
पूर्व पीएम नरसिम्हा राव और कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह। (फोटो- ANI/Congress)
अर्जुन सिंह नेहरू-गांधी परिवार के खास माने जाते थे। राजीव गांधी ने भी उन पर खूब भरोसा किया, लेकिन 1991 में आतंकी हमले में उनकी मौत के बाद ही एक तरह से सिंह का राजनीतिक सफर ढलान की ओर चल पड़ा था।
राजीव की हत्या के बाद सोनिया ने राजनीति में आने से इंकार कर दिया तो बतौर पीएम एक नाम अर्जुन सिंह का भी उछला। लेकिन, उनके और शरद पवार के बीच होड़ का फायदा नरसिम्हा राव उठा ले गए। उधर मध्य प्रदेश में भी अर्जुन सिंह कमजोर पड़ गए और सीएम की कुर्सी पर दिग्विजय सिंह बैठ गए।
राव और सिंह की अदावत खत्म नहीं हुई। 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद उनहोंने राव को पीएम पद से हटवाने की भी चाल चली, लेकिन कामयाब नहीं हो सके। इसी का नतीजा रहा कि अर्जुन सिंह बागी भी हुए। 1995 में की गई बगावत की कहानी कुछ ऐसी रही।
19 मई का दिन था। जगह- दिल्ली का तालकटोरा स्टेडियम। बाहर जितनी गर्मी थी, अंदर माहौल उससे भी ज्यादा गर्म था। कांग्रेस के 30 हजार से ज्यादा कार्यकर्ता उबल रहे थे। वे पीवी नरसिम्हा राव को कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाए जाने की मांग कर रहे थे। बागी नेता अर्जुन सिंह और एमएल फोतेदार भागे-भागे सोनिया गांधी के घर पहुंचे थे। उन्होंने सोनिया से दखल देने की मांग की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। सोनिया का इंकार लेकर दोनों नेता कांग्रेस कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में वापस तालकटोरा स्टेडियम पहुंचे। माहौल गरमाया हुआ ही था। अर्जुन सिंह ने माइक थामा और घोषणा कर दी- नारायण दत्त तिवारी पार्टी के नए अध्यक्ष होंगे। बागियों ने बाद में इस पार्टी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंदिरा) नाम दिया। इस तरह अर्जुन सिंह और नारायण दत्त तिवारी की अगुआई में कांग्रेस में एक और विभाजन हो गया।
अर्जुन सिंह और तिवारी ने कांग्रेस तोड़ तो दी, लेकिन पार्टी में उच्च स्तर पर समर्थन नहीं जुटा सके। नतीजतन उनका सिक्का चला नहीं। इसलिए, दो साल बाद ही जब सोनिया गांधी पार्टी में सक्रिय हो गईं और नरसिम्हा राव भी किनारे हो गए तो अर्जुन सिंह कांग्रेस में वापस आ गए। उन्होंने सोनिया के प्रति वफादारी दिखाई। कांग्रेस में वापसी के छह साल बाद उन्हें मंत्री बनने का मौका मिला।
अर्जुन सिंह ने आत्मकथा ‘A Grain of Sand in the Hourglass of Time’ में अपने कैरियर से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा शेयर किया है। यह बात 1985 की है। 11 मार्च को अर्जुन सिंह को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई थी। शपथ लेने के बाद वह दिल्ली राजीव गांधी से मिलने आए। मुलाक़ात का मकसद मंत्रिमंडल के लिए नाम तय करना था। 12 मार्च की सुबह 10.30 बजे अर्जुन सिंह 1, सफदरजंग रोड के बंगले पर राजीव गांधी के पास पहुंच गए। उनके कमरे में गए तो देखा वह के कुर्सी के पास खड़े हैं। अर्जुन सिंह ने औपचारिक अभिवादन किया और आने का मकसद बताने ही वाले थे कि राजीव ने उनका हाथ पकड़ते हुए कहा- मैंने आपके लिए एक महत्वपूर्ण काम सोच रखा है। नए-नए सीएम बने अर्जुन सिंह को बड़ी हैरानी हुई। लेकिन, पीएम ने अगले ही पल स्थिति साफ कर दी- आपको पंजाब जाकर राज्यपाल का पद संभालना है।
जो आदमी एक दिन पहले सीएम बना हो, उसे अगले दिन किसी राज्य का गवर्नर बनाए जाने की बात की जा रही हो तो यह शायद ही उसे पसंद आए। अर्जुन सिंह को भी बात पसंद नहीं आई थी, लेकिन वह इंकार भी नहीं कर सकते थे। उन्होंने अनिच्छापूर्वक पूछा- कब जाना होगा? इस पर राजीव बोले- अगर आपको पत्नी से मशविरा करना है तो कर सकते हैं। इसका जवाब 'न' में सुन कर राजीव ने तुरंत कहा- 14 मार्च को शपथ ले लीजिए। यानि, अगले ही दिन!
