
प्रतीकात्मक तस्वीर। सोर्स-ANI
Dilip Rajak Arrest: एक असफल बैंक डकैती, मर्डर, करीब 2 दशक का लंबा इंतजार और 3,600 किलोमीटर का सफर। केरल पुलिस जब असम की एक राइस मिल के गोदाम में पहुंची, तो धूल के अंबार के बीच उसे एक शख्स नजर आया। पुलिस ने पूछा - दिलीप रजक? हां में सिर हिला और इसी के साथ पुलिस के कंधे से मानो हजारों किलो वजन उतर गया। 2007 में हुए एक हत्याकांड के सिलसिले में पुलिस को दिलीप रजक की तलाश थी। लंबे इंतजार के बाद आखिरकार पुलिस ने उसे खोज निकाला और वर्दी पर लगी आरोपों की धूल झड़ गई।
20 सितंबर को मलप्पुरम क्राइम ब्रांच पुलिस ने बिहार के 65 वर्षीय प्रवासी मज़दूर रजक को 2007 में एक आरा मिल मैनेजर की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया। पुलिस को इसके लिए लगभग 3,600 किलोमीटर का सफर करना पड़ा - केरल, असम और बिहार तक फैली लगभग दो दशक पुरानी जांच अब आखिरकार पूरी हो गई है और आरोपी सलाखों के पीछे है। क्राइम ब्रांच इंस्पेक्टर अमीराली वी के अनुसार, दिलीप को हमेशा डर रहता था कि एक दिन पुलिस उसे पकड़ लेगी और हमने उसके डर को सच साबित कर दिया। उसके ठिकाने की खबर लगते ही हमने पूरा फील्डवर्क किया, असमपुलिस से मदद मांगी और आखिरकार उसे पकड़ने में सफल रहे। हालांकि, एकअन्य आरोपी सनीचर बैटा अभी भी गिरफ्तार से दूर है।
पुलिस के मुताबिक, असम की कुछ राइस मिलों में काम करने केबाद दिलीप और सनीचर नौकरी की तलाश में दिसंबर 2007 की शुरुआत में केरल चले गए। केरल में, दोनों को पेरिनथलमन्ना की एक आरा मिल में नौकरी मिल गई, जहां उन्होंने अपने नाम उमेश और विनोद बताए। दिसंबर में कुछ दिनों के लिए मिल बंद थी। उसी दौरान पास स्थिति एक बैंक में डकैती की कोशिश हुई। करीब एक हफ्ते के बाद जब आरा मिल वापस खुली, तो मैनेजर बालकृष्णन का कोई अता-पता नहीं था। हालांकि, शुरुआत में प्रबंधन ने इसे गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि बालकृष्णन ने बताया था कि वह कोयंबटूर जा रहे हैं।
उधर, कोझिकोड के वडकारा में उनके परिवार को यही लगता था कि वह मिल के काम में व्यस्त हैं। 27 दिसंबर को मिलके कर्मचारियों को मैनेजर की लाश लकड़ी के बुरादे के ढेर के नीचे छिपी मिली। लाश को उस कपड़े से ढका गया था जो प्रवासी मज़दूरों को सोने के लिए दिया जाता था। पुलिस ने जांच शुरू की तो पता चला कि दिलीप और सनीचर (उर्फ उमेश और विनोद) लापता हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने दोनों का बैकग्राउन्ड खंगालना शुरू किया, लेकिन कुछ खास हाथ नहीं लगा। फिर पुलिसको जानकारी मिली तो दोनों पब्लिक फोन बूथ से कहीं कॉल करते थे। दोनों के पास मोबाइल नहीं था। कड़ी मशक्कत के बाद पुलिस यह पता लगाने में कामयाब हुई कि दोनों बिहार अपने घर कॉल करते थे। यह इस केस का पहला सुराग था। हालांकि, आगे का सफर पुलिस के लिए और भी ज्यादा मुश्किल होने वाला था।
