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पांच परीक्षाएं पास किए बिना बिहार की जनता को विकल्प नहीं दे सकते प्रशांत किशोर

Bankipur Assembly Bypoll: कम मतदान के कारण इस उपचुनाव से किसी लहर का निष्कर्ष जल्दबाजी होगा, फिर भी नतीजा स्थापित दलों और नए विकल्पों-दोनों के लिए जवाबदेही का स्पष्ट लोकतांत्रिक संदेश है।
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पटना

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Vijay Kumar Jha

Aug 07, 2026

Prashant Kishor election victory updates

बांकीपुर PK की जीत है, जन सुराज की नहीं… (इमेज सोर्स: पत्रिका.कॉम)

Prashant Kishor Election Victory: पटना के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव केवल इसलिए उल्लेखनीय नहीं है कि जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपना पहला चुनाव जीत लिया। इसका राजनीतिक महत्व उस सीट की प्रकृति में है, जिसे तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी और एक ही राजनीतिक परिवार का सुरक्षित गढ़ माना जाता था।

निर्वाचन आयोग के अंतिम परिणाम के अनुसार प्रशांत किशोर को 64,151 मत मिले। भाजपा के नीरज कुमार को 44,827 और राष्ट्रीय जनता दल की रेखा कुमारी को 14,273 मत प्राप्त हुए। जीत का अंतर 19,324 मत रहा। प्रशांत किशोर को डाले गए वैध मतों का 49.23 प्रतिशत और भाजपा को 34.40 प्रतिशत मिला।

लेकिन इस परिणाम को पढ़ते समय एक दूसरी संख्या भी उतनी ही महत्वपूर्ण है- 34.30 प्रतिशत मतदान। बांकीपुर के 3,79,881 पंजीकृत मतदाताओं में कुल 1,30,313 ने मतदान किया। यह बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र के गठन (2010) के बाद सबसे कम मतदान है। विजेता को डाले गए मतों का लगभग आधा हिस्सा अवश्य मिला, पर उनके मत कुल पंजीकृत निर्वाचकों के करीब 16.9 प्रतिशत थे। परिणाम वैधानिक रूप से निर्णायक है, किंतु उसके राष्ट्रीय अर्थ निकालते समय यह सावधानी आवश्यक है।

जिस दुर्ग को अभेद्य माना गया

बांकीपुर का मौजूदा स्वरूप 2008 के परिसीमन के बाद बना और यहां पहला विधानसभा चुनाव 2010 में हुआ। इसका बड़ा हिस्सा पुराने पटना पश्चिम क्षेत्र से आया था। भाजपा के नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा ने पटना पश्चिम से 1995, 2000 और 2005 के विधानसभा चुनाव जीते थे। उनके निधन के बाद 2006 के उपचुनाव में उनके पुत्र नितिन नवीन विजयी हुए।

परिसीमन के बाद नितिन नवीन ने बांकीपुर से 2010, 2015, 2020 और 2025 के चुनाव लगातार जीते। वर्ष 2010 में उनकी जीत का अंतर 60,840 मत था। वर्ष 2015 में उन्होंने 39,767 और 2020 में 39,036 मतों से जीत दर्ज की।

नवंबर 2025 में यह प्रभुत्व और मजबूत दिखाई दिया था। नितिन नवीन को 98,299 मत, यानी 62.66 प्रतिशत वोट मिले थे। उन्होंने राजद की रेखा कुमारी को 51,936 मतों से हराया। जन सुराज पार्टी की वंदना कुमारी केवल 7,717 मतों और 4.92 प्रतिशत मत-हिस्सेदारी के साथ तीसरे स्थान पर थीं।

इसके बाद नितिन नवीन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद उन्होंने 30 मार्च 2026 को विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया, जिससे उपचुनाव आवश्यक हुआ। इस प्रकार बांकीपुर में मुकाबला केवल रिक्त हुई सीट भरने का नहीं था; यह उस राजनीतिक निरंतरता की परीक्षा भी बन गया, जिसे लगभग अटूट माना जा रहा था।

नौ महीने से कम समय में इतना बड़ा परिवर्तन क्यों?

नवंबर 2025 और अगस्त 2026 के परिणामों के बीच अंतर असाधारण है। भाजपा की मत-संख्या 98,299 से घटकर 44,827 रह गई, जबकि जन सुराज पार्टी का मत 7,717 से बढ़कर 64,151 हो गया। फिर भी यह मान लेना गलत होगा कि पुराने सभी मतदाता सीधे एक दल से दूसरे दल में चले गए। दोनों चुनावों में प्रत्याशी अलग थे, मतदान का स्तर अलग था और उपचुनाव की राजनीतिक परिस्थितियां भी अलग थीं।

भाजपा के लिए प्रत्याशी चयन की अस्थिरता ने भी कठिनाई पैदा की। पार्टी ने पहले अभिषेक कुमार ‘बंटी’ को उम्मीदवार बनाया। नामांकन के अगले दिन उन्होंने पारिवारिक कारण बताते हुए चुनाव से हटने का निर्णय लिया और भाजपा ने नीरज कुमार को मैदान में उतारा। अंतिम समय का यह बदलाव प्रचार की निरंतरता को प्रभावित कर सकता था, लेकिन पूरी हार को केवल इसी कारण से समझना सरल निष्कर्ष होगा।

