
गोलबाजार के प्राचीन हनुमान मंदिर में गणेशोत्सव (फोटो सोर्स- पत्रिका)
Ganesh Utsav 2026: 1893 में बाल गंगाधर तिलक ने जिस सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन के रूप में की थी, वह अब भक्ति और उल्लास की भव्यता को समेटे हुए आगे बढ़ रहा है। इसको यादगार बनाने के लिए समितियों का उत्साह कभी फीका नहीं पड़ा। बल्कि भव्य झांकियों को आकार देने के साथ ही आकर्षक सजावट ऐसी कि लोग देखते ही रह जाएं। गणेश पूजा उत्सव सोमवार से प्रारंभ होने जा रहा है।
राजधानी रायपुर के गोलबाजार में हनुमान जी का वह प्राचीन मंदिर तिलक जी के गणेशोत्सव का गवाह है। जहां मंदिर के तल घर से गणेश उत्सव की शुरुआत हुई थी। यहीं आजादी के दीवाने बैठकें करते थे और अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की रूपरेखा तय करते थे। 137 साल पहले गोलबाजार के प्राचीन हनुमान मंदिर में छोटे स्तर पर हुई गणेश उत्सव की शुरुआत आज भव्य स्तर पर पहुंची है, जहां हर साल अलग-अलग रूपों में विघ्नहर्ता दर्शन देते हैं और अपनी परंपरा और संस्कृति को समेटे हुए गणेश झांकियां हजारों लोगों के आकर्षण का केंद्र हुआ करती हैं।
श्री बजरंग नवयुक मित्र मंडल गणेश उत्सव समिति हनुमान मंदिर गोलबाजार के बैनर तले हर साल उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। पिछले 37 वर्षों से उत्सव को भव्य रूप में मनाने का नेतृत्व कर रहे केदारनाथ गुप्ता बताते हैं कि हमारे गोलबाजार का गणेश उत्सव ऐतिहासिक रूप से यादगार है। 137 साल पहले जब उत्सव की शुरुआत हुई थी, तब केवल 7-8 लोगों ने मिलकर किया था। उनमें से एक थे बालचंद केशरवानी, मनीमजी और सुखनंदन लाल। आज 70 सदस्यों वाली यह गणेश उत्सव समिति संचालन कर रही है, जिसमें निर्देशक केदारनाथ गुप्ता, विवेकानंद गुप्ता, अध्यक्ष राजा पंसारी, सचिव निनय राजू गुप्ता, सत्यनारायण देवांगन और कोषाध्यक्ष देवनायण पंसारी, दीपक गुप्ता, गणेश राव रावत प्रमुख रूप से शामिल हैं।
उत्सव समिति के निर्देशक केदारनाथ गुप्ता ने बताया कि पहले झांकियां बनाने का ज्यादा प्रचलन नहीं था। 1999 में गोलबाजार के हनुमान मंदिर गणेश पूजा को भव्य रूप देते हुए बाबा अमरनाथ गुफा की झांकी बनाई गई थी, जिसमें पाताल भैरवी, हनुमान लीला, चारोंधाम के दर्शन कराए।
बप्पा के लिए सात साल पहले 750 ग्राम सोने का मुकुट बनाया। उसी से चतुर्थी के दिन हर साल अभिषेक करते हैं। मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, सांसद विधायक सहित प्रमुख जनप्रतिनिधि इस उत्सव में शामिल होते हैं।
विशेषता यह कि हर साल गणपति बप्पा रिद्धि-सिद्धि माता के साथ बैठाने की परंपरा है। इस बार तिरुपति बालाजी के साथ माता पद्मावती और महालक्ष्मी एक साथ दर्शन देंगे। हर रोज 3 से 4 किलो लड्डुओं का भोग लगता है। सोने का मुकुट गणेशजी के साथ विसर्जन कुंड तक जाता है, जहां अर्चना करके वापस लाते हैं फिर अगले चतुर्थी पर अभिषेक करते हैं।
गणेश उत्सव की शुरुआत 1893 में बाल गंगाधर तिलक ने की। जिसका मुख्य केंद्र महाराष्ट्र का पुणे शहर था। तिलक जी अंग्रेजी शासन के खिलाफ इस ऐतिहासिक आंदोलन के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम की रूपरेखा तैयार करते थे। सार्वजनिक उत्सव के रूप में यह प्रमुख माध्यम हुआ करता था।
महामाया मंदिर के पंडित मनोज शुक्ला के अनुसार विघ्नहर्ता भगवान के लिए किसी महुर्त की जरूरत नहीं है। शास्त्रों में ऐसा वर्णन है। सोमवार को गणेश चतुर्थी तिथि पर सुबह से रात तक विराजने का आह्वान करना शास्त्र सम्मत रहेगा।
Updated on:
14 Sept 2026 06:09 pm
Published on:
14 Sept 2026 06:08 pm
