
ममता बनर्जी (फोटो-IANS)
TMC Crisis: पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर बढ़ती खींचतान ने पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) के पद को लेकर ममता के खेमे और बागी विधायकों के बीच विवाद अब अदालत तक पहुंच गया है। मंगलवार को कलकत्ता हाईकोर्ट ने ममता के गुट को इस मामले में अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया।
इस घटनाक्रम को TMC के भीतर ममता बनर्जी की पकड़ के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। विधानसभा अध्यक्ष रथिंद्र बोस ने रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता दी है। हालांकि हाईकोर्ट ने इसे फिलहाल विधानसभा अध्यक्ष का अस्थायी फैसला माना है।
इस साल हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में TMC को बड़ा झटका लगा। पार्टी को 294 सदस्यीय विधानसभा में सिर्फ 80 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी ने 208 सीटों पर जीत दर्ज की। चुनाव नतीजों के बाद TMC के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया। रितब्रत बनर्जी ने बागी खेमे को संगठित किया और दावा किया कि उनके साथ करीब 58 TMC विधायक हैं।
बागी गुट ने रितब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष बनाने के साथ डिप्टी लीडर्स और चीफ व्हिप के नामों वाला हस्ताक्षरित प्रस्ताव विधानसभा अध्यक्ष को सौंपा। अध्यक्ष ने इस प्रस्ताव को प्रक्रिया के लिहाज से वैध माना।
ममता बनर्जी के खेमे ने वरिष्ठ नेता सोभनदेब चट्टोपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष बनाने का दावा किया था। हालांकि विधानसभा अध्यक्ष ने उनके पक्ष में पर्याप्त विधायकों का समर्थन नहीं होने के आधार पर इस दावे को स्वीकार नहीं किया।
सोभनदेब चट्टोपाध्याय TMC के पुराने नेताओं में शामिल हैं। वह 1998 में पार्टी की स्थापना के समय से ममता के करीबी रहे हैं और उनके साथ लंबे समय तक सक्रिय राजनीति कर चुके हैं।
TMC के भीतर चल रही बगावत का एक दिलचस्प पहलू यह है कि बागी विधायक अब भी ममता बनर्जी को पार्टी की सर्वोच्च नेता मानने की बात करते हैं। उनका मुख्य विरोध पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और डायमंड हार्बर से सांसद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ बताया जा रहा है।
पार्टी के कुछ नेताओं ने अभिषेक के बढ़ते प्रभाव और फैसले लेने के तरीके पर सवाल उठाए हैं। ऐसे में TMC की मौजूदा खींचतान को सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन की लड़ाई के बजाय पीढ़ीगत टकराव और पार्टी के भीतर सत्ता के केंद्रीकरण के विरोध से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने मंगलवार को नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर ममता के गुट को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि रितब्रत बनर्जी की नियुक्ति विधानसभा अध्यक्ष का अंतरिम फैसला है।
रितब्रत इस पद पर फिलहाल दो महीने या एकल पीठ की ओर से आगे कोई आदेश आने तक बने रह सकते हैं। इससे विधानसभा में ममता के खेमे की स्थिति फिलहाल कमजोर नजर आती है। हालांकि LoP पद को लेकर कानूनी प्रक्रिया अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
चुनावी झटके और पार्टी के भीतर बढ़ती बगावत के बाद ममता बनर्जी के सामने संगठन को दोबारा मजबूत करने की चुनौती है। वह जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं।
ममता बनर्जी विपक्षी INDIA गठबंधन में भी अपनी भूमिका बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि गठबंधन के भीतर भी पहले जैसी उनकी स्थिति नहीं रही है। आम आदमी पार्टी के INDIA गठबंधन से अलग होने और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के कांग्रेस के साथ तालमेल की ओर बढ़ने से ममता के सामने विपक्षी राजनीति में भी नई चुनौतियां हैं।
इसी बीच ममता ने कभी अपने सबसे बड़े राजनीतिक विरोधी रहे वाम दलों की ओर भी सहयोग का हाथ बढ़ाया है। यह बदलाव बताता है कि TMC प्रमुख बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच नए विकल्प तलाश रही हैं।
TMC के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टी इस अंदरूनी संकट से कैसे निकलती है। ममता बनर्जी के लिए चुनौती सिर्फ विधानसभा में अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर पुराने नियंत्रण को दोबारा स्थापित करने की भी है।
फिलहाल बागी गुट के पास विधानसभा में ज्यादा विधायकों का समर्थन होने का दावा है और नेता प्रतिपक्ष का पद भी ममता के उम्मीदवार के बजाय रितब्रत बनर्जी के पास है। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि ममता बनर्जी बगावत को खत्म कर TMC को फिर एकजुट कर पाती हैं या पार्टी के भीतर उभरा यह नया गुट स्थायी राजनीतिक ताकत बन जाता है।
Updated on:
19 Aug 2026 07:59 pm
Published on:
19 Aug 2026 07:58 pm