चुनाव अभियान में रोजगार, भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता, शिक्षा, युवाओं का पलायन, महंगाई और शहरी नागरिक सुविधाओं जैसे मुद्दे बार-बार उठे। हाल के वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक और भर्तियों में देरी को लेकर बिहार सहित देश के अनेक हिस्सों में युवाओं का असंतोष सार्वजनिक रूप से दिखाई दिया है। पटना जैसे शहर में जलभराव, यातायात, सफाई और सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता भी प्रत्यक्ष अनुभव के विषय हैं।

लेकिन किसी मुद्दे की चुनावी चर्चा और हर मतदाता के मतदान-निर्णय के बीच सीधा संबंध सिद्ध नहीं किया जा सकता। उपलब्ध परिणाम यह नहीं बताते कि किसी विशेष जाति, धर्म या आयु-वर्ग ने किस अनुपात में पाला बदला। विश्वसनीय चुनावोत्तर सर्वेक्षण अथवा विस्तृत बूथ-अध्ययन के अभाव में ऐसे दावे अनुमान ही रहेंगे।

इतना अवश्य कहा जा सकता है कि लंबे समय तक एक ही दल या परिवार का प्रभुत्व दोहरी अपेक्षा पैदा करता है। मतदाता केवल राजनीतिक स्थिरता नहीं, उसके परिणाम भी देखता है। संगठन, पहचान और विरासत किसी प्रतिनिधि को लंबे समय तक बढ़त दे सकते हैं, लेकिन वे स्कूल, रोजगार, परीक्षा-व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवा और नगर प्रशासन में अधूरे काम की भरपाई अनिश्चित काल तक नहीं कर सकते।

कल्याणकारी योजनाएं लोकतांत्रिक शासन का वैध और आवश्यक हिस्सा हैं। उन्हें मतदाताओं की निर्भरता बताकर खारिज करना अनुचित होगा। समस्या तब उत्पन्न होती है जब राहत को अच्छी शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और भरोसेमंद सार्वजनिक सेवाओं का स्थायी विकल्प समझ लिया जाता है।

कम मतदान की बड़ी सावधानी

उपचुनाव अक्सर आम विधानसभा चुनाव से अलग होते हैं। इनमें सरकार बनने या बदलने का प्रश्न प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं होता, इसलिए संगठन की सक्रियता, उम्मीदवार की पहचान और समर्थकों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने की क्षमता अनुपात से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
बांकीपुर में लगभग दो-तिहाई मतदाताओं ने मतदान नहीं किया। इसलिए यह परिणाम जन सुराज पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि और भाजपा के लिए गंभीर चेतावनी है, पर इसे पूरे बिहार या भारत में राजनीतिक दिशा बदलने का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

कम मतदान का अर्थ यह भी हो सकता है कि कुछ पुराने समर्थक मतदान केंद्र तक नहीं पहुंचे, किंतु उनकी अनुपस्थिति का कारण परिणामों से तय नहीं होता। वह असंतोष, उदासीनता, प्रत्याशी के प्रति अनिच्छा अथवा उपचुनाव में कम रुचि-कुछ भी हो सकता है। लोकतांत्रिक विश्लेषण का दायित्व है कि वह संकेत को पहचाने, पर उपलब्ध प्रमाण से आगे न दौड़े।

यह चुनाव प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत उम्मीदवारी, जन सुराज के केंद्रित अभियान और शहरी सीट की विशिष्ट परिस्थितियों का परिणाम भी हो सकता है। आखिर 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन कोई सीट नहीं जीती और उसका राज्यव्यापी मत-हिस्सा लगभग 3.34 प्रतिशत रहा था। बांकीपुर की जीत उस कमजोरी को एक दिन में समाप्त नहीं करती।

विकल्प पर अलग-अलग संदर्भ

भारत की राजनीति में नए विकल्प के लिए जगह हर राज्य में समान नहीं होती। प्रत्येक प्रदेश का सामाजिक इतिहास, दलगत संरचना, नेतृत्व और स्थानीय मुद्दे अलग हैं। इसलिए बांकीपुर की तुलना तमिलनाडु, पंजाब या झारखंड से करते समय समानता से अधिक भिन्नता समझना आवश्यक है।

तमिलनाडु के 2026 विधानसभा चुनाव में अभिनेता विजय की तमिलगा वेत्री कषगम 108 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनी, लेकिन वह 234 सदस्यीय सदन में स्पष्ट बहुमत से पीछे थी। सहयोगी और बाहर से समर्थन देने वाले दलों की मदद से सरकार बनी और बाद में विधानसभा में विश्वासमत प्राप्त किया गया। इसे बांकीपुर जैसी कम मतदान वाली एक सीट के उपचुनाव के बराबर नहीं रखा जा सकता।

