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Sharad Purnima : शरद पूर्णिमा पर करें यह पाठ, लक्ष्मीजी की प्रसन्नता से मिल सकती स्थायी संपत्ति

Sharad Purnima : श्रीसूक्त पाठ का लक्ष्मीपूजन में है सबसे ज्यादा महत्व, बिल्व पत्र, कमलगट्टा चढ़ाने से प्रसन्न होती हैं लक्ष्मीजी
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भारत

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deepak deewan

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Updated: 25 Oct 2026, 2:07 PM IST

shrisukta

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Sharad Purnima : शरद पूर्णिमा, धन की देवी मां लक्ष्मी का प्रिय दिन है। इसे उनके प्रादुर्भाव का दिन भी माना जाता है। लक्ष्मीजी की प्रसन्नता के लिए शरद पूर्णिमा पर उनकी पूजा जरूर करनी चाहिए। ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई बताते हैं कि इस दिन माता लक्ष्मी की पूजा मध्य रात्रि को करना ज्यादा फलीभूत होती है।

लक्ष्मीजी की प्रसन्नता के लिए श्रीसूक्त का पाठ सबसे ज्यादा परिणाम देनेवाला बताया गया है। पूरा श्रीसूक्त पाठ न कर सकें तो इसके शुरुआती 16 सूक्त का पाठ जरूर करना चाहिए। आर्थिक संकट से जल्द से जल्द उबरने के लिए ये सबसे कारगर उपाय है। पूजा प्रारंभ करने के पहले लक्ष्मीजी को 16 बिल्व पत्र भी अर्पित कर सकते हैं।

श्वेत और गुलाबी फूल चढ़ाना चाहिए

यदि आर्थिक संकट छाया हुआ तो हर शुक्रवार को मां लक्ष्मी की पूजा के बाद श्री सूक्त का पाठ करें, धीरे-धीरे इसका लाभ जरूर मिलने लगेगा। शाम के समय स्नान के बाद सफेद वस्त्र पहन कर माता के चरणों में श्वेत और गुलाबी फूल चढ़ाना चाहिए। साथ ही माता को सफेद रंग की मिठाई का भोग लगाना चाहिए।

श्री सूक्त

ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्त्रजाम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आ वह॥ (1)

तां म आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम॥ (2 )

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद्प्रमोदिनिम।
श्रियं देविमुप हव्ये श्रीर्मा देवी जुषताम ॥ (3)

कां सोस्मितां हिरण्य्प्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम्।
पद्मेस्थितां पदमवर्णां तामिहोप हवये श्रियम्॥ (4 )

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्ती श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम्।
तां पद्मिनीमी शरणं प्रपधे अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे॥ (5 )

आदित्यवर्णे तप्सोअधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोsथ बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याष्च बाह्य अलक्ष्मीः॥ (6 )

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह।
प्रदुर्भूतोsस्मि राष्ट्रेsस्मिन कीर्तिमृद्धिं ददातु में ॥ (7 )

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठमलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्।
अभूतिमसमृद्धि च सर्वां निर्णुद में गृहात्॥ (8 )

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यापुष्टां करीषिणीम्।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप हवये श्रियम्। (9 )

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि।
पशुनां रूपमन्नस्य मयि श्रियं श्रयतां यशः॥ (10 )

कर्दमेन प्रजा भूता मयि संभव कर्दम।
श्रियम वास्य मे कुले मातरं पद्ममालिनीम्॥ (11 )

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस् मे गृहे।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥ (12)

आद्रॉ पुष्करिणीं पुष्टिं पिंगलां पदमालिनीम्।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आ वह॥ (13)

आद्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम्।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो म आ वह॥ (14 )

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मी मनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योsश्रान विन्देयं पुरुषानहम्॥ (15 )

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम्।
सूक्तं पञ्चदशर्च च श्रीकामः सततं जपेत्॥ (16 )