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Dussehra 2026: नीलकंठ के दर्शन, अखाड़ों के करतब से शुरु होता था दशहरा, नए जमाने में फीकी पड़ी पुरानी परंपराएं

Dussehra 2026: दशहरा अब सिर्फ रावण दहन तक सीमित हो गया है, जबकि नीलकंठ दर्शन, रामलीला, अखाड़ों के करतब और बड़ों से आशीर्वाद जैसी पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे यादों में सिमट रही हैं।
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रावण का फोटो (Photo Source- magnific)

रावण का फोटो (Photo Source- magnific)

Dussehra 2026: दशहरे की सुबह नीलकंठ के दर्शन की आस, मंदिर में मत्था टेकने के बाद बड़ों के चरण छूकर आशीर्वाद लेने की परंपरा और शाम होते ही रामलीला, झांकियों, चल समारोह व अखाड़ों के करतब देखने उमड़ती भीड़… दशहरा कभी सिर्फ रावण दहन का नाम नहीं था। यह आस्था, उल्लास, लोक संस्कृति और सामाजिक रिश्तों को एक साथ जीने का अवसर हुआ करता था। वक्त बदला तो उत्सव का रंग भी बदलने लगा। अब रावण दहन के आयोजन होते हैं, झांकियां भी निकलती हैं, लेकिन पुराने दशहरे की वे तमाम परंपराएं धीरे-धीरे यादों के पन्नों में सिमटती जा रही हैं। जिले के बुजुर्गों और वरिष्ठ साहित्यकारों की यादों में आज भी वह दशहरा जिंदा है, जिसमें हर रस्म का अपना महत्व और हर आयोजन के पीछे एक परंपरा हुआ करती थी।

नीलकंठ के दर्शन से जुड़ी थी विजय की आस

विजयादशमी पर नीलकंठ पक्षी के दर्शन को शुभ मानने की लोक परंपरा रही है। मान्यता है कि इसके दर्शन से सुख-समृद्धि, सफलता और विजय का आशीर्वाद मिलता है। समुद्र मंथन के दौरान हलाहल विषपान करने से शिवजी का कंठ नीला पड़ने की पौराणिक कथा इस नाम को विशेष धार्मिक महत्व देती है। दशहरे पर नीलकंठ के दर्शन को शुभ शुरुआत और विजय का प्रतीक माना जाता है। जब भगवान राम युद्ध के लिए निकले थे और रावण को मारने जा रहे थे, तब उन्हें भी नीलकंठ के दर्शन हुए थे।

राम-रावण युद्ध का मंचन, अखाड़ों के करतब थे आकर्षण

दशहरे की रौनक रामलीला के मंचन के बिना अधूरी मानी जाती थी। लंका कांड और उत्तर कांड के चुनिंदा प्रसंगों के साथ राम-रावण युद्ध का जीवंत चित्रण दर्शकों को बांधे रखता था। चल समारोह में पारंपरिक झांकियां निकलती थीं और अखाड़ों के कलाकार अपने करतब दिखाकर लोगों का उत्साह बढ़ाते थे। इन आयोजनों में धार्मिक कथाओं के साथ स्थानीय संस्कृति की झलक भी देखने को मिलती थी।

मंदिर से मोहल्लों तक बंटती थी आत्मीयता

दशहरे की एक और खूबसूरत परंपरा थी मंदिर में दर्शन के बाद परिवार के बुजुर्गों और मोहल्ले के बड़े लोगों से मिलकर आशीर्वाद लेना। लोग एक-दूसरे के घर जाते, शुभकामनाएं देते और रिश्तों में अपनत्व का नया रंग भरते थे। यह मेल-मिलाप परिवार की सीमाओं से आगे बढ़कर पूरे मोहल्ले को जोड़ता था। अब व्यस्त दिनचर्या, एकल परिवारों के बढ़ते चलन और बदलती जीवनशैली के बीच यह परंपरा कई जगह कमजोर पड़ी है। पहले जहां त्योहार लोगों को करीब लाने का अवसर था, वहीं अब मुलाकातों का समय भी सीमित होता जा रहा है।

भव्यता बढ़ी, परंपराओं की चमक पड़ी फीकी

दशहरा आज भी उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, लेकिन बुजुर्गों की यादें बताती हैं कि उत्सव की असली खूबसूरती केवल बड़े आयोजन या रावण के पुतले की ऊंचाई में नहीं थी। नीलकंठ के दर्शन की आस, रामलीला का रोमांच, अखाड़ों के करतब और बड़ों के आशीर्वाद में भी दशहरे की आत्मा बसती थी। आधुनिकता के दौर में बदलते उत्सव के बीच उन परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चुनौती होग या है। वो दशहरा अब यादों में भले सिमट गया हो, लेकिन उसकी परंपराएं आज भी यह बताती हैं कि त्योहारों की असली भव्यता दिखावे में नहीं, आस्था, संस्कार और अपनों से जुड़ाव में होती है।

क्या कहतें हैं वरिष्ठजन

दशहरे पर नीलकंठ के दर्शन की परंपरा लोगों की धार्मिक आस्था से गहराई से जुड़ी रही है। कभी इस दिन पक्षी के दर्शन को शुभ संकेत मानकर देखा जाता था। बदलते समय में यह परंपरा पहले जैसी सहजता से दिखाई नहीं देती। नई पीढ़ी के बीच इससे जुड़ी मान्यताओं की जानकारी भी कम होती जा रही है। - कैलाशनारायण पुष्पद, किसान, बाबडल्या

पहले रामलीला, अखाड़ों और चल समारोह की अपनी अलग पहचान थी। आयोजन में लोगों की भागीदारी उत्सव को खास बनाती थी। अब कई स्थानों पर रावण दहन ही मुख्य आकर्षण रह गया है। अखाड़ों से नई पीढ़ी दूर है, कइयों को पता ही नहीं क्या है यह। बदलती रुचि ने दशहरे का पुराना स्वरूप बदला है। -लक्ष्मीनारायण त्रिकार, पेंशनर संघ अध्यक्ष, सारंगपुर