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Rajasthan Panchayat Election Results: जीत पर नहीं, सरपंच चुनाव हारने पर प्रत्याशी का सम्मान, मिले 25 लाख नकद, जानिए दिलचस्प वाकया

Inspiring Story from Nagaur: नागौर के मूंड़वा की भदौरा पंचायत में सरपंच चुनाव हारीं किसान चिड़ी देवी तो ग्रामीणों ने थाल में 25 लाख रुपये सजाकर भेंट किए। जानिए राजस्थान के अनोखे भाईचारे की कहानी।
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नागौर

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Nakul Devarshi

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Updated: 26 Oct 2026, 9:42 AM IST

nagaur chidi devi sarpanch election loss villagers gift 25 lakh rupees 1

हारी हुई प्रत्याशी चिड़ी देवी, नकद सम्मान करते ग्रामीण

राजस्थान में पंचायती राज चुनाव 2026 के नतीजों के बीच नागौर जिले से एक ऐसी दिल छू लेने वाली और सामाजिक समरसता की अनूठी खबर सामने आई है, जिसने चुनावी राजनीति और हार-जीत के पारंपरिक मायनों को ही पूरी तरह बदल दिया है। आमतौर पर चुनाव हारने के बाद प्रत्याशियों और उनके समर्थकों के घरों में सन्नाटा और मायूसी छा जाती है, लेकिन नागौर जिले की मूंड़वा पंचायत समिति के अंतर्गत आने वाली भदौरा ग्राम पंचायत में ग्रामीणों ने मिसाल कायम की है। यहाँ सरपंच चुनाव में महज 162 वोटों से चुनाव हारने वाली 45 वर्षीय साधारण किसान महिला प्रत्याशी चिड़ी देवी के गम को भुलाने के लिए ग्रामीणों ने एकजुट होकर एक आम सभा बुलाई और आपसी सहयोग से देखते ही देखते 25 लाख रुपये की भारी-भरकम सम्मान राशि जुटा ली।

इसके बाद पूरे गांव के बुजुर्ग, युवा और सम्मानित लोग एकत्र होकर थाल में 25 लाख रुपये की नकदी सजाकर हारे हुए प्रत्याशी के घर पहुंचे और गाजे-बाजे के साथ उन्हें यह राशि भेंट की। चुनावी नतीजे आने के बाद भदौरा पंचायत के मोड़ी गांव से सामने आई इस भावुक और सम्मानजनक तस्वीर की चर्चा अब केवल नागौर जिले में ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में काफी तेजी से हो रही है।

162 वोटों के मामूली अंतर से हारी थीं किसान परिवार की चिड़ी देवी

भदौरा ग्राम पंचायत के मोड़ी गांव की निवासी चिड़ी देवी एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखती हैं। उनके पति हेमाराम राव गांव में खेती-किसानी करते हैं। सरपंच पद के लिए हुए इस चुनाव में चिड़ी देवी का सीधा मुकाबला भदौरा गांव से सेवानिवृत्त थानेदार माधोसिंह की पुत्रवधू गिरिजा सान्डू से था।

मतगणना के बाद आए नतीजों में मुकाबला कड़ा रहा। विजयी प्रत्याशी गिरिजा सान्डू को कुल 1317 वोट मिले, जबकि चिड़ी देवी के पक्ष में 1155 वोट पड़े। महज 162 वोटों के छोटे से अंतर से चिड़ी देवी चुनाव हार गईं।

नतीजों के बाद एक समय के लिए समर्थकों में निराशा का माहौल बनना स्वाभाविक था, लेकिन गांव वालों ने इस हार को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी मानते हुए स्थिति को पलटने का निर्णय लिया।

जब पूरा गांव हुआ एकजुट, 'जीतेगा तो गांव, हारेगा तो भी गांव'

चुनावी परिणाम के बाद मोड़ी गांव में ग्रामीणों की एक विशेष पंचायत आयोजित हुई। इस बैठक में मौजूद ग्रामीणों और प्रबुद्ध लोगों ने कहा कि चुनाव में हार और जीत सिक्के के दो पहलुओं की तरह होती है, लेकिन गांव का आपसी भाईचारा, सम्मान और सामाजिक एकता किसी भी पद या कुर्सी से कहीं ज्यादा बड़ी होती है। ग्रामीणों ने एक सुर में कहा, "जीतेगा तो भी पूरा गांव जीतेगा और हारेगा तो भी पूरा गांव ही हारेगा।"

इसी भावना के साथ ग्रामीणों ने तुरंत आपसी सहयोग से राशि जुटाने की शुरुआत की और कुछ ही देर में 25 लाख रुपये की राशि जमा हो गई। इसके बाद गांव के लोग चिड़ी देवी और उनके पति हेमाराम राव के घर पहुंचे और थाल में सजाकर 25 लाख रुपये की नकदी सौंपकर उनके प्रति अपना अटूट विश्वास और सम्मान व्यक्त किया।

समाज सेवा और गौशाला के लिए जाना जाता है हेमाराम राव का परिवार

मोड़ी गांव के लोगों द्वारा दिखाए गए इस अभूतपूर्व स्नेह और सम्मान के पीछे हेमाराम राव के परिवार का पुराना सामाजिक और परोपकारी योगदान भी एक बड़ी वजह रहा है। गांव वालों के अनुसार, करीब 2 साल पहले हेमाराम राव ने अपनी व्यक्तिगत बचत से गांव की स्थानीय गौशाला को एक नया ट्रैक्टर भेंट किया था।

इसके साथ ही उन्होंने ग्रामीणों और राहगीरों के लिए शीतल जल की प्याऊ का निर्माण कराया था और पेयजल संकट को दूर करने के लिए अपने खर्चे पर बोरवेल खुदवाने की घोषणा भी की थी। परिवार का यही निस्वार्थ सेवा भाव और सामाजिक जुड़ाव चुनाव हारने के बाद ग्रामीणों के इस जबरदस्त समर्थन के रूप में सामने आया।

"पद मिले या न मिले, गांव वालों का अपनापन ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी"

ग्रामीणों द्वारा दिए गए इस अभूतपूर्व सम्मान और 25 लाख रुपये की सहयोग राशि से गदगद हेमाराम राव और चिड़ी देवी भावुक हो उठे। मीडिया से बातचीत करते हुए हेमाराम राव ने कहा कि सरपंच का चुनाव न जीत पाने का थोड़ा मलाल जरूर था, लेकिन गांव के भाइयों, बुजुर्गों और माताओं-बहनों ने जिस तरह इस पल को गर्व और सम्मान में बदल दिया है, उसने हार का सारा दुख मिटा दिया है।

उन्होंने बेहद विनम्रता से कहा कि राजनीति में पद मिले या न मिले, लेकिन अपने ही गांव के लोगों का यह निस्वार्थ प्रेम, अपनापन और सम्मान ही उनके जीवन की सबसे बड़ी और सच्ची पूंजी है। इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति में आज भी आपसी रिश्ते, सम्मान और भाईचारा चुनावी हार-जीत से कहीं ऊपर हैं।