरह जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं।

पीढ़ियों से चली आ रही कला

हुसैनाबाद के रहने वाले मुहम्मद अकबर उन गिने-चुने कारीगरों में से हैं, जो कई दशकों से अपने परिवार के साथ चांदी का वर्क बनाने का काम कर रहे हैं। उनके हाथों में वर्षों का अनुभव और चेहरे पर इस पेशे के प्रति गहरा लगाव साफ दिखाई देता है।

मुहम्मद अकबर बताते हैं कि उनके पूर्वज भी यही काम करते थे और उन्होंने बचपन से ही इस कला को सीखा। पहले इस काम में इतनी मांग थी कि दिन-रात काम चलता रहता था, लेकिन अब हालत ऐसे हैं कि काम तो मुश्किल से मिलता है और मेहनताना भी बहुत कम है। उनके अनुसार, "पहले हमारे इलाके में दर्जनों कारखाने थे। हर घर में हथौड़े की आवाज सुनाई देती थी। अब सिर्फ दो जगह ही यह काम बचा है। नई पीढ़ी इस पेशे में आना नहीं चाहती, क्योंकि इसमें मेहनत ज्यादा और आमदनी बहुत कम है।"

कैसे बनता है चांदी का वर्क

चांदी का वर्क बनाना बेहद मेहनत, धैर्य और बारीकी का काम है। इसकी प्रक्रिया जितनी रोचक है, उतनी ही कठिन भी। सबसे पहले शुद्ध चांदी की एक छोटी सलाख को लेकर उसे लगभग एक इंच के पतले-पतले टुकड़ों में काटा जाता है। महज आधे तोले चांदी से करीब 160 छोटे टुकड़े तैयार किए जाते हैं। इसके बाद इन सभी टुकड़ों को एक विशेष प्रकार की बारीक चमड़े की किताब के पन्नों के बीच सावधानीपूर्वक रखा जाता है।

यह किताब लगभग 160 पन्नों की होती है। इसके बाद इस फोल्डर को भैंस के चमड़े से बनी एक मजबूत थैली में रखा जाता है। फिर शुरू होता है सबसे कठिन चरण-लगातार कई घंटों तक हथौड़ों से कूटने का काम। करीब चार घंटे तक लगातार हथौड़े की चोट सहने के बाद चांदी के ये छोटे-छोटे टुकड़े अत्यंत पतले और महीन वर्क में बदल जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया के बाद एक वर्क की किताब तैयार होती है।

चार घंटे की मेहनत, लेकिन कमाई सिर्फ 400 रुपये

इस काम में लगने वाली मेहनत और समय को देखकर कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता कि इसके बदले मिलने वाली मजदूरी इतनी कम होगी। एक दिन में एक कारीगर अधिकतम दो थैलियां ही तैयार कर पाता है और पूरे दिन की मेहनत के बाद उसे महज 400 रुपये की दिहाड़ी मिलती है।

महंगाई के इस दौर में इतनी कम आय में परिवार का खर्च चलाना किसी चुनौती से कम नहीं है। यही कारण है कि कारीगरों के बच्चे अब इस पेशे को अपनाने से बच रहे हैं और दूसरे रोजगार की तलाश कर रहे हैं। मुहम्मद अकबर कहते हैं, "हमने पूरी जिंदगी यही काम किया है, लेकिन अपने बच्चों को इस पेशे में नहीं लाना चाहते। इसमें मेहनत बहुत है और कमाई इतनी कम कि घर चलाना मुश्किल हो जाता है।"

नवाबी खानपान की पहचान है चांदी का वर्क

चांदी का वर्क केवल मिठाइयों की सजावट तक सीमित नहीं है। लखनऊ के नवाबी खानपान में इसकी अपनी एक खास जगह रही है। शाही टुकड़ा, जर्दा, फिरनी, बिरयानी, विभिन्न प्रकार की मिठाइयां और पान को आकर्षक बनाने के लिए चांदी के वर्क का इस्तेमाल वर्षों से होता आ रहा है। इसके अलावा आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं में भी इसका प्रयोग किया जाता है। कई पारंपरिक औषधियों में चांदी के वर्क को स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। यही कारण है कि इसकी मांग आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन मशीनों और आधुनिक तकनीकों के आने से पारंपरिक कारीगरों का काम प्रभावित हुआ है।

खतरे में है सदियों पुरानी विरासत

लखनऊ की पहचान केवल उसकी इमारतों और खानपान से नहीं है, बल्कि यहां की पारंपरिक कारीगरी भी उसकी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। चांदी का वर्क बनाने की कला भी ऐसी ही एक विरासत है, जो अब धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है।

यदि समय रहते इस उद्योग को संरक्षण नहीं मिला, तो आने वाले वर्षों में यह कला पूरी तरह समाप्त हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और सांस्कृतिक संस्थाओं को इस दिशा में गंभीर प्रयास करने चाहिए। कारीगरों को आर्थिक सहायता, बेहतर बाजार और प्रशिक्षण की सुविधाएं देकर इस विरासत को बचाया जा सकता है।

विरासत बचाने की जरूरत

हुसैनाबाद और चौक की गलियों में आज भी कहीं-कहीं हथौड़ों की वह पुरानी थाप सुनाई देती है, लेकिन अब उसमें पहले जैसी गूंज नहीं रही। हर चोट के साथ ऐसा लगता है मानो एक कारीगर अपनी कला को बचाने की आखिरी कोशिश कर रहा हो।

मुहम्मद अकबर जैसे कारीगरों के हाथों में केवल चांदी का वर्क नहीं, बल्कि लखनऊ की सदियों पुरानी नवाबी परंपरा और सांस्कृतिक पहचान भी सुरक्षित है। जरूरत इस बात की है कि इस अनमोल धरोहर को केवल यादों में सिमटने न दिया जाए, बल्कि इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने और संरक्षित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। क्योंकि जिस दिन हुसैनाबाद की इन गलियों से हथौड़ों की यह आखिरी आवाज भी खामोश हो जाएगी, उस दिन लखनऊ अपनी एक और बेशकीमती विरासत हमेशा के लिए खो देगा।