यह कहना भी सटीक नहीं होगा कि तमिलनाडु ने 59 वर्ष बाद पूरी तरह “गैर-द्रविड़” राजनीति को चुन लिया। इतना कहना तथ्यसम्मत है कि 1967 के बाद पहली बार राज्य सरकार का नेतृत्व द्रमुक या अन्नाद्रमुक के बाहर के दल ने किया। TVK की घोषित राजनीति स्वयं सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और तमिल पहचान जैसे उन विचारों से संवाद करती है, जो राज्य की द्रविड़ राजनीतिक परंपरा में केंद्रीय रहे हैं।

पंजाब में आम आदमी पार्टी का अनुभव बताता है कि जब प्रचलित दलों के प्रति असंतोष पर्याप्त गहरा हो और नए संगठन के पास स्पष्ट नेतृत्व तथा स्थानीय ढांचा हो, तो विकल्प सत्ता तक पहुंच सकता है। 2022 में पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीती थीं। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही विकल्प स्वयं रोजगार, कानून-व्यवस्था, वित्त और सार्वजनिक सेवाओं पर कठोर मूल्यांकन का विषय बन जाता है।

झारखंड मुक्ति मोर्चा का उदाहरण अलग है। वह कोई नया राजनीतिक प्रयोग नहीं, बल्कि लंबे सामाजिक और क्षेत्रीय आधार वाली शक्ति है। 2024 में उसके नेतृत्व वाले गठबंधन ने 81 सदस्यीय विधानसभा में 56 सीटें जीतीं। यह दिखाता है कि किसी विकल्प का स्थायित्व केवल क्षणिक असंतोष से नहीं, सामाजिक जुड़ाव, संगठन और निरंतर राजनीतिक उपस्थिति से बनता है। साथ ही, सत्ता में होने के कारण उसे भी भर्ती, शासन और विकास के प्रश्नों पर जवाब देना पड़ता है।

विकल्प की तलाश और विकल्प की जिम्मेदारी

बांकीपुर स्थापित दलों के लिए चेतावनी है, लेकिन नए दलों के लिए इससे बड़ी जिम्मेदारी भी। असंतोष चुनाव जिता सकता है; संस्था नहीं बना सकता। स्थायी जनविश्वास के लिए नए राजनीतिक विकल्प को कम-से-कम पांच परीक्षाएं पास करनी होंगी-विश्वसनीय नेतृत्व, बूथ तक सक्रिय संगठन, स्पष्ट और व्यावहारिक नीतियां, आर्थिक पारदर्शिता तथा सत्ता और विपक्ष दोनों स्थितियों में नैतिक आचरण।

जन सुराज पार्टी के सामने भी यही कसौटी है। उसे बताना होगा कि शिक्षा, रोजगार, पलायन और प्रशासन पर उसके समाधान क्या हैं; उनके लिए वित्तीय संसाधन कहां से आएंगे; प्रत्याशियों का चयन किस प्रक्रिया से होगा; और एक प्रमुख चेहरे से आगे सामूहिक नेतृत्व कैसे विकसित किया जाएगा। एक सीट की विजय राजनीतिक प्रवेश-द्वार हो सकती है, प्रमाणपत्र नहीं।

इसी प्रकार भाजपा की संगठनात्मक शक्ति और राष्ट्रीय उपस्थिति को एक उपचुनाव के आधार पर समाप्त मानना गंभीर भूल होगी। कांग्रेस भी अनेक राज्यों में सामाजिक आधार और राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए हुए है। क्षेत्रीय दलों की जड़ें भी कई स्थानों पर गहरी हैं। भारत किसी एक समान राष्ट्रीय रिक्तता से नहीं, बल्कि अनेक राज्य-विशिष्ट राजनीतिक रिक्तताओं से गुजरता है।

बांकीपुर ने यह सिद्ध नहीं किया कि पूरे देश ने अपनी दिशा बदल ली है। उसने इतना अवश्य याद दिलाया है कि मतदाता की निष्ठा लंबी हो सकती है, पर निःशर्त नहीं। राजनीतिक विरासत सीट को सुरक्षित बना सकती है; संगठन हार को कुछ समय टाल सकता है; प्रचार वातावरण बदल सकता है-पर जनविश्वास की रक्षा केवल काम, जवाबदेही और दिखाई देने वाले परिणाम करते हैं।

लोकतंत्र में कोई निर्वाचन क्षेत्र किसी दल या परिवार की स्थायी संपत्ति नहीं होता। राजनीतिक किलों की दीवारें संगठन और विरासत खड़ी करते हैं, लेकिन उनकी नींव मतदाता का भरोसा होता है। वह नींव कमजोर पड़े, तो दशकों से सुरक्षित दिखाई देने वाला दुर्ग भी एक मतदान में अपना स्वामी बदल सकता है।

(लेखक चुनावी रणनीतिकार, राजनीतिक नेतृत्व प्रशिक्षक और जन-केंद्रित राजनीतिक अभियानों के विशेषज्ञ हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।)