
नोएडा। 25 फरवरी को मेरठ में होने वाला आरएसएस का 'राष्ट्रोदय' कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। इसमें करीब पांच लाख लोगों के आने का अनुमान लगाया जा रहा है। इनके रहने और खाने की व्यवस्था करना कोई आसान काम नहीं है। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए करीब दो महीने पहले से ही आरएसएस के पदाधिकारी तैयारी में जुट गए हैं। वहीं, लोगों का मानना है कि आरएसएस के इस कार्यक्रम का आने वाले समय में देश की राजनीति में गहरा असर डालेगा। इसका असर आने वाले 2019 के लोकसभा चुनाव में पड़ेगा। इस कार्यक्रम में सहारनपुर के शब्बीरपुर हिंसा के दोनों पक्षों दलितों व ठाकुरों को आंमत्रित किया गया है। दोनों पक्षों के 40 लोग एक साथ बैठकर भोजन करेंगे। इसके जरिए हिंदुत्व की एकता पर बल दिया जाएगा, जिससे बसपा को परेशानी हो सकता है।
विपक्ष के निशाने पर 'राष्ट्रोदय'
यह कार्यक्रम भाजपा की विपक्षी पार्टियों के निशाने पर आ गया है। कार्यक्रम की तैयारी देख इसकी सफलता का राजनैतिक आंकलन करने में विपक्षी पार्टियां जुट गई हैं। सपा और बसपा सूत्रों की मानें तो उनके केन्द्रीय नेतृत्व ने अपने स्थानीय पार्टी पदाधिकारियों को 'राष्ट्रोदय' की तैयारी और इसका राजनैतिक अवलोकन कर उसकी रिपोर्ट नेतृत्व को सौंपने का जिम्मा सौंपा है। इसका असर सेामवार को देखने को भी मिला जब कार्यक्रम के एक बैनर को फाड़ दिया गया।
अधिकांश दलित और अति पिछड़े वर्ग के लोग होंगे शामिल
कार्यक्रम संयोजक अजय मित्तल के अनुसार, आरएसएस का 'राष्ट्रोदय' कार्यक्रम का मंत्र है 'सामाजिक समरसता का संदेश' कार्यक्रम में आने वाले पांच लाख स्वयंसेवकों के लिए उनके ठहरने और उनके भोजन के इंतजाम की व्यवस्था बड़े ही अनूठे तरीके से की गई है। जागृति विहार एक्सटेंशन में होने वाले कार्यक्रम 'राष्ट्रोदय' में आने वाले स्वयंसेवकों के लिए बिना भेदभाव के लाखों परिवार से भोजन एकत्र किया जाएगा। विशेष बात है कि इनमें अधिकांश दलित और अति पिछड़े वर्ग के परिवार शामिल हैं। कांग्रेस, सपा, बसपा और रालोद जैसे दलों की नींद उड़ा दी है। इन सभी दलों के पार्टी नेतृत्व ने अपने स्थानीय नेताओं को 'राष्ट्रोदय' पर निगाह रखने का जिम्मा सौंपा है।
भाषण से तय होगी दिशा
सपा और बसपा के वरिष्ठ नेताओं की मानें तो 'राष्ट्रोदय' की जानकारी के लिए स्थानीय नेताओं को लगाया गया है। आरएसएस के सरसंघ संचालक मोहन भागवत का भाषण वेस्ट यूपी की राजनीति की दिशा तय करेगा। 'राष्ट्रोदय' का अवलोकन करने के लिए आने वाले लोगों का रिकार्ड एकत्र करके उनकी प्रतिक्रिया भी जानी जाएगी। रालोद नेताओं का भी मानना है कि आरएसएस के इस कार्यक्रम का असर आने वाले 2019 के लोकसभा चुनाव में पड़ेगा।
सपा और बसपा की बेचैनी बढ़ी
सामाजिक समरसता की बात करने वाले संघ के इस कार्यक्रम ने जातिवाद की राजनीति करने वाली सपा और बसपा जैसी पार्टियों की बेचैनी बढ़ा दी है। बसपा जहां अपने छिटके दलित वोट बैंक को समेटने की जुगत में लगी है, वहीं सपा की भी अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों को लामबंद करने की कोशिश है। आरएसएस की दलित और अन्य पिछड़े वर्ग के लोगों को जाति भेद भुलाकर उनमें खुद को हिन्दू के रूप में पहचान बताने का स्वाभिमान जगाने की मुहिम से दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व चिंतित है।
Published on:
20 Feb 2018 03:17 pm
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