25 अक्टूबर 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

डाकू रत्नाकर से आदिकवि वाल्मीकि तक की विरासत को नया वैभव, यूपी में करोड़ों से संवर रहे रामायण से जुड़े स्थल

Valmiki Jayanti 2026: महर्षि वाल्मीकि जयंती पर यूपी सरकार उनकी विरासत संवार रही है। चित्रकूट, अयोध्या और इटावा में करोड़ों की परियोजनाओं से धार्मिक पर्यटन और श्रद्धालु सुविधाओं का विस्तार होगा।
4 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

लखनऊ

•

image

Ritesh Singh

•

Updated: 25 Oct 2026, 1:44 PM IST

वाल्मीकि जयंती विशेष: चित्रकूट, अयोध्या और इटावा में आश्रमों व धार्मिक स्थलों का विकास, रामायण सर्किट और राम वन-गमन पथ को नई पहचान देने की पहल (फोटो सोर्स : Ritesh Singh )

वाल्मीकि जयंती विशेष: चित्रकूट, अयोध्या और इटावा में आश्रमों व धार्मिक स्थलों का विकास, रामायण सर्किट और राम वन-गमन पथ को नई पहचान देने की पहल (फोटो सोर्स : Ritesh Singh )

Maharishi Valmiki Jayanti: रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि की विरासत को संरक्षित करने और उनसे जुड़े पौराणिक स्थलों को नई पहचान दिलाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार धार्मिक पर्यटन के विकास पर जोर दे रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पर्यटन विभाग रामायण सर्किट और राम वन-गमन पथ के तहत महर्षि वाल्मीकि से जुड़े स्थलों के संरक्षण, सौंदर्यीकरण और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं के विस्तार की दिशा में काम कर रहा है। चित्रकूट, अयोध्या और इटावा में करोड़ों रुपये की परियोजनाओं के माध्यम से इन धार्मिक स्थलों को विकसित किया जा रहा है। महर्षि वाल्मीकि जयंती, 26 अक्टूबर के अवसर पर उनकी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के इन प्रयासों को विशेष महत्व दिया जा रहा है।

चित्रकूट के वाल्मीकि आश्रम पर विशेष जोर

महर्षि वाल्मीकि से जुड़े प्रमुख स्थलों में चित्रकूट के लालापुर स्थित वाल्मीकि आश्रम का विशेष स्थान है। पर्यटन विभाग के अनुसार, वित्त वर्ष 2021-22 और 2023-24 के दौरान यहां 19.95 लाख रुपये की लागत से 12.5 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा स्थापित की गई। इसके अतिरिक्त आश्रम के विकास पर 184.95 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। इससे स्थल की धार्मिक पहचान को मजबूत करने और आगंतुकों के अनुभव को बेहतर बनाने का प्रयास किया गया है।

आश्रम के निकट 1120.79 लाख रुपये की लागत से पर्यटन सुविधा केंद्र का निर्माण भी लगभग पूरा होने की जानकारी दी गई है। इस केंद्र के विकसित होने से श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। पर्यटन विभाग की योजना इन स्थलों को केवल धार्मिक आस्था के केंद्र के रूप में ही नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, संस्कृति और रामायण परंपरा से परिचित कराने वाले महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों के रूप में भी विकसित करने की है।

घाट, परिक्रमा पथ और आरती स्थल का होगा विकास

लालापुर में पर्यटन सुविधाओं के विस्तार के लिए वित्त वर्ष 2025-26 में कई परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है। विभागीय जानकारी के मुताबिक, प्राचीन हनुमान मंदिर के विकास के लिए 166.24 लाख रुपये, तमसा गंगा नदी पर वाल्मीकि घाट के निर्माण के लिए 905.08 लाख रुपये और वाल्मीकि आश्रम में परिक्रमा पथ तथा आरती स्थल के विकास के लिए 525.77 लाख रुपये की परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं।

इन योजनाओं का उद्देश्य आश्रम परिसर और आसपास के धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही को सुगम बनाना है। परियोजनाएं पूरी होने पर लोगों को आवागमन, प्रकाश, बैठने और छाया जैसी बुनियादी सुविधाओं का लाभ मिलने की उम्मीद है। घाट और आरती स्थल का विकास धार्मिक आयोजनों को व्यवस्थित करने के साथ क्षेत्र के पर्यटन अनुभव को भी बेहतर बना सकता है।

अयोध्या और इटावा में भी विकास की योजना

महर्षि वाल्मीकि से जुड़े स्थलों के विकास का दायरा चित्रकूट तक सीमित नहीं है। पर्यटन विभाग के अनुसार, अयोध्या के दोस्तपुर स्थित महर्षि वाल्मीकि आश्रम के पर्यटन विकास के लिए 107.48 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। वहीं, इटावा के बेला गांव स्थित प्राचीन वाल्मीकि मंदिर के विकास के लिए 83.17 लाख रुपये निर्धारित किए गए हैं।

