
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन करते सीजेपी के प्रदर्शनकारी। (फोटो सोर्स-@ForhadMamud)
राजधानी दिल्ली एक बार फिर लोगों का प्रतिरोध देख रही है। इस प्रतिरोध को रोकने की हर संभव कोशिश करती 'सत्ता' को भी देख रही है। कुछ ही महीने बाद दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर पेश हुए इन नजारों से कई सवाल उठ रहे हैं। इन सवालों के जवाब कहीं मिलते नहीं दिख रहे हैं।
ताजा विरोध मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर है। उन पर आरोप है कि उनके नेतृत्व में चुनाव आयोग ने सविधान के अनुसार, निष्पक्षता के साथ काम नहीं किया। यह आरोप हाल ही में अंग्रेजी अखबार 'इंडियन एक्सप्रेस' की एक खोजी रिपोर्ट सामने आने के बाद ज्यादा मुखरता के साथ लगाए जा रहे हैं। चुनाव आयोग या सरकार की ओर से ऐसा कुछ ठोस नहीं किया गया, जिससे आयोग पर उपजा अविश्वास कमजोर हो सके। आयोग ने जो किया और कहा, उससे आरोप की गंभीरता कम होने के बजाय बढ़ ही गई।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हर 'गलत' को सही करवाने के लिए लोगों को सड़कों पर ही उतरना पड़ेगा? हर बार सड़क पर उतरने से समस्या का समाधान भी होगा? अगर नहीं होगा तो सड़कों पर उतर कर आंदोलन करने की गंभीरता कितनी रह जाएगी? गंभीरता नहीं रह जाएगी तो प्रतिरोध के इस हथियार का क्या मतलब रह जाएगा? क्या सरकार चाहती है कि इस हथियार की धार कुंद ही हो जाए?
इस मामले में विश्वास बहाली का ज्यादा दारोमदार चुनाव आयोग पर था, क्योंकि आरोप सीधे उसी पर लगे थे। और इस बीच बहुत कुछ ऐसा हुआ, जिससे आयोग की विश्वसनीयता संदेह से परे नहीं रह गई थी । विशेष सघन मतदाता पुनरीक्षण (एसआईआर) के नाम पर चुनाव आयोग ने करोड़ों लोगों की नागरिकता शक के घेरे में ला दी और यह शक दूर करने की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर डाल दी। जब वे यह ज़िम्मेदारी निभाने के लिए निकले तो उन्हें दर-बदर भटकना पड़ा और उनकी सुनवाई करने वाला कोई नहीं था। इस बात की चिंता तक नहीं की गई कि वे संविधान के तहत मिले मताधिकार के अपने मौलिक अधिकार से वंचित किए गए।
चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को 'शुद्ध' करने के नाम पर यह सब किया। मतदाता सूची 'शुद्ध' हो, इससे भला किसे इंकार होगा, लेकिन 'शुद्धिकरण' की प्रक्रिया में लोगों का मताधिकार ही सूली पर लटकने लगे और चुनाव आयोग इसे लेकर चिंतित भी नहीं दिखे तो यह आयोग के प्रति अविश्वास पनपने के लिए खाद-पानी का ही काम करेगा।
अभी पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और रेजीनगर में हुए उपचुनावों में भी गड़बड़ी के आरोप लगे हैं। इन आरोपों के समर्थन में कुछ आंकड़े भी दिए जा रहे हैं। शत-प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं वाले बूथ पर 90 फीसदी से ज्यादा वोट मिले हैं। ऐसा कई बूथ पर हुआ है।
रेजीनगर में बूथ नंबर 78 (मिर्जापुर मलिक पारा प्राइमरी स्कूल) पर कुल 838 वोट पड़े। इनमें से 776 भाजपा को पड़े। ममता की तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार रबीउल इस्लाम चौधरी इसी गांव के हैं। इसके बावजूद उन्हें महज 18 वोट मिले। जबकि, यहां के सारे मतदाता मुस्लिम हैं। बीजेपी ने यहां हिन्दू उम्मीदवार उतारा था। पांच महीने पहले हुए चुनाव में रेजीनगर में बीजेपी को 64660 वोट मिले थे। इस उपचुनाव में 129914 मिले।
चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से काम करने के लिए संविधान में ठोस व्यवस्था बनाई गई है। आयोग का कर्तव्य है कि वह इसी रूप में काम करे और करते हुए दिखे भी। आयोग को सर्वसम्मति या बहुमत से काम करने की व्यवस्था बनाई गई है। असहमति से परहेज नहीं है, लेकिन क्या असहमति दर्ज कराने का पूरा मौका दिया गया? बहुमत की राय दर्ज की गई? क्या आयोग के नाम पर कुछ ऐसा आदेश तो अमल में नहीं लाया गया जो वास्तव में आयोग का निर्णय (सर्वसम्मत या बहुमत का) था ही नहीं? ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब आयोग की कार्यप्रणाली को या तो शक के दायरे में ला सकते हैं या विश्वसनीयता प्रदान कर सकते हैं। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कानून की नजर में चुनाव आयोग के तीनों आयुक्त बराबर हैं। बाकी दो आयुक्त सीईसी के मातहत काम करने वाले सहयोगी नहीं हैं।
चुनाव आयोग ने जैसे खुद को मतदाता साबित करने की ज़िम्मेदारी मतदाताओं पर ही डाल दी, वैसे ही उसे भी खुद को निष्पक्ष साबित करने की ज़िम्मेदारी खुद ही उठानी होगी।
Updated on:
10 Oct 2026 03:44 pm
Published on:
10 Oct 2026 03:35 pm
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