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जब बागी हो गए थे माधव राव सिंधिया, मां से कहा था- अब मैं खुद ले सकता हूं अपने फैसले

राजनीति में कैसे आया सिंधिया खानदान? कैसे महाराज का भाई और गुरु बना एक मुसलमान? ताजिया नहीं जला, मैं जला हूं- बोल कर दिन भर मोहर्रम के जुलूस में घूमे थे माधव महाराज सिंधिया। महादजी सिंधिया ने मुस्लिम को बनाया था भाई और गुरु। पढ़िए सिंधिया खानदान के किस्से।
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Scindia family history featuring Mahadji Scindia, Madhav Maharaj Scindia, Vijaya Raje Scindia and Jyotiraditya Scindia with a Muharram procession and Gwalior palace

1765 में ग्वालियर पर कब्जा करने वाले महादजी सिंधिया ने दौलत राव को गोद न लिया होता तो सिंधिया राजवंश का नामोनिशान कब का खत्म हो चुका होता। (इमेजिंग: एआई)

जनवरी 1996 की बात है। नरसिम्हा राव की सरकार थी। माधव राव सिंधिया मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्री थे। लेकिन, जैन हवाला डायरी में उनका नाम आ गया था तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। इस डायरी के मुताबिक आरोप था कि सिंधिया ने अवैध रूप से 75 लाख रुपये लिए थे। आरोप साबित नहीं हुए थे। पर 1996 (अप्रैल-मई) के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया। कांग्रेस का यह इंकार सिंधिया के सम्मान पर गहरा आघात था। 1971 में पहली बार सांसद बनने के बाद से वह कभी हारे नहीं थे। 1977 की जनता लहर में भी नहीं। इसलिए सिंधिया बागी हो गए और मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस (एमपीवीसी) नाम से अपनी पार्टी बना ली। वह चुनाव लड़े और सातवीं बार लोक सभा पहुंचे। हालांकि, 1998 में जब सीता राम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष नहीं रहे और नरसिम्हा राव का भी कद कम हो गया तब वह पुरानी पार्टी में लौट आए। इसके बाद ताउम्र कांग्रेस में ही रहे।

कांग्रेस में कैसे आए थे माधव राव सिंधिया

सिंधिया खानदान का कांग्रेस से कोई लगाव नहीं था। सच कहें तो उनका राजनीति से ही लगाव नहीं था। लेकिन, राज बचाने के डर से उन्हें राजनीति में उतरना पड़ा था। शुरुआत विजया राजे सिंधिया ने की तो फिर सिलसिला चल पड़ा और पीढ़ी दर पीढ़ी राजनीति चल रही है।

1967 में विजया राजे सिंधिया ने दो चुनाव लड़े थे। करेरा (ग्वालियर) विधान सभा सीट से भारतीय जन संघ के टिकट पर और गुना लोक सभा सीट से स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर। दोनों जगह उनकी जीत हुई। उन्होंने लोक सभा की सीट छोड़ी और मध्य प्रदेश विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष बनीं। उसी दौरान उनके बेटे माधव राव सिंधिया ने भी राजनीति में कदम रखा। 1971 में मां ने बेटे के लिए गुना सीट छोड़ दी।

26 साल के माधव राव भारतीय जन संघ के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत कर पहली बार लोक सभा पहुंचे। 1975 में इमर्जेंसी लगी तो विजया राजे को गिरफ्तार कर लिया गया। माधव राव नेपाल चले गए थे। इंदिरा सरकार ने उन्हें गिरफ्तार नहीं करने का आश्वासन दिया तो वह भारत लौटे। विजया राजे को पैरोल पर छोड़ा गया। विजया राजे ने अपनी आत्मकथा में माधव राव के हवाले से लिखा है कि अगर वह (माधव राव) कांग्रेस जॉइन नहीं करते तो उन्हें (विजया राजे) फिर से जेल में डाल दिया जाता।

