
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे (बाएं) और राहुल गांधी (Photo-IANS)
INDIA bloc march: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के खिलाफ विपक्षी नेता आज दिल्ली में चुनाव आयोग का घेराव करेंगे। इंडिया ब्लॉक के विपक्षी सांसद दिल्ली में सेव डेमोक्रेसी मार्च निकालेंगे। वह संसद से चुनाव आयोग मुख्यालय तक मार्च करेंगे। इंडिया गठबंधन के मार्च से पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने एक्स पर लिखा कि कांग्रेस पार्टी की 3 मांगे नॉन-नेगोशिएबल हैं। पहली- ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा, दूसरी- SIR को रद्द करना। तीसरी- बैलट पेपर पर चुनाव कराना। देशभर में कांग्रेस कार्यकर्ता और INDIA गठबंधन के साथी इन तीन मुद्दों को लेकर सड़कों पर हैं।
इंडिया अलायंस की बैठक में पांच मांगें रखी गई है। ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से इस्तीफा दें। मतदाता सूची में पारदर्शिता लायी जाए। SIR से बड़ी संख्या में वोटर लिस्ट से बाहर हो सकते हैं। भविष्य के चुनावों में SIR से पहले की मतदाता सूची इस्तेमाल की जाए। EVM की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं। INDIA गठबंधन के दल चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के मुद्दे पर एकजुट रहें। लोकतंत्र में अंतिम अधिकार जनता का होना चाहिए।
कांग्रेस और INDIA गठबंधन पिछले करीब दो साल से ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाते रहे हैं। अक्टूबर 2024 में हरियाणा चुनाव के बाद ईवीएम बैटरी और गिनती को लेकर सवाल उठाए गए थे। अगस्त 2025 में कर्नाटक के महादेवपुरा वोटर लिस्ट विवाद के दौरान ‘वोट चोरी’ शब्द का इस्तेमाल हुआ। इसके बाद बिहार में राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा, नवंबर 2025 में ‘एच-फाइल्स’ के जरिए हरियाणा में फर्जी वोटरों के आरोप, दिसंबर में लोकसभा में सीसीटीवी संबंधी कानून पर सवाल और रामलीला मैदान में रैली जैसी गतिविधियां हुईं। सितंबर 2026 में राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस की और गठबंधन ने दो से आठ अक्टूबर तक मार्च का ऐलान किया था।
सत्ताधारी खेमा पूछ रहा है कि जिस EVM से 2004 में कांग्रेस की अगुवाई वाला गठबंधन सत्ता में आया, उस पर कांग्रेस अब सवाल क्यों उठा रही है? कांग्रेस का जवाब है कि उसकी लड़ाई सिर्फ मशीन की नहीं, पूरी चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता की है। दरअसल, अप्रैल-मई 2004 में चार चरणों में हुए लोकसभा चुनाव में पहली बार सभी 543 सीटों पर EVM का इस्तेमाल हुआ। करीब 10 लाख मशीनें लगीं और मतपत्रों की जगह बटन दबाकर वोट डाला गया। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार "इंडिया शाइनिंग" अभियान के साथ समय से पहले चुनाव में उतरी थी और जीत को लेकर आश्वस्त मानी जा रही थी, लेकिन उन्हें शिकस्त मिली। कांग्रेस को 145 और भाजपा को 138 सीटें मिलीं। NDA करीब 181 सीटों पर सिमट गया। वाम दलों को लगभग 60 सीटें मिलीं, जिनके बाहरी समर्थन से कांग्रेस के नेतृत्व में UPA सरकार बनी और डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनें।
2009 में कांग्रेस 206 सीटों के साथ और मजबूत होकर लौटी, और भाजपा की दूसरी हार के बाद EVM पर सवाल उठने लगे। लालकृष्ण आडवाणी ने इस पर चिंता जताई। भाजपा नेता जीवीएल नरसिम्हा राव की 2010 में आई किताब "डेमोक्रेसी एट रिस्क" में मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे, और आडवाणी ने उसकी प्रस्तावना लिखी। सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में चुनाव आयोग को चरणबद्ध तरीके से VVPAT (वोटर वेरिफाइएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) लागू करने का निर्देश दिया। यानी पर्ची वाली व्यवस्था की शुरुआत विपक्ष में रही भाजपा की मांग से जुड़ी है, हालांकि, 2014 में बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद भाजपा का रुख पूरी तरह से बदल गया।
Updated on:
06 Oct 2026 07:31 am
Published on:
06 Oct 2026 07:30 am
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