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केस लड़ते-लड़ते कर लिया समझौता तो वापस नहीं मिलेगी अदालत की फीस, मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Madras High Court: मद्रास हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि मुकदमे में गवाही दर्ज होने के बाद समझौता करने पर पक्षकारों को कोर्ट फीस वापस नहीं मिलेगी। जानिए कोर्ट ने क्या कहा।
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भारत

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Mukul Kumar

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Updated: 2 Nov 2026, 2:32 PM IST

Court News

कोर्ट के संबंध में इस्तेमाल की गई प्रतीकात्मक तस्वीर। (फाइल फोटो- पत्रिका)

अदालत में अक्सर ऐसा देखने को मिलता है केस लड़ते-लड़ते दोनों पक्ष आपस में सुलह करके मुकदमे को खत्म करा लेते हैं। इन मामलों को देखते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है।

मद्रास हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह साफ कर दिया है कि मुकदमे के दौरान दोनों पक्षों के बीच समझौता हो जाने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें कोर्ट में जमा की गई पूरी फीस वापस मिल जाएगी। अगर मामले में गवाहों की गवाही दर्ज हो चुकी है, तो पक्षकार कोर्ट फीस वापस पाने के हकदार नहीं होंगे।

30 अक्टूबर को आया यह फैसला

जस्टिस पीबी बालाजी की पीठ ने कहा कि मुकदमे में सबूत और गवाही दर्ज होने के बाद अदालत के बाहर समझौता करने वाले पक्षों को कोर्ट फीस वापस नहीं दिया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि भले ही गवाही का कुछ हिस्सा ही दर्ज हुआ हो, लेकिन इसके बाद फीस वापस करने का कोई आधार नहीं बनता। यह फैसला 30 अक्टूबर को सुशीला कवर बनाम एम पट्टू लक्ष्मी मामले में दो सिविल रिवीजन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया।

गवाही दर्ज होने के बाद फीस वापसी पर रोक

दोनों मामलों में पक्षकारों ने अदालत के बाहर आपसी सहमति से विवाद सुलझा लिया था। इसके बाद उन्होंने ट्रायल कोर्ट में जमा की गई फीस वापस करने की मांग की थी।

एक मामले में निचली अदालत ने प्रशासनिक खर्च के तौर पर 5 फीसदी राशि काटकर 50 फीसदी कोर्ट फीस लौटाने की अनुमति दी थी। वहीं, दूसरे मामले में फीस वापसी की मांग पूरी तरह खारिज कर दी गई थी।

किस फैसले का कोर्ट में दिया गया तर्क?

इसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में मद्रास उच्च न्यायालय बनाम एमसी सुब्रमण्यम मामले में फैसला दिया था कि अदालत के बाहर समझौता होने पर भी पूरी कोर्ट फीस वापस की जा सकती है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अलग क्यों है हाईकोर्ट की राय?

जस्टिस बालाजी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 2021 के फैसले में इस बात पर विचार नहीं किया गया था कि समझौता मुकदमे के किस चरण में हुआ है। साथ ही, तमिलनाडु कोर्ट फीस कानून की धारा 69 में दी गई शर्तों पर भी ध्यान नहीं दिया गया था।

अदालत ने बताया कि तमिलनाडु कोर्ट फीस एंड सूट्स वैल्यूएशन एक्ट, 1955 की धारा 69 के तहत मुकदमे में दावों के आधार पर गवाही दर्ज होने से पहले समझौता होने पर फीस वापसी का प्रावधान है।

2017 में कानून में किया गया बदलाव

साल 2017 में कानून में बदलाव कर फीस वापसी की सीमा 50 फीसदी से बढ़ाकर 100 फीसदी कर दी गई थी। लेकिन गवाही दर्ज होने से पहले समझौते की शर्त को बरकरार रखा गया।

कोर्ट ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई में न्यायिक समय, सरकारी संसाधन और बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल होता है। ऐसे में गवाही दर्ज होने के बाद फीस लौटाना उचित नहीं होगा।

कानून में बदलाव की जरूरत पर भी उठाया सवाल

इस सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने तमिलनाडु राज्य विधि आयोग से कोर्ट फीस कानून की धारा 69-A की समीक्षा करने को भी कहा है। अदालत के मुताबिक, मौजूदा प्रावधान के तहत किसी विवाद को वैकल्पिक विवाद निपटारा प्रक्रिया (एडीआर) के लिए भेजे जाने पर पूरी कोर्ट फीस वापस हो जाती है।

लेकिन अगर वहां समझौता नहीं होता और मामला दोबारा अदालत में पहुंचता है, तो पहले लौटाई गई फीस का क्या होगा, इस बारे में कानून में स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इस स्थिति को लेकर कानून में स्पष्टता जरूरी है। फैसले की कॉपी तमिलनाडु राज्य विधि आयोग को भेजने का निर्देश भी दिया गया है।