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क्या है पाकिस्तान के पंजाब का नया एंटी-टेरर कानून? सीक्रेट ट्रायल और सीलबंद रिकॉर्ड पर बढ़ा विवाद

Pakistan Punjab Anti-Terrorism Law: पाकिस्तान के पंजाब में नए एंटी-टेरर कानून पर विवाद बढ़ गया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने चेतावनी दी कि गुप्त सुनवाई और सीलबंद रिकॉर्ड से निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित होगी।
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भारत

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Saurabh Mall

•

Oct 10, 2026

Pakistan Punjab Anti-Terrorism Law (1)

पाकिस्तान के पंजाब में नए आतंकवाद विरोधी कानून पर विवाद (सोर्स-ANI)

Pakistan Punjab Anti-Terrorism Law Latest Update: पाकिस्तान के पंजाब में आतंकवाद से निपटने के लिए लाया गया नया कानून अब मानवाधिकारों को लेकर विवादों में घिर गया है। इस कानून पर एमनेस्टी इंटरनेशनल ने गंभीर चिंता जताई है। संगठन का कहना है कि इसके तहत बंद कमरों में गुप्त सुनवाई हो सकती है। अदालत के रिकॉर्ड भी आम लोगों और आरोपियों की पहुंच से दूर रखे जा सकते हैं। इससे निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर असर पड़ने का खतरा है। सवाल यह है कि आखिर इस कानून में ऐसा क्या है...जिस पर इतना विवाद हो रहा है?

क्या है पंजाब का नया एंटी-टेरर कानून?

बता दें पाकिस्तान के पंजाब विधानसभा ने 31 अगस्त, 2026 को एंटी-टेररिज्म (पंजाब अमेंडमेंट) एक्ट, 2026 पारित किया। इस कानून के जरिए पाकिस्तान के एंटी-टेररिज्म एक्ट, 1997 में बदलाव किया गया है। इसमें ‘स्पेशल सिक्योरिटी केस’ नाम की नई श्रेणी शामिल की गई है।

इस श्रेणी के तहत कुछ मामलों की सुनवाई गुप्त और अज्ञात सुरक्षित स्थानों पर की जा सकती है। जजों, सरकारी वकीलों, बचाव पक्ष के वकीलों, पुलिस अधिकारियों और गवाहों की पहचान भी छिपाई जा सकती है। इतना ही नहीं, पूरे मुकदमे के रिकॉर्ड सीलबंद रखे जा सकते हैं। सरकार को अतिरिक्त गोपनीयता उपाय लागू करने का अधिकार भी दिया गया है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल को क्यों है आपत्ति?

एमनेस्टी इंटरनेशनल (मानवाधिकार संगठन) के मुताबिक, यह कानून निष्पक्ष सुनवाई और न्यायिक पारदर्शिता के लिए खतरा पैदा कर सकता है। संगठन ने कहा कि किन मामलों को ‘स्पेशल सिक्योरिटी केस’ माना जाएगा, इसके लिए स्पष्ट मानदंड नहीं हैं। इससे अधिकारियों को अपनी मर्जी से फैसले लेने की अधिक गुंजाइश मिल सकती है।

संगठन ने यह भी चिंता जताई कि आरोपी अपने मामले को इस श्रेणी में शामिल किए जाने के फैसले को चुनौती नहीं दे पाएंगे। इससे न्यायिक प्रक्रिया में सरकार के हस्तक्षेप की आशंका बढ़ती है।

सीलबंद रिकॉर्ड भी बड़ी समस्या बन सकते हैं। आरोपियों को मुकदमे में हुई संभावित गलतियों की पहचान करने के लिए जरूरी दस्तावेज नहीं मिल पाएंगे। इससे अपील करना और न्याय पाना मुश्किल हो सकता है। एमनेस्टी का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत सार्वजनिक सुनवाई पर ऐसी पाबंदियां सीमित और उचित कारणों पर आधारित होनी चाहिए।

विपक्ष का विरोध और मानवाधिकारों पर सवाल

इस कानून को लेकर पाकिस्तान में राजनीतिक विरोध भी देखने को मिला। विपक्षी सांसदों और नागरिक संगठनों ने इसका विरोध किया। विरोध जताते हुए विपक्षी सदस्य विधानसभा से बाहर चले गए। वहीं, कानून को चुनौती देने के लिए लाहौर हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने पाकिस्तान के आतंकवाद विरोधी कानूनों के व्यापक दायरे और कमजोर कानूनी सुरक्षा उपायों पर भी सवाल उठाए हैं। संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्थाएं पहले भी इन कानूनों के प्रभाव को लेकर चिंता जता चुकी हैं। पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर इनके असर को लेकर भी सवाल उठे हैं। संगठन ने बलूचिस्तान में लागू इसी तरह के नियमों का भी जिक्र किया। उसने जून 2026 में बलूच कार्यकर्ता महरंग बलूच और सिबगतुल्लाह शाह को सुनाई गई उम्रकैद की सजा पर भी चिंता जताई। अब इस कानून को लेकर बहस का मुख्य सवाल यही है कि आतंकवाद से सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए आरोपियों के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार और न्यायिक पारदर्शिता की रक्षा कैसे की जाए।