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IDBI बैंक बनाने वाली कांग्रेस सरकार ने बेचने का किया विरोध, समझिए प्राइवेट बनने से लेकर, फायदे-मुनाफे का गणित

IDBI बैंक बेचने को लेकर सियासी घमासान मचा है। कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर लिखा- "कांग्रेस बैंक बनाती थी और भाजपा बेचती है...।" आइए, इस बैंक के बनने से बेचने तक की कहानी पढ़ते हैं।
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Ravi Gupta

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Updated: 30 Oct 2026, 6:03 PM IST

Credit- Janani AI

आज जिस IDBI बैंक को लेकर राजनीतिक घमासान मचा है उस बैंक को कांग्रेस के दौर में उद्योगों के लिए बनाया गया था। उसका काम देश के कारखानों और उद्योगों को पैसा देना था। साठ साल से ज़्यादा के इस सफर में वह विकास संस्था से सरकारी बैंक बना, फिर भारी घाटे में डूबा, और अब उसकी बिक्री का रास्ता खुल चुका है। आइए, पूरे सफर को समझते हैं-

निर्मला सीतारमण ने दिया जवाब

1964: उद्योगों को पैसा देने के लिए बनी संस्था

आजादी के बाद भारत को नए कारखाने खड़े करने थे, पर उन्हें लंबे समय का कर्ज देने वाली कोई बड़ी संस्था नहीं थी। इसी कमी को भरने के लिए 1 जुलाई 1964 को संसद के कानून के तहत भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (IDBI) बना। यह बैंक नहीं, बल्कि एक विकास वित्तीय संस्था (DFI) थी, जिसका काम उद्योगों को कर्ज देना, उन्हें सहारा देना और दूसरी वित्तीय संस्थाओं के बीच तालमेल बैठाना था।

शुरुआत में यह रिजर्व बैंक की सहायक संस्था थी। जानकारी के अनुसार 1976 में इसका स्वामित्व केंद्र सरकार को सौंपा गया और यह देश की शीर्ष विकास वित्त संस्था बन गई। करीब चालीस साल तक यह इसी भूमिका में रही।

2004: संस्था से बैंक में बदलाव

2000 के दशक तक बदलाव का दबाव बढ़ चुका था। उद्योगों को लंबे कर्ज बाजार और बैंकों से भी मिलने लगे थे, और विकास वित्त संस्थाओं का पुराना ढांचा कमजोर पड़ रहा था। इसी वजह से संसद ने 2003 में एक कानून पारित किया, जिसके तहत IDBI को कंपनी में बदला जाना था।

बदलाव इन चरणों में हुआ:

  • 27 सितंबर 2004: IDBI लिमिटेड नाम की कंपनी बनी।
  • 1 अक्टूबर 2004: इसने बैंकिंग कामकाज शुरू किया।
  • 2005: IDBI की अपनी निजी सहायक संस्था IDBI Bank Ltd. का इसमें विलय हुआ।
  • 2006: यूनाइटेड वेस्टर्न बैंक का इसमें विलय हुआ, जिससे शाखाओं का नेटवर्क बढ़ा।
  • 7 मई 2008: नाम बदलकर औपचारिक रूप से IDBI Bank Ltd. रखा गया।

यानी चार साल में एक विकास संस्था पूरी तरह आम बैंक बन गई।

घाटे का दौर: जब बैंक डूबता गया

बैंक बनने के बाद IDBI ने बड़ी कंपनियों को भारी कर्ज दिए। जब इनमें से कई कंपनियां कर्ज नहीं चुका पाईं, तो बैंक का एनपीए (डूबे कर्ज) तेजी से बढ़ा। हालत इतनी बिगड़ी कि लगातार पांच साल घाटा रहा।

  • FY16: लगभग ₹3,665 करोड़ का घाटा
  • FY17: लगभग ₹5,158 करोड़ का घाटा
  • FY18: लगभग ₹8,238 करोड़ का घाटा
  • FY19: लगभग ₹15,116 करोड़ का घाटा
  • FY20: ₹12,887 करोड़ का घाटा, जबकि FY19 में घाटा ₹15,116 करोड़ था

सिर्फ FY18 से FY20 के तीन साल में ही घाटा करीब ₹36,000 करोड़ बैठता है। मार्च 2020 की तिमाही में बैंक 13 लगातार घाटे वाली तिमाहियों के बाद पहली बार मुनाफ़े में आया, लेकिन पूरे साल का नतीजा घाटे में ही रहा।

2019: LIC का सहारा और "प्राइवेट" का दर्जा

बैंक को बचाने के लिए सरकार ने सरकारी बीमा कंपनी LIC को आगे किया। LIC ने 21 जनवरी 2019 को IDBI बैंक में 51% नियंत्रक हिस्सेदारी का अधिग्रहण पूरा किया, और बैंक को LIC से कुल ₹21,624 करोड़ की पूंजी मिली।