राजीव ने इसके साथ ही अर्जुन सिंह को एक फ़ाइल पकड़ा दी और कहा- इसे अच्छी तरह पढ़ लीजिएगा। फ़ाइल में पंजाब की स्थिति का ब्योरा दिया गया था। फ़ाइल देते हुए राजीव ने यह भी कहा कि एमपी में आप जिसे भी सीएम बनवाना चाहते हैं, उनका नाम दे दीजिए और पंजाब में स्थिति सही हो जाने के बाद आप खुद भोपाल जाकर सीएम पद की शपथ ले सकते हैं। तो इस तरह, 1985 में सीएम की आई हुई कुर्सी अर्जुन सिंह के हाथ से चली गई थी।
| कब | क्या रहे | निर्वाचन क्षेत्र | ब्योरा |
| 1957 – 1960 | निर्दलीय विधायक | मझौली (म.प्र. विधानसभा) | पहली बार विधानसभा चुनाव जीता। |
| 1960 | कांग्रेस सदस्यता | — | भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए। |
| 1962 – 1967 | राज्य मंत्री (म.प्र. सरकार) | मझौली (म.प्र. विधानसभा) | द्वारका प्रसाद मिश्रा सरकार में राज्य मंत्री रहे। |
| 1967 – 1972 | विधायक | उमरिया (उपचुनाव) | चुरहट से हारने के बाद उमरिया उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। |
| 1972 – 1977 | कैबिनेट मंत्री | चुरहट (म.प्र. विधानसभा) | प्रकाश चंद्र सेठी और श्यामाचरण शुक्ल मंत्रिमंडलों में शिक्षा मंत्री रहे। |
| 1977 – 1980 | नेता प्रतिपक्ष | चुरहट (म.प्र. विधानसभा) | जनता पार्टी सरकार के दौर में म.प्र. विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे। |
| 1980 – 1985 | मुख्यमंत्री (प्रथम कार्यकाल) | चुरहट (म.प्र. विधानसभा) | 9 जून 1980 से 12 मार्च 1985। चंबल डकैतों का ऐतिहासिक आत्मसमर्पण (1982) और भोपाल गैस त्रासदी (1984)। |
| मार्च 1985 | मुख्यमंत्री (द्वितीय कार्यकाल) | चुरहट | 11 मार्च 1985 को दूसरी बार शपथ ली, लेकिन 1 दिन बाद ही पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया गया। |
| मार्च 1985 – नवं 1985 | राज्यपाल (पंजाब) | पंजाब राज्य | 14 मार्च से 14 नवंबर 1985। ऐतिहासिक राजीव-लौंगोवाल पंजाब शांति समझौते में केंद्रीय भूमिका निभाई। |
| 1985 – 1986 | केंद्रीय वाणिज्य मंत्री | दक्षिण दिल्ली (लोकसभा) | राजीव गांधी सरकार में केंद्रीय कैबिनेट मंत्री रहे। |
| 1986 – 1988 | केंद्रीय संचार मंत्री | दक्षिण दिल्ली (लोकसभा) | राजीव गांधी मंत्रिमंडल में संचार मंत्रालय संभाला। |
| 1988 – 1989 | मुख्यमंत्री (तृतीय कार्यकाल) | खरसिया (म.प्र. विधानसभा) | 14 फरवरी 1988 से 23 जनवरी 1989 तक म.प्र. के 12वें मुख्यमंत्री रहे। |
| 1991 – 1994 | केंद्रीय मानव संसाधन विकास (HRD) मंत्री | सतना (लोकसभा) | पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार में कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में सदन के नेता (जुलाई-नवंबर 1991)। |
| 1995 – 1998 | सह-संस्थापक (ऑल इंडिया इंदिरा कांग्रेस - तिवारी) | — | नरसिम्हा राव से मतभेदों के बाद एन.डी. तिवारी के साथ मिलकर अलग पार्टी बनाई; 1998 में पुनः कांग्रेस में वापसी की। |
| 2000 – 2006 | राज्यसभा सांसद (प्रथम कार्यकाल) | मध्य प्रदेश | वर्ष 2000 में उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार (Outstanding Parliamentarian Award) से सम्मानित किया गया। |
| 2004 – 2009 | केंद्रीय मानव संसाधन विकास (HRD) मंत्री | राज्यसभा (म.प्र.) | डॉ. मनमोहन सिंह (UPA-1) सरकार में 27% OBC आरक्षण लागू करने का ऐतिहासिक 93वां संविधान संशोधन कराया। |
| 2006 – 2011 | राज्यसभा सांसद (द्वितीय कार्यकाल) | मध्य प्रदेश | 4 मार्च 2011 को नई दिल्ली में निधन तक राज्यसभा के सदस्य रहे। |
अर्जुन सिंह जब पहली बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने कई दस्युओं से हथियार डलवाए थे। इनमें फूलन देवी भी शामिल थीं। इसके लिए एक समारोह आयोजित किया गया था। इस समारोह में उन्होंने पहली बार फूलन देवी को देखा। उसे देख कर उन्हें हैरानी भी हुई थी और हमदर्दी भी पैदा हुई थी। इसका अनुभव भी अर्जुन सिंह ने आत्मकथा में बयान किया है।
Updated on:
4 Nov 2026, 7:50 PM IST
Published on:
4 Nov 2026, 7:50 PM IST
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