
राहुल गांधी और अखिलेश यादव (IANS Photo)
SP Congress Alliance: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी दलों ने तैयारियां तेज कर दी हैं। भाजपा के बाद अब विपक्षी दल भी जातिगत समीकरण साधने में जुट गए हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने दलित और पिछड़े वर्ग के युवाओं पर खास फोकस करते हुए उन्हें अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपनी शुरू कर दी है। सामान्य सीटों पर भी दलित युवाओं को प्रभारी बनाया जा रहा है। वहीं, बसपा के पुराने ब्राह्मण वोट बैंक और पार्टी छोड़ चुके नेताओं को लेकर भी सियासी चर्चा तेज हो गई है।
कांग्रेस और सपा के बीच आगामी विधानसभा चुनाव में गठबंधन तय माना जा रहा है। दोनों पार्टियों ने समाजवादी और आंबेडकर विचारधारा से जुड़े युवाओं को चिह्नित किया है। इन्हें अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी जा रही है।
प्रभारियों को ऐसे युवाओं को पार्टी से जोड़ने का काम सौंपा गया है, जो समाजवादी और आंबेडकर विचारधारा से प्रभावित हैं। इसके साथ ही पीडीए को मजबूत करने का लक्ष्य भी दिया गया है। सपा और कांग्रेस का मानना है कि युवाओं को जिम्मेदारी देने से जमीनी स्तर पर संगठन मजबूत होगा।
समाजवादी पार्टी ने सामान्य सीटों पर कई दलित युवाओं को प्रभारी बनाकर नया प्रयोग किया है। ऊंचाहार में मनोज पासवान, बाबागंज में शिवशंकर सरोज और कौशांबी-फतेहपुर में राम करन निर्मल को जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा मधुबन से विनीत कुशवाहा और कुशीनगर से राहुल राज को भी जिम्मेदारी सौंपी गई है। इन प्रभारियों का मुख्य काम क्षेत्र में युवाओं को जोड़ना और पार्टी की विचारधारा को मजबूत करना है।
कांग्रेस भी विधानसभा क्षेत्रों में युवाओं को जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी ने बलिया से शैलेंद्र ध्रुव यादव, वेल्थरा रोड से मुरली मनोहर, बिलग्राम से सुभाष पाल और गौरा से तरुण पटेल को युवाओं को जोड़ने की जिम्मेदारी दी है। विपक्ष की रणनीति परंपरागत वोटबैंक को फिर से मजबूत करने के साथ ऐसे युवाओं को अपने साथ जोड़ने की है, जो बसपा से खिन्न हैं। सपा और कांग्रेस की कोशिश पीडीए के जरिए दलित, पिछड़े और अन्य सामाजिक समूहों के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की है।
दूसरी ओर, बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री मायावती आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी का आधार मजबूत करने के लिए एक बार फिर ब्राह्मणों पर दांव लगाने की तैयारी में हैं। हालांकि, पिछले कुछ सालों में पार्टी के कई प्रमुख ब्राह्मण नेता बसपा से दूर हो चुके हैं। अंटू मिश्रा का निष्कासन इसकी ताजा कड़ी है। पिछले एक दशक में कई ऐसे नेता पार्टी छोड़ चुके हैं, जिन्होंने बसपा के साथ रहकर अपनी राजनीति शुरू की थी। ऐसे में बसपा के सामने अपने पुराने सामाजिक समीकरण को फिर से मजबूत करने की चुनौती है।
साल 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 80 से अधिक ब्राह्मणों को टिकट दिया था। इनमें 41 उम्मीदवार जीतकर विधानसभा पहुंचे थे।
Updated on:
16 Aug 2026 10:20 am
Published on:
16 Aug 2026 10:20 am