आपातकाल के बाद चुनाव हुए तो माधव राव ने जन संघ छोड़ कर कांग्रेस से जुड़ने का फैसला कर लिया था। विजया राजे ने आत्मकथा में लिखा है कि माधव राव ने उनसे साफ कह दिया कि अब वह अपने फैसले खुद कर सकते हैं।

1977 के लोक सभा चुनाव में माधव राव सिंधिया गुना से निर्दलीय लड़े थे, पर उन्हें कांग्रेस का समर्थन था। कांग्रेस ने वहां कोई उम्मीदवार नहीं दिया था। जनता पार्टी की लहर में भी माधव राव की जीत हो गई थी। उनकी मां ने विरोधी पार्टी में होने के बावजूद बेटे को वोट देने की अपील की थी। हालांकि, इसके बाद मां-बेटे की राजनीतिक राहें अलग ही रहीं।

1980 में भाजपा बनी तो विजया राजे संस्थापक सदस्यों में से एक थीं और ताउम्र रहीं। माधव राव भी अंत तक कांग्रेस में ही रहे। बीच में दो साल अपनी पार्टी बना कर अलग रहे, पर किसी दूसरे दल में नहीं गए थे। 30 सितंबर, 2001 को जब मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) में विमान हादसे में उनकी मौत हुई उस समय वह पार्टी के काम से ही जा रहे थे।

हिंदू महासभा से हमदर्दी, फिर कांग्रेस में क्यों जाना पड़ा? राजनीति में कैसे आया सिंधिया खानदान?

आजाद भारत में 28 मई, 1948 को मध्य भारत बना। विजया राजे सिंधिया के पति जीवाजी राव सिंधिया इसके 'राजप्रमुख' या गवर्नर बने। उन दिनों देश भर में कांग्रेस का बोलबाला था, लेकिन जीवाजी राव के मन में हिंदू महासभा बसता था। वैसे राजनीति में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। फिर भी हिंदू महासभा को ग्वालियर-गुना इलाके में जीवाजी ने खूब प्रश्रय दिया।

विजया राजे की आत्मकथा 'राजपथ से लोकपथ पर' में 'राजमाता' ने लिखा है कि जीवाजी कांग्रेस को कभी आम लोगों की हितैषी पार्टी नहीं मानते थे। ऐसे में कांग्रेस के खिलाफ काम करने वाली पार्टी से उनका जुड़ाव स्वाभाविक ही था।' हालांकि, राजमाता समझती थीं कि कांग्रेस का विरोध करने का भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। इसलिए उन्होंने अपनी ओर से सरकार से संपर्क साधा था। 1956 में जब महाराजा बंबई में थे तब विजया राजे ने प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी से मुलाक़ात का वक्त मांगा था। दिल्ली के तीन मूर्ति भवन में उनकी मुलाक़ात हुई थी। इस मुलाक़ात में राजमाता ने प्रधानमंत्री को भरोसा दिया था कि जीवाजी राव हिन्दू महासभा को मदद या पैसा नहीं देंगे। वह कांग्रेस का विरोध कभी नहीं करेंगे। लेकिन, नेहरू को उन पर भरोसा नहीं हुआ था।

विजया राजे ने लिखा है कि नेहरू जी ने कहा कि कांग्रेस विरोधी नहीं होने का अर्थ कांग्रेस के साथ होना नहीं हैं। उन्होंने विजया राजे को पंडित गोविंद बल्लभ पंत (गृह मंत्री) और लाल बहादुर शास्त्री (रेल मंत्री) से मिल कर सारी बात बताने के लिए कहा था। उन्होंने सारी बात सुनने के बाद जीवाजी राव को कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए कह दिया। यह कहने पर कि उनकी राजनीति में रुचि नहीं है, खुद विजया राजे को लड़ने के लिए कहा। उन्होंने भी रुचि नहीं होने की बात कह कर मना कर दिया। लेकिन, ग्वालियर लौटने के बाद विजया राजे ने यह सोच कर मन बदल लिया कि मना करने पर कहीं उसकी कीमत न चुकानी पड़े। विजया राजे ने कांग्रेस जॉइन कर ली और 1957 में गुना से लोक सभा पहुंचीं। इस तरह सिंधिया परिवार की राजनीतिक यात्रा शुरू हुई।

फिर जन संघ में कैसे गईं विजया राजे?