इन परियोजनाओं के जरिए धार्मिक स्थलों के संरक्षण के साथ पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं बढ़ाने की योजना है। सरकार का उद्देश्य रामायण से जुड़ी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखते हुए इन स्थानों को पर्यटन मानचित्र पर अधिक प्रमुखता दिलाना है। रामायण सर्किट और राम वन-गमन पथ के माध्यम से विभिन्न धार्मिक स्थलों को जोड़ने की पहल भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

अयोध्या में वाल्मीकि की साहित्यिक विरासत को पहचान

महर्षि वाल्मीकि की विरासत को व्यापक पहचान दिलाने में अयोध्या की भी अहम भूमिका है। यहां नवनिर्मित हवाई अड्डे का नाम महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा रखा गया है। इसके साथ ही शहर का वाल्मीकि भवन, जिसे रामायण भवन भी कहा जाता है, उनकी साहित्यिक परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण केंद्र है। इसकी दीवारों पर संस्कृत में रामायण अंकित होने की जानकारी दी गई है। यह भारतीय साहित्य और संस्कृति में महर्षि वाल्मीकि के योगदान को रेखांकित करता है।

रत्नाकर से आदिकवि बनने की प्रेरक कथा

महर्षि वाल्मीकि का जीवन आत्मबोध, साधना और परिवर्तन की प्रेरणा देने वाली कथा के रूप में याद किया जाता है। प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार, उनका मूल नाम रत्नाकर था और शुरुआती जीवन में वे राहगीरों को लूटने का काम करते थे। देवर्षि नारद से भेंट के बाद उनके जीवन में बदलाव आया। उन्होंने सांसारिक जीवन छोड़कर तपस्या और राम नाम के जाप का मार्ग अपनाया। मान्यता है कि वर्षों की साधना के दौरान उनके चारों ओर दीमकों का टीला बन गया, जिसे संस्कृत में ‘वाल्मीक’ कहा जाता है। इसी से उनका नाम वाल्मीकि पड़ा।

उनके जीवन की यह कथा बताती है कि आत्मचिंतन और दृढ़ संकल्प के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। इसी कारण महर्षि वाल्मीकि को केवल रामायण के रचयिता के रूप में ही नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन और ज्ञान-साधना के प्रतीक के रूप में भी स्मरण किया जाता है।

क्रौंच पक्षी की करुणा से रामायण की रचना तक

धार्मिक परंपरा के अनुसार, क्रौंच पक्षी के वध से उत्पन्न करुणा ने महर्षि वाल्मीकि के मुख से प्रथम श्लोक को जन्म दिया। इसे संस्कृत काव्य परंपरा की महत्वपूर्ण शुरुआत माना जाता है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी की प्रेरणा से उन्होंने रामायण की रचना की। यह महाकाव्य भगवान राम के जीवन, आदर्शों, संघर्षों और मर्यादा का वर्णन करता है। रामकथा के अनुसार, माता सीता ने वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश को जन्म दिया था और महर्षि ने दोनों को शिक्षा देने के साथ रामायण का गायन भी सिखाया।

विरासत संरक्षण से पर्यटन को बढ़ावा देने की पहल

पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह के अनुसार, प्रदेश सरकार रामायण से जुड़े धार्मिक स्थलों के संरक्षण और विकास के माध्यम से श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएंबढ़ाने पर काम कर रही है। उन्होंने महर्षि वाल्मीकि के जीवन को आत्मबोध, ज्ञान-साधना और सकारात्मक बदलाव की प्रेरणा बताया। वहीं, पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अमृत अभिजात ने महर्षि वाल्मीकि की विरासत को भारतीय संस्कृति और रामायण परंपरा की अमूल्य धरोहर बताया।

उनके मुताबिक, सरकार का उद्देश्य इन स्थलों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना तथा भावी पीढ़ियों को महर्षि वाल्मीकि के जीवन, साहित्य और आदर्शों से परिचित कराना है। महर्षि वाल्मीकि जयंती पर उनकी विरासत का संरक्षण साहित्य, संस्कृति और धार्मिक परंपरा के प्रति सम्मान का अवसर है। चित्रकूट, अयोध्या और इटावा में जारी विकास कार्यों से उम्मीद है कि इन स्थलों पर श्रद्धालुओं की सुविधाएं बेहतर होंगी और रामायण से जुड़ी सांस्कृतिक धरोहर को नई पीढ़ियों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।