इसके बाद रिजर्व बैंक ने IDBI को सरकारी की जगह निजी क्षेत्र के बैंक की श्रेणी में रख दिया। जानकारी के मुताबिक, घोषणा मार्च 2019 में हुई थी।

इसे पूरा निजीकरण न समझें। इसके बाद भी बैंक के मालिक सरकार और LIC ही थे। बस कागजों में बैंक की गिनती निजी बैंकों में होने लगी।

वापसी: पांच साल बाद पहला मुनाफा

LIC की पूंजी और बैंक की नई रणनीति से हालात सुधरने लगे। बैंक ने बड़े कॉर्पोरेट कर्ज से हटकर खुदरा (रिटेल) कर्ज पर जोर दिया। मार्च 2021 में बैंक रिजर्व बैंक के PCA (त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई) ढांचे से बाहर आया। वित्त वर्ष 2020-21 में बैंक पांच साल बाद मुनाफे में लौटा और ₹1,359 करोड़ का शुद्ध लाभ दर्ज किया।

उसके बाद के सालों में मुनाफा हर साल बढ़ता गया:

वित्त वर्षशुद्ध लाभ / घाटा
2016-17−₹5,158 करोड़
2017-18−₹8,238 करोड़
2018-19−₹15,116 करोड़
2019-20−₹12,887 करोड़
2020-21₹1,359 करोड़
2021-22₹2,439 करोड़
2022-23₹3,645 करोड़
2023-24₹5,634 करोड़
2024-25₹7,515 करोड़
2025-26₹9,513 करोड़

(2025-26 का ₹9,513 करोड़ स्टैंडअलोन आंकड़ा है। FY17 से FY26 के आंकड़े एक संकलन-तालिका से लिए गए हैं, जबकि FY20, FY21, FY22 और FY26 की पुष्टि सीधे खबरों से हुई है।)

FY26 में स्टैंडअलोन शुद्ध लाभ ₹9,513.36 करोड़ रहा, जबकि FY25 में ₹7,515.17 करोड़ था। इस उछाल के पीछे एक बार का फायदा भी है: NSDL के IPO में अपनी हिस्सेदारी बेचने से बड़ा लाभ हुआ। इसी दौर में बैंक का सकल एनपीए घटकर 2.32% रह गया। यानी जो बैंक कभी हर साल हजारों करोड़ गंवाता था, वह अब सबसे ज्यादा कमाई वाले दौर में है।

अब बिकने की तैयारी

सरकार लंबे समय से IDBI की हिस्सेदारी बेचना चाहती थी। मई 2021 में CCEA ने बिक्री को सैद्धांतिक मंजूरी दी थी, और अक्टूबर 2022 में इच्छुक खरीदारों से रुचि पत्र मांगे गए। पांच साल की लंबी प्रक्रिया के बाद अक्टूबर 2026 में फैसला आया।

14 अक्टूबर 2026 को CCEA ने IDBI बैंक की 60.72% हिस्सेदारी Fairfax Financial Holdings से जुड़े खरीदार को ₹52,878 करोड़ में बेचने को मंजूरी दी। इसमें सरकार की 30.48% और LIC की 30.24% हिस्सेदारी शामिल है।

लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं हुई है, इन बातों पर भी ध्यान दें:

  • सौदे के लिए नियामकीय और वैधानिक मंज़ूरियाँ चाहिए, जिनमें Fairfax पर रिज़र्व बैंक की राय भी शामिल है।
  • सौदा RBI की मंज़ूरी के बाद वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक पूरा होने की उम्मीद है, और उसके बाद ओपन ऑफर आएगा।
  • सौदे के बाद सरकार और LIC मिलाकर 34% हिस्सेदारी रखेंगे, और सरकार की बची 15% हिस्सेदारी खुले बाज़ार में बेचने का अधिकार भी CCEA ने दिया है।

एक नजर में पूरी बात समझिए

सालपड़ाव
1964विकास वित्त संस्था के रूप में स्थापना
2004कंपनी में बदलाव, बैंकिंग कामकाज शुरू
2005-06IDBI Bank Ltd. और यूनाइटेड वेस्टर्न बैंक का विलय
2008नाम बदलकर IDBI Bank Ltd.
FY16-FY20लगातार पाँच साल घाटा
2019LIC की 51% हिस्सेदारी, निजी बैंक का दर्जा
FY21पाँच साल बाद पहला मुनाफ़ा
FY26₹9,513 करोड़ का मुनाफ़ा
अक्टूबर 2026Fairfax को बिक्री की मंज़ूरी

उद्योगों को पैसा देने के लिए बनी संस्था से आम बैंक बनी, कर्ज में डूबी, LIC के सहारे उबरी और अब नए मालिक की ओर बढ़ रही है। यह IDBI की पूरी कहानी है।