विजया राजे ने 1957 के बाद 1962 का चुनाव भी कांग्रेस के टिकट पर लड़ा। लेकिन, 1966 में वह भारतीय जन संघ में आ गई थीं। इस बीच बहुत कुछ बदल चुका था। 1961 में महाराज जीवाजी राव गुजर गए थे। 1964 में पंडित नेहरू भी चल बसे थे। इसके बाद दिल्ली के राजनीतिक समीकरण बदल रहे थे और मध्य प्रदेश में भी कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र से राजमाता की बन नहीं रही थी। इन परिस्थितियों में उन्होंने 1966 में जनसंघ का दामन थाम लिया था। फिर वह वहीं रहीं और 1980 में भाजपा बनी तो उसके संस्थापक सदस्यों में रहीं।

महादजी सिंधिया ने मुस्लिम को बनाया था भाई और गुरु

सिंधिया खानदान मूल रूप से महाराष्ट्र में सतारा के पास कनेरकेड़ा गांव का है। 1722 में रानोजी राव से इस राजवंश की शुरुआत मानी जाती है। लेकिन, इस कुल के सबसे प्रतापी और चर्चित पूर्वजों में महादजी सिंधिया का नाम आता है। उन्होंने 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई लड़ी थी। उस लड़ाई में महादजी बुरी तरह जख्मी हो गए थे। राने खान नाम के एक पनिहारे ने उनकी जान बचाई थी।

1765 में जब महादजी ने ग्वालियर पर कब्जा किया तो उन्होंने राने खान को जागीरदार बना कर इसका ईनाम दिया था। सिर्फ जागीरदार ही नहीं बनाया, बल्कि महादजी ने खान को अपना भाई भी घोषित कर दिया। महादजी ने अपने राज्य का बड़ा विस्तार किया था। राजस्थान की मरुभूमि से बंगाल की खाड़ी तक उन्होंने अपना साम्राज्य फैलाया।

ताजिया नहीं जला, मैं जल गया हूं- क्यों बोले थे माधव महाराज

सिंधिया खानदान ने मुसलमानों से शुरू से ही अच्छा संबंध रखा। महाद जी ने राने खान को भाई तो बनाया ही, दिल्ली पर जीत के बाद मुगल बादशाह को भी इज्जत बख्शी। इतना ही नहीं, महादजी ने एक मुस्लिम, बाबा मंसूर शाह को अपना गुरु बनाया। ग्वालियर में आज भी हर साल सितंबर में सिंधिया खानदान की भागीदारी से बाबा मंसूर शाह का उर्स मनाया जाता है।

सिंधिया खानदान के मुस्लिमों से अच्छे रिश्ते की एक कहानी और है। यह कहानी वीर संघवी और नमिता भंडारे ने माधव राव सिंधिया की जीवनी (माधव राव सिंधिया, ए लाइफ) में दर्ज किया है। किस्सा माधव महाराज के दिनों की है, जो माधव राव सिंधिया के दादा थे। 1925 की बात है। मोहर्रम की पूरी तैयारी थी। इसी बीच इमामबाड़े में आग लग गई। ताजिया जल गया। जुलूस निकलने में दो घंटे देर हो गई। माधव महाराज को इससे बड़ा दुख हुआ। उन्होंने कहा, 'ताजिया नहीं जला, मैं जल गया हूं।' माधव महाराज खुद गलियों में निकल गए और पूरे दिन मोहर्रम के जुलूस में शामिल रहे।

…तो खत्म हो जाता सिंधिया खानदान

महाद जी ने न केवल सिंधिया राज का बेहद विस्तार किया, बल्कि वंश को आगे बढ़ाने की भी व्यवस्था की। उनकी नौ पत्नियां थीं, लेकिन बेटा एक भी नहीं था। तीन बेटियां ही थीं। तब उन्होंने भतीजे दौलतराव को गोद लिया और उन्हीं से उनका वंश कायम रहा।