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VNSGU : उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन में कोताही का आरोप, छात्रा ने भेजा नोटिस

- विश्वविद्यालय से जवाब नहीं मिलने पर कानून का सहारा
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सूरत

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Divyesh Kumar Sondarva

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Updated: 28 Aug 2018, 8:21 PM IST

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VNSGU : उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन में कोताही का आरोप, छात्रा ने भेजा नोटिस

सूरत.

वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय को शहर के एक महाविद्यालय की छात्रा ने लीगल नोटिस भेजा है। उसने विश्वविद्यालय प्रशासन पर उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन में कोताही बरतने का आरोप लगाया है। उसने आरटीआइ के माध्यम से उत्तर पुस्तिका हासिल की, लेकिन विश्वविद्यालय से न्याय नहीं मिलने पर उसे कानून का सहारा लेना पड़ा।
विश्वविद्यालय संबद्ध शहर के बीबीए महाविद्यालय में बीबीए की छात्रा ने विश्वविद्यालय की परीक्षा प्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन में लापरवाही बरतने का आरोप लगाया है। एक पेपर में कम अंक मिलने के कारण वह फेल हो गई थी। छात्रा को लगा कि उसकी उत्तर पुस्तिका का मूल्यांकन तरीके से नहीं किया गया है, इसलिए उसने आरटीआइ के माध्यम से उत्तर पुस्तिका प्राप्त करने के लिए आवेदन किया। उत्तर पुस्तिका मिलने पर उसने इसे प्राध्यापकों को दिखाया। प्राध्यापकों का कहना है कि छात्रा इस पेपर में अधिक अंक के साथ पास हो सकती है। छात्रा ने विश्वविद्यालय प्रशासन से न्याय मांगा, लेकिन निराशा हाथ लगी। आखिरकार उसने कानून का सहारा लिया और वकील के माध्यम से विश्वविद्यालय को लीगल नोटिस भेजा। इसमें कहा गया है कि उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन में लापरवाही नजर आ रही है। बार-बार न्याय मांगा गया, लेकिन विश्वविद्यालय से उचित जवाब नहीं मिला। उसने उत्तर पुस्तिका के उचित मूल्यांकन की मांग की है।

नोटिस का खर्च भी मांगा
लीगल नोटिस में यह भी कहा गया है कि छात्रा को विश्वविद्यालय से न्याय नहीं मिलने पर लीगल नोटिस भेजने की जरूरत पड़ी। यह नोटिस भेजने में पांच हजार रुपए खर्च हुए। विश्वविद्यालय से यह खर्च चुकाने की मांग भी की गई है।

विश्वविद्यालय की परीक्षाओं का नया गड़बड़झाला
विश्वविद्यालय की परीक्षाओं से जुड़ा नया गड़बड़झाला सामने आया है। पिछले साल की परीक्षाओं के बाद जब प्रश्नपत्रों की छपाई का बिल विश्वविद्यालय प्रशासन को थमाया गया तो इस गड़बड़झाले का पता चला। विश्वविद्यालय ने प्रश्नपत्र छापने का काम प्राइवेट एजेंसी को सौंप रखा है। इस एजेंसी से विश्वविद्यालय प्रशासन को दो करोड़ रुपए से अधिक का बिल मिला तो समिति बनाकर मामले की जांच के आदेश दिए गए। विश्वविद्यालय प्रशासन को शंका इसलिए हुई कि विद्यार्थियों की संख्या से तीन से चार गुना अधिक प्रश्नपत्र छापे गए। एक विभाग में 50 विद्यार्थियों के मुकाबले 70 या 80 की जगह 200 से 300 प्रश्नपत्र छापे गए हैं। ऐसा ज्यादातर विभागों और विषयों में हुआ है।

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