
सीजेपी प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने किया था लाठीचार्ज (Photo-IANS)
CJP Protest: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में जुलाई में हुए प्रदर्शनों को लेकर दर्ज एफआईआर को खत्म करने की मांग अब दूसरे राज्यों तक पहुंच गई है। महाराष्ट्र, असम, पश्चिम बंगाल और बिहार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है और प्रदर्शन से जुड़ी FIR को रद्द करने की अनुमति मांगी है। केंद्र सरकार भी दिल्ली में दर्ज मामलों को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुकी है।
बता दें कि मोदी सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष चारों राज्यों की अर्जियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग राज्यों में दर्ज एफआईआर को रद्द करने के लिए अलग आवेदन दाखिल किए गए हैं।
तुषार मेहता ने कहा कि हमने अलग-अलग राज्यों के लिए चार आवेदन दाखिल किए हैं, जहां एफआईआर को रद्द करने की जरूरत है। अगर कागजात मंगाकर सभी मामलों को दोपहर 2 बजे सूचीबद्ध किया जा सके।
इस पर CJI सूर्यकांत ने मामलों को एक साथ सुनने पर सहमति जताई, लेकिन राज्यों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि उनकी अर्जियों में कोई तकनीकी कमी न हो।
बता दें कि यह घटनाक्रम केंद्र सरकार द्वारा सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल उस आवेदन के एक दिन बाद सामने आया है, जिसमें दिल्ली में सीजेपी के नेतृत्व में हुए प्रदर्शनों से जुड़े 13 एफआईआर रद्द करने की मांग की गई थी।
ये प्रदर्शन 20 से 25 जुलाई के बीच दिल्ली समेत कई जगहों पर हुए थे। केंद्र ने दिल्ली पुलिस के जरिए सुप्रीम कोर्ट से संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इन मामलों को खत्म करने का अनुरोध किया है।
हालांकि, केंद्र ने 2,873 लोगों के खिलाफ एक नई FIR दर्ज करने का प्रस्ताव भी रखा है। पुलिस के मुताबिक इन लोगों के गंभीर आपराधिक पूर्व रिकॉर्ड होने की प्रथम दृष्टया जानकारी सामने आई है। प्रस्तावित नई एफआईआर में इन लोगों की व्यक्तिगत भूमिका की जांच की जाएगी। केंद्र ने यह भी कहा है कि उसके आवेदन में शामिल घटनाओं के संबंध में आगे कोई नई FIR दर्ज नहीं की जाएगी।
बता दें कि सीजेपी लंबे समय से मांग कर रहा है कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों को वापस लिया जाए। संगठन का दावा है कि 25 जुलाई को 36 दिनों तक चले आंदोलन को खत्म करने के दौरान केंद्र सरकार की ओर से मामलों को वापस लेने का आश्वासन दिया गया था।
जुलाई में प्रदर्शन से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अलग-अलग राज्यों में दर्ज एफआईआर का मुद्दा भी सामने आया था। 3 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि उसका आदेश संबंधित राज्य सरकारों को कानून के अनुसार प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को बंद करने या वापस लेने की कार्रवाई करने से नहीं रोकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि उसके पहले के आदेश में इस्तेमाल किए गए क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स यानी आपराधिक पूर्व रिकॉर्ड का मतलब गंभीर और जघन्य अपराधों से है।
दिल्ली पुलिस की ओर से दर्ज मामलों में दंगा, हत्या के प्रयास, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और पुलिसकर्मियों पर हमला करने जैसे आरोप शामिल हैं। इसके अलावा भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान की रोकथाम अधिनियम (PDPP Act) के तहत भी मामले दर्ज किए गए हैं।
पुलिस का कहना है कि NCRB के डेटाबेस के आधार पर 2,873 ऐसे लोगों की पहचान हुई है, जिनका गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड होने की प्रथम दृष्टया जानकारी है और जो प्रदर्शन स्थल पर मौजूद बताए गए हैं।
केंद्र के मुताबिक, नई FIR का उद्देश्य केवल इन लोगों की व्यक्तिगत भूमिका की जांच करना होगा और यह देखा जाएगा कि वे शारीरिक नुकसान या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाओं में शामिल थे या नहीं।
चार राज्यों की ओर से सुप्रीम कोर्ट का रुख किए जाने का घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है, जब CJP ने 5 सितंबर को इंडिया गेट से दिल्ली पुलिस मुख्यालय तक मार्च निकालने का ऐलान किया है।
संगठन का कहना है कि जुलाई में आंदोलन खत्म करते समय केंद्र सरकार ने जिन आश्वासनों को पूरा करने की बात कही थी, उन्हें पूरा नहीं किया गया। इसी के विरोध में मार्च प्रस्तावित है।
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावित मार्च में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। कोर्ट ने कानून-व्यवस्था से जुड़े इंतजामों पर केंद्र और दिल्ली सरकार को उचित निर्णय लेने को कहा था और उम्मीद जताई थी कि सभी पक्ष शांतिपूर्ण तरीके से तथा कानूनी दायरे में रहकर काम करेंगे।
सीजेपी आंदोलन 20 जुलाई को हुए चलो संसद मार्च के दौरान तनावपूर्ण हो गया था। संसद की ओर बढ़ रहे प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए दिल्ली पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन समेत बल प्रयोग किया था।
प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर अत्यधिक बल प्रयोग का आरोप लगाया था। वहीं, पुलिस और प्रशासन की ओर से प्रदर्शनकारियों पर पुलिसकर्मियों के साथ हिंसा करने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए गए थे।
दोनों पक्षों के आरोपों की स्वतंत्र जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन किया है। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं।
समिति को पुलिस की ओर से कथित तौर पर किए गए अत्यधिक और गैरकानूनी बल प्रयोग के आरोपों के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों द्वारा हिंसा, पुलिसकर्मियों के घायल होने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपों की जांच करनी है।
समिति यह भी जांच करेगी कि पैलेट गन, इलेक्ट्रिक बैटन, लाठी और आंसू गैस का इस्तेमाल किस परिस्थिति में हुआ और पुलिस कार्रवाई परिस्थितियों के अनुपात में थी या नहीं। इसके अलावा व्यापक प्रतिबंधात्मक आदेशों और महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कथित लक्षित हिंसा व उत्पीड़न के आरोपों की भी जांच की जाएगी।
यह समिति सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में काम कर रही है। CJI सूर्यकांत ने पिछले सप्ताह कहा था कि कोर्ट समिति के कामकाज की निगरानी करेगा और उसकी सिफारिशें मिलने के बाद आगे के निर्देश जारी करेगा।
Updated on:
01 Sept 2026 12:40 pm
Published on:
01 Sept 2026 12:40 pm
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