
Janmashtami 2022: मथुरा के श्री बांके बिहारीजी मंदिर में होती है जन्माष्टमी की धूम, जानिए इस मंदिर से जुड़ी खास बातें
श्री बांके बिहारी मंदिर
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर मथुरा और वृंदावन में जन-जन के आराध्य ठाकुर बांके बिहारी मंदिर में देश और विदेश से श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते हैं। मान्यता है कि भगवान बांके बिहारीजी निधिवन में प्रकट हुए थे। उसके बाद उनके मंदिर का निर्माण किया गया जो कि समकालीन राजस्थानी शैली में बना हुआ है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर आइए जानते हैं श्री बांके बिहारीजी के मंदिर से जुड़ी खास बातें-
मूर्ति में राधा और श्रीकृष्ण दोनों की छवि:
श्री बांके बिहारी मंदिर में बिहारीजी की छवि, स्वामी हरिदास को स्वयं दिव्य युगल राधा-कृष्ण द्वारा प्रदान की गई। कहा जाता है कि स्वामी हरिदास ने राधा-कृ्ष्ण से एक ही रूप धारण करने का अनुरोध किया क्योंकि दुनिया उनकी छवि को सहन नहीं कर पाएगी। उन्होंने उनसे घन (बादल) और दामिनी (बिजली) जैसा एक ही रूप लेने का अनुरोध किया, तो भगवान कृष्ण और राधा रानी की संयुक्त सुंदरता का एक आदर्श रूपक दिया। साथ ही स्वामी हरिदास चाहते थे कि उनके प्रिय स्वामी हमेशा उनकी आंखों के सामने रहें। उनकी दोनों इच्छाओं को पूरा करते हुए भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी ने खुद को एक काले रंग की आकर्षक मूर्ति में बदल लिया। यह वही मूर्ति है जो आज श्री बांके बिहारी जी के रूप में विराजमान हैं। उन्हें बिहारीजी के नाम से जाना जाता है। बिहारीजी की सेवा का जिम्मा स्वामी हरिदास ने स्वयं गोस्वामी जगन्नाथ को सौंपा था। गोस्वामी जगन्नाथ स्वामीजी के प्रमुख शिष्य और छोटे भाई में से एक थे। परम्परा के अनुसार बिहारीजी की सेवा आज तक जगन्नाथ गोस्वामी के वंशजों द्वारा की जाती है।
स्वामी हरिदास ललिता सखी के अवतार थे-
स्वामी हरिदास का जन्म आशुधीर उनकी पत्नी गंगादेवी के यहां राधा अष्टमी के दिन यानी वर्ष 1535 विक्रमी (1478 ई.) के भाद्रपद माह के दूसरे (उज्ज्वल) पखवाड़े के आठवें दिन हुआ था। उनका जन्म एक छोटे से गाँव में हुआ था, जिसे अब उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ के पास हरिदासपुर के नाम से जाना जाता है। परिवार के वंश का पता गर्गाचार्य से लगाया जा सकता है। गर्गाचार्य यादवों के कुलगुरु (पारिवारिक गुरु) थे और वासुदेव के अनुरोध पर युवा कृष्ण और बलराम के नामकरण संस्कार आयोजित करने के लिए गुप्त रूप से बृज गए थे। परिवार की एक शाखा मुल्तान (अब पाकिस्तान में) चली गई, लेकिन उनमें से कुछ लंबे समय के बाद लौट आए। आशुधीर एक ऐसे प्रवासी थे, जो मुल्तान से लौटने के बाद अलीगढ़ के पास बृज के बाहरी इलाके में बस गए। स्वामी हरिदास भगवान कृष्ण के आंतरिक संघ की ललिता 'सखी' (महिला मित्र) के अवतार थे।
मंदिर में नहीं होती मंगला सेवा-
बिहारीजी की सेवा अपने आप में अनूठी है। यह हर दिन तीन भागों में होती है जो कि श्रृंगार, राजभोग और शयन है। श्रृंगार में स्नान, पोशाक, मुकुट और आभूषण अलंकरण शामिल हैं। राजभोग में बिहारीजी को भोग लगाया जाता है और शाम को शयन सेवा होती है। इस मंदिर में मंगला सेवा की परम्परा नहीं है, क्योंकि स्वामी हरिदास ने मंगला सेवा का पक्ष नहीं लिया। वे चाहते थे कि बच्चे की तरह ईश्वर भी इस समय पूरी तरह से आराम करें। सुबह इतनी जल्दी गहरी नींद से उन्हें परेशान न किया जाए। इस मंदिर में साल में केवल जन्माष्टमी के दिन ही मंगला आरती होती है, इसलिए इस मंदिर में दर्शन के लिए यह दिन विशेष होता है।
हर दो मिनट में डाला जाता है पर्दा-
कहा जाता है कि भगवान बांके बिहारीजी को जो भी भक्त एक टक लगाकर देख लेता है वह उसके बनकर रह जाते हैं, इसलिए भगवान की प्रतिमा के सामने हर 2 मिनट में पर्दा डाल दिया जाता है।
निधिवन का जिक्र जरूरी-
बांके बिहारी मंदिर की बात हो और निधिवन का जिक्र न हो, यह नहीं हो सकता। श्री बांके बिहारी की उपस्थिति का स्थान निधिवन एक शांत स्थान है। इसमें वन तुलसी (एक प्रकार की तुलसी, जंगली किस्म) के सघन वृक्ष हैं जिनकी शाखाएं जमीन पर झुकी हुई हैं। एक बार जब कोई आगंतुक निधिवन के वातावरण में प्रवेश करता है, तो वह शारीरिक के साथ-साथ आध्यात्मिक रूप से भी आराम महसूस करता है।
जैसा कि हम जानते हैं कि आज भी कोई भी जीव रात भर निधिवन में नहीं रह सकता है। सुबह से शाम तक चहचहाने वाले पक्षी भी, बंदर और उनके शरारती बच्चे, जो एक शाखा से दूसरी शाखा में झूलते रहते हैं और कभी-कभी आगंतुकों को डराते हैं, वे भी शाम के समय निधिवन छोड़ देते हैं। वे सभी पास के पेड़ों और छतों में शरण लेते हैं जैसे कि किसी चमत्कारी शक्ति द्वारा निर्देशित हो।
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Updated on:
19 Aug 2022, 8:27 AM IST
Published on:
18 Aug 2022, 4:30 PM IST
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