क्राइम ब्रांच इंस्पेक्टर अमीराली वी ने बताया कि दोनों के पास मोबाइल नहीं था और पब्लिक बूथ से बिहार कॉल करते थे।इससे यह साफ हुआ कि आरोपी असम के नहीं, बल्कि बिहार से हैं। आरा मिल में नौकरी के समय दोनों ने खुद को असम का बताया था। जांचकर्ता बिहार के अररिया ज़िले के ताराबारी पुलिस स्टेशन के तहत आने वाले डाभरा गांव तक पहुंचे, लेकिन वहां कोई नहीं मिला। दरअसल, पुलिस उमेश और विनोद को खोज रही थी,जबकि उनके असली नाम दिलीप रजक और सनीचर बिट्टा थे। इसका खुलासा बाद में हुआ और फिर जांचने एक अलग मोड़ ले लिया। दिलीप अपनी पत्नी और बेटे के साथ गांव से जा चुका था। पुलिस असम और बिहार दोनों जगह नजर रखे हुए थे। लेकिन कोई कामयाबी नहीं मिली। 2015 में, यह केस क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया। क्राइम ब्रांच की टीमें 2021 और 2025 में भी बिहार गईं, लेकिन पता चला कि आरोपी लंबे समय सेगांव नहीं आए।
AI टेक्नॉलजी इस केस में पुलिस के लिए वरदान साबित हुई। 'गांडीव'(Gandiva) ने पुलिस को आरोपी दिलीप के ठिकाने तक पहुंचाया। यह नेशनल इंटेलिजेंसग्रिड (NATGRID) के लिए विकसित किया गया एक स्वदेशी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीनलर्निंग (AI-ML) आधारित विश्लेषणात्मक सॉफ्टवेयर टूल है। गांडीव विभिन्न स्रोतों(बैंक खाते, फोन रिकॉर्ड, यात्रा/आव्रजन इतिहास, रेलवे,पुलिस,कईदूसरी सरकारी एजेंसियां और टेलीकॉम डेटा आदि) से बिखरे हुए डेटा को एक सिंगल-पॉइंटप्लेटफॉर्म पर जोड़ता है, जिससे इंटेलिजेंस-आधारित जांच में मदद मिलती है।
मलप्पुरम क्राइम ब्रांच के पुलिस अधीक्षक एम पी मोहनचंद्रन नायर केअनुसार, जांचकर्ताओं ने दिलीप की उम्र के हिसाब से उसकी तस्वीर को अपडेट करने के लिए AI का इस्तेमाल किया और डेटाबेस में खोज की। इससे उन्हें बड़ी कामयाबी मिली, उन्हें दिलीप के नाम पर एक सिम कार्ड मिला। इसके बाद उसके कॉल डिटेल खंगाले गए। इससे पुलिस का शक यकीन में बदल गया कि जिस आरोपी की तलाश उसे है, वो यही है। जांचमें पुलिस को पता चला कि उस व्यक्ति ने कई सालों में कम से कम 15बार सिम कार्ड बदले थे, लेकिन बहुत कम कॉल किए और बहुत कम मैसेज भेजे।
बाद में, अधिकारियों ने फोन के टावर की लोकेशन का पता लगाया और आरोपी तक पहुंच गए। 20 सितंबर को, क्राइम ब्रांच की टीम ने स्थानीय पुलिसकी मद द से असम में दिलीप को गिरफ्तार किया और 28 सितंबर को उसेमलप्पुरम वापस ले आई। पुलिस की थ्योरी है कि बैंक डकैती और मैनेजर की हत्या के बीचसंबंध हो सकता है। संभव है कि पीड़ित बालकृष्णन को पता चल गया हो कि दोनों आरोपीबैंक में डकैती डालने की योजना बना रहे हैं और इसी के चलते उन्हें मौत के घाट उतारदिया गया। पुलिस का कहना है कि आरोपी से पूछताछ में पूरी सच्चाई सामने आ जाएगी।
Updated on:
09 Oct 2026 05:42 pm
Published on:
09 Oct 2026 04:31 pm
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