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Nirjala Ekadashi 2026: तुलसी पूजा का महत्व, जानें शुभ मुहूर्त और धार्मिक उपाय

Nirjala Ekadashi Shubh Muhurat: ज्येष्ठ मास की सबसे महत्वपूर्ण निर्जला एकादशी पर तुलसी और शालिग्राम पूजन का विशेष महत्व बताया गया है। जानिए शुभ मुहूर्त, पूजन सामग्री और धार्मिक मान्यताओं से जुड़े उपाय।
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भारत

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Manoj Vashisth

Jun 25, 2026

Tulsi Puja on Nirjala Ekadashi

Nirjala Ekadashi Vrat Benefits : निर्जला एकादशी शुभ मुहूर्त (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)

Tulsi Puja on Nirjala Ekadashi: निर्जला एकादशी 2026 का व्रत 25 जून को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु और तुलसी माता की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि तुलसी पूजन से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। इस अवसर पर श्रद्धालु शुभ मुहूर्त में तुलसी और शालिग्राम की पूजा कर विभिन्न मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।

वर्ष 2026 का सटीक पंचांग और शुभ मुहूर्त

इस वर्ष 2026 में निर्जला एकादशी की तिथि को लेकर पंचांग गणना बेहद खास है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, एकादशी तिथि का प्रारंभ 24 जून 2026 को सायंकाल 06:12 बजे से हो रहा है, जो अगले दिन यानी 25 जून 2026 को रात्रि 08:09 बजे तक व्याप्त रहेगी। चूंकि सनातन धर्म में उदयातिथि की महत्ता सर्वोपरि मानी जाती है, इसलिए 25 जून को सूर्योदय के समय एकादशी तिथि विद्यमान होने के कारण, महाव्रत 25 जून (गुरुवार) को ही रखा जाएगा। गुरुवार का दिन होने से इस व्रत का महत्व कई गुना और बढ़ गया है क्योंकि यह दिन स्वयं जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु को समर्पित है।

निर्जला एकादशी 2026 पर तुलसी पूजा में अर्पित करें ये 5 शुभ सामग्रियां

शास्त्रों के अनुसार निर्जला एकादशी पर तुलसी के पौधे की विशेष रूप से की गई अर्चना घर से हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर देती है। इस दिन पूजन के समय 5 सामग्रियां अवश्य अर्पित करें:

सात बार कलावा (पवित्र धागा): पूजा के समय तुलसी के तने के चारों ओर सात बार कलावा लपेटें। ऐसा करते समय मन में परिवार के कल्याण, दीर्घायु और सुख-शांति की कामना करें।

सौभाग्य की प्रतीक चुनरी: माता तुलसी को एक नई लाल या पीली चुनरी ओढ़ाएं। यह वस्त्र अर्पण आपके दांपत्य जीवन में मधुरता और अटूट प्रेम का आशीर्वाद लेकर आता है।

सौपूर्ण सुहाग सामग्री: पौधे के समीप हरी-लाल चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर और कुमकुम जैसी सुहाग की वस्तुएं अर्पित करें। माना जाता है कि इससे घर की महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

हल्दी मिश्रित पीले अक्षत: श्री हरि और माता लक्ष्मी दोनों को ही पीला रंग अत्यंत प्रिय है। अतः इस दिन सादे चावलों के स्थान पर हल्दी से रंगे पीले चावल अर्पित करना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।

गाय के घी का दीपक व परिक्रमा: संध्याकाल में तुलसी के थाले के पास गाय के शुद्ध घी का एक दीपक प्रज्वलित करें और कम से कम तीन या सात बार परिक्रमा करते हुए अपनी मनोकामनाएं दोहराएं।

विभिन्न समस्याओं के निवारण हेतु अचूक ज्योतिषीय उपाय

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यदि आप लंबे समय से किसी परेशानी से जूझ रहे हैं, तो निर्जला एकादशी की रात को किए गए ये छोटे-छोटे प्रयोग आपकी किस्मत बदल सकते हैं:

आर्थिक तंगी व कर्ज मुक्ति हेतु

यदि कड़ी मेहनत के बाद भी धन की कमी बनी रहती है या व्यापार घाटे में चल रहा है, तो एकादशी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का विशेष अभिषेक करें। इसके लिए कच्चे दूध में तुलसी की मंजरी (कलियों) को मिलाकर भगवान को अर्पित करें। धार्मिक मान्यता है कि धन आगमन के मार्ग तुरंत खुलेंगे।

शीघ्र विवाह के योग:

यदि आपके या बच्चों के विवाह कार्य में लगातार अड़चनें आ रही हैं या बात बनते-बनते बिगड़ जाती है, तो इस पावन दिन पर तुलसी माता के साथ भगवान शालिग्राम का पूरे भक्ति भाव से पूजन करें और शीघ्र विवाह की प्रार्थना करें।

करियर और व्यापार में उन्नति:

नौकरी में तरक्की न मिलना या व्यापार ठप होने की स्थिति में, एकादशी की शाम को तुलसी के पौधे के सम्मुख 11, 21 या 51 घी के दीपक जलाएं और श्रद्धापूर्वक तुलसी चालीसा का पाठ करें।

अत्यंत महत्वपूर्ण: तुलसी पूजा के कड़े नियम

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, निर्जला एकादशी के दिन माता तुलसी स्वयं भगवान विष्णु के निमित्त बिना जल की एक भी बूंद ग्रहण किए अत्यंत कठिन निर्जला व्रत रखती हैं। इसलिए इस दिन कुछ गलतियों से बचना अनिवार्य है:

जल अर्पित न करें: इस दिन भूलकर भी तुलसी के पौधे में पानी न डालें, अन्यथा माता का व्रत खंडित हो सकता है।

पत्ते तोड़ना वर्जित: एकादशी तिथि पर तुलसी के पत्तों को तोड़ना भारी पाप माना गया है।

स्पर्श से बचें: बिना कारण पौधे को न छुएं। पूजा और अर्पण पूरी पवित्रता के साथ थोड़ी दूरी से ही करें।

यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं एवं ज्योतिषीय परंपराओं पर आधारित है। विभिन्न पंचांगों और धार्मिक ग्रंथों में वर्णित मान्यताओं के अनुसार पूजन-विधि अपनाई जाती है।