
प्रशांत किशोर। (फोटो- IANS)
पेशेवर चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर की पार्टी का खाता बांकीपुर उपचुनाव से खुलता लग रहा है। मतों की गिनती में किशोर हर दौर में बीजेपी के नीरज कुमार से आगे ही बने हुए हैं। राजद की रेखा गुप्ता मुकाबले से बाहर हो गई हैं। किशोर की बढ़त ऐसे ही बनी रही तो बांकीपुर विधान सभा क्षेत्र बनने के बाद पहली बार वहां बीजेपी का विधायक नहीं होगा।
बांकीपुर में बीजेपी का दबदबा कम होने के कई मायने हैं। यह सीट बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन और उससे पहले उनके पिता की थी। नवीन की खाली की हुई सीट पर जन सुराज को बढ़त दे कर जनता ने संभवतः नितिन नवीन का यह भ्रम तोड़ने की कोशिश की है कि उन्हें जिताते रहे हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि वह किसी को भी थोप सकते हैं।
नितिन नवीन ने पहले अपने एक करीबी अभिषेक बंटी को बांकीपुर से उम्मीदवार बनाया था। बताया जाता है कि नवीन ने उनका नाम बिना किसी तय प्रक्रिया के तय कर लिया था। पार्टी के अंदर विरोध हुआ तो बंटी ने निजी कारणों से चुनाव से हटने का ऐलान किया। इसके बाद नीरज कुमार उम्मीदवार बनाए गए।
जन सुराज ने इसे भी एक मुद्दा बनाया और भुनाया। ऐसा नरेटिव बनाने की कोशिश की गई बीजेपी ने बांकीपुर को अपनी जेब की सीट समझ ली है। प्रशांत किशोर ने कहा कि भाजपा कहती है बांकीपुर में उसकी ओर से कुत्ता-बिल्ली को भी खड़ा किया जाए तो जीत होगी। मतलब बीजेपी बांकीपुर की पढ़ी-लिखी, समझदार जनता को कुत्ता-बिल्ली को चुनने लायक मानती है।
इसके अलावा जन सुराज ने यह नरेटिव भी बनाया कि प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी का असर यह है कि भाजपा को चुनाव से पहले ही उम्मीदवार बदलना पड़ा।
अभिषेक बंटी हों या नीरज कुमार, दोनों ही उम्मीदवार एकदम नए थे। विधान सभा चुनाव का टिकट मिलना इनके लिए पहला अनुभव था। नितिन नवीन ने संदेश दिया कि जैसे उन्हें जनता ने जिताया, वैसे उनके 'अपने उम्मीदवार' को जिताएं। प्रशांत किशोर ने संदेश दिया कि नितिन नवीन सांसद बनने के चक्कर में बांकीपुर की जनता को छोड़ कर चले गए और अगर नवीन को बांकीपुर के लोगों की फिक्र होती तो विधायक रहते हुए भी भाजपा अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी निभा सकते थे। बांकीपुर की जनता के लिए यह गर्व की बात होती कि उनका विधायक भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष है। किशोर का यह नरेटिव भी काम कर गया लगता है।
बांकीपुर में बीजेपी का नया और कमजोर उम्मीदवार होना पार्टी के लिए ठीक नहीं रहा। बीजेपी ने या तो अति आत्मविश्वास में, या फिर कड़े मुकाबले के आसार देखते हुए यह निर्णय लिया। ज्यादा संभावना है कि फैसला अति आत्मविश्वास में लिया गया। लोगों ने उम्मीदवार की तुलना की तो प्रशांत किशोर बेहतर और नया विकल्प लगे। उन्हें लगा जिस परिवार को उन्होंने हमेशा वोट दिया, जब उसका उम्मीदवार है ही नहीं तो नया (और अपेक्षाकृत मजबूत) विकल्प देखा जाए। वह कम से कम 'नाम वाला' तो है।
प्रशांत किशोर कई साल से बिहार में राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। इसके लिए उन्होंने लगभग पूरे राज्य का दौरा किया और 2025 के विधान सभा चुनाव में सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए। लेकिन, सफलता नहीं मिली।
2025 के विधान सभा चुनाव में करारी हार के बाद प्रशांत किशोर ने रणनीति के साथ-साथ अपने तेवर भी बदले हैं। विधान सभा चुनाव के समय किशोर की बातों में तल्खी, अति आत्मविश्वास और कभी-कभी घमंड भी दिखता था। उपचुनाव के दौरान उनके बात-व्यवहार में घमंड का भाव कम देखने को मिला। इस चुनाव में उनके इस बदले बर्ताव ने भी निश्चित रूप से उनके लिए सकारात्मक काम किया।
Updated on:
03 Aug 2026 12:31 pm
Published on:
03 Aug 2026 12:31